आचार्य श्री १०८ भरत सागर जी महाराज

पवन वसुंधरा का एक भाग राजस्थान ।उसके प्रभाग बाँसवाड़ा जिला ।उसमे एक गाँव लोहारिया ।वह पिता किशनलाल नरसिंह पूरा की कुटिया में माता गुलाबी देवी की कुक्षी से गुलाब के समान १ सुन्दर बालक ने जन्म लिया।वह शुभ दिन था मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का जन्म दिन रामनवमी ,चैत्र सुदी नवमी ।७ अप्रैल १९४९ वार था गुरूवार नक्षत्र पुष्प ।६ पुत्रो एवं ३ पुत्रियों में सबसे छोटे होने के कारण नाम पड़ा छोटे लाल । धीरे धीरे छोटे लाल बड़े होते गए ।जब वो आठवी कक्षा में थे तब कक्षा में गलती करने पर संस्कृत शिक्षक श्री जय नारायण ने सब विद्यार्थियों को सबक शिक्लाने के लिए हथेली आगे करने को कहा ।सबको बारी बारी से पड़ने लगा डंडा पर ये क्या छोटे लाल के सामने आते ही डंडा यकायक रुक गया।शिक्षक की नजर उनकी हथेली की लकीरों से टकरा गयी।नजर पड़ते ही उन्होंने उसके हाथ मी लिखी इबारत पढ़ ली थी।उनको भान हो गया कि ये फूल आपनी सुंगध से जन जनको महकाएगा ।आज का ये छोटेलाल कल का महँ साधक बन जायेगा।
नेतृत्व का गुण आपने बचपन से था अगर आप साधु न बनते तो फिर अवश्य नेता बन जाते ।आपकी लोकिक शिक्षा से ज्यादा रूचि देश सेवा एवं धार्मिक क्रियाकलापों में थी।आपने घर मे १ मंदिर सा बना रखा था वहा प्रतिदिन पञ्च परमेष्ठी व् महावीर भगवान् की संध्या समय आरती उतारते थे।साथ में अनेक सहपाठी भी जुट जाया करते थे
आपने अपनी बाल्यावस्था में ही आचार्य महावीर कीर्ति जी,मुनि देवेन्द्र सागर जी,आचार्य धर्म सागर जी एवं आर्यिका ज्ञान मति माता जी के दर्शन कर लिये थे।
चीन के आक्रमण करने पर देश भक्ति उमड़ पड़ी और सीमा पर देश की रक्षा करने की मन में ठान ली।मनोयोग से रायफल चलन भी सीख लिया और अपनी माँ से इस बारे में बात की परन्तु माँ की आज्ञा न मिलने पर आपने सैनिक बनने का सपना त्याग दिया और सोचकि में साधु बन जाऊ ।आप वाही १ सेठ के यहाँ नोकरी करने लगे ,नोकरी करते करते भी उन्हें गुरु की खोज चालू रखी । विमल सागर जी संग सहित वह पधारे ।सेठ जी तीनो प्रहार दुकान छोटे लाल को सोपकर खुद आचार्य श्री के दर्शन करने चले जाते ।छोटे लाल ने १ दिन सेठ जी से बोल दिया आप अपनी दुकान समालिए और खुद आचार्य श्री के पास चले गए और उनके चरणों में जाकर बैठ गए ।आचार्य श्री ने उन्हें देख कर तह अनुमान लगा लिया यह छोटे लाल आगे जाकर बहुत बड़ा साधक बनेगा।३ दिन आचार्य श्री के चरणों में गुजार दिए।गुरु ने पुछा मेरे साथ चलोगे ।तो छोटे लाल ने हां कर दी ।आचार्य श्री ने लोगो के विरोध के बाद भी उन्हें अखंड ब्रह्मचर्य व्रत दे दिया।और देश में १ और बाल ब्रह्मचारी पैदा हो गया ।ब्रह्मचारी छोटे लाल। उसके बाद २५ मई १९६८ को अजमेर समाज के सामने क्षुल्लक दीक्षा देने का निर्णय आचार्य से ने सुना दिया।तब समाज ने निवेदन किया की अभी उम्र कम है जब परिपक्व हो जाये तब दीक्षा दे देना।विमल सागर जी ने कहा मेने २ महीने में ही इसकी परिपक्वता देख ली है ।१९ साल की उम्र में ब्रह्मचारी छोटे लाल बन गए क्षुल्लक शान्तिसागर।

संक्षिप्त परिचय

जन्म: ७ अप्रैल १९४९ ,चैत्र सुदी नवमी
जन्म स्थान : लोहारिया , राजस्थान
जन्म का नाम छोटे लाल
माता का नाम : गुलाबी देवी
पिता का नाम : किशनलाल नरसिंह
दीक्षा गुरु : आचार्य श्री विमलसागरजी महाराज
मुनि दीक्षा तिथि: ६ नव. १९७२
मुनि दीक्षा स्थल : सम्मेद शिखरजी सिद्धक्षेत्र
आचार्य पद तिथि: १० फरबरी १९९५
आचार्य पद प्रदाता : आचार्य श्री विमलसागरजी महाराज
समाधि स्थल : उदयपुर (राज.)के निकट
समाधि तिथि : २१ अक्टूबर २००६ 


उपसर्ग :परिषह और उपसर्ग तो जैन साधुओं के जीवन का श्रृंगार है।क्षुल्लक बनते ही शांति सागर जी की परीक्षा चालू हो गयी।अभी क्षुल्लक अवस्था लिये१५ दिन ही निकले थे क्षुल्लक जी विहार में शोच की बाधा के कारण पीछे रह गए और पूरा संघ आगे बढ गए।कुछ लुटेरों ने मोका देख कर उन पर हमला बोल दिया और बोल तुमरे पास जितने भी गहने है सब हमारे हवाले करदो।क्षुल्लक जी के बहुत समझाने के बाद भी वे नही माने और उन्हें पास के कुए में ले जाकर डाल दिया।जब संघ में देखाकि ब्रहमचारी वह नहीं है तो उन्हें देखनेके लिए लोगों ने अपने वाहन लेकर उनके तलाश चालू हो गयी।वही कुछ लोगो ने कहाकि भाग गया होगा जितने लोग उतनी बाते । तब लोगो ने आचार्य श्री से पुछा आपका ज्ञान क्या कहता है।तब आचार्य श्री ने कहा की -वह होनहार है कही नही जा सकता,किसी विपत्ति में पद गया है ।वह किसी जलमग्न स्थान कर सुरक्षित है परन्तु मिलने में समय लगेगा । इधर कुए में क्षुल्लक जी नमोकार मंत्र का जाप करते रहे ।तभी वहाँ १ महिला पानी भरने आई इंसान की आवाज सुन कर उसने चमड़े का चरस कुए में उन्हें निकलने के लिए डाला।परन्तु क्षुल्लक जी ने उस पर बेठने के लिए मन कर दिया। तब तक समाज के कुछ और लोग आ गए।उनकी मदद से उन्हें वह से बहार निकाला गया।७ घंटे तक पानी में रहकर भी आपने अपने धर्म को नहीं छोड़ा ।पानी के कारण पूरा शरीर सफेद पड़ गया था।आप मौत के मुह से बाख निकले ऐसा लगा मानो यमराज ने आपकी प्रतिभा के तीक्ष्ण तेज से हार मानकर आपको जीवन दान प्रदान किया हो।
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा ६ नव. १९७२ को सम्मेद शिखर जी पर क्षुल्लक सुमति सागर और क्षुल्लक शांति सागर जी की दीक्षा दी गयी और नाम रखा गया मुनि बाहुबली सागर और मुनि भारत सागर ।जिस प्रकार छाया कभी किसी का साथ नहीं छोडती वैसे ही मुनि भरत सागर जी हमेशा अपने गुरु के साथ ही रहते ।उत्कृष्ट गुणों के धारी मुनि भरत सागर जी ने अपनी गुरुभक्ति ,सतत अध्यन्न से अपनी अलग ही छाप अपने गुरु पर छोड़ दी। ७ सितम्बर १९७९ को आचार्य श्री ने मुनि भरत सागर जी को बना दिया उपाध्याय भरत सागर ।
आचार्य पद : ७९ वीं जयंती पर आचार्य श्री विमल सागर जी पूर्णतया स्वस्थ थे।परन्तु २३ दिसम्बर १९९४ को आपको बुखार आया और २७ दिसम्बर तक बुखार बढता चला गया।भरत सागर जी उनकी सेवा में लगे रहते थे उनको इशारा भी नहीं करना पड़ता था आप उनकी मनोभावना को समझकर उनकी सेवा में जूट जाया करते थे।१ पल भी आपने अपने गुरु का साथ नहीं छोड़ा ।और सच्चे शिष्य का परिचय दिया । २८ दिसम्बर १९९४ को आचार्य श्री की शक्ति क्षीण हो गयी और उन्होंने भरत सागर जी को पढने के लिए कहा ।विमलसागर जी ने १ घंटे बिना किसी सहारे के स्वद्याय सुना ।पश्चात जिनाभिषेक देखा और भरत सागर जी के मस्तक पर ३ बार गंदोधक ऐसे लगाया जैसे आचार्य पद के संस्कारकर रहे हो। दोप. में बुखार ने गति पकड़ी ।शिष्य समूह ने समाधि मरण का और नमोकार मंत्र का जाप चलता रहा। २९ दिसम्बर १९९४ को स्वास्थ थोडा सामान्य हुआ सबको उम्मीद थी की बाबा अब बोलेंगे।परन्तु आचार्य श्री तो यम सल्लेखना में ललना थे।भरत सागर जी ने उनके कानो में नमोकार मंत्र सुनाया और कहा की अब से आपके चारो प्रकार के आहार का त्याग है सुनते ही आपने भरत सागर जी की और देखा और मौन स्वीकृति प्रदान की।२९ दिसम्बर १९९४ को सायं ४:२७ को आचार्य श्री समाधि में लीन हो गए ।१० फरबरी १९९५ को समाज ने भरत सागर जी आचार्य पद प्रधान किया।
आचार्य वचन प्रमाणं :
1)कुछ साल पहले आचार्य श्री भरत सागर जी पावापुरी से कुण्डलपुर जा रहे थे।मार्ग में १ बुढ़िया रोटी हुई आई और कहने लगी मेरा बेटा ८ दिन से लापता है कोई उपाय बताइए ।तब आचार्य श्री ने कहा माजी आपका बेटा शीघ्र आजायेगा आप ॐ नम: की जाप कीजिये। ५ दिन के भीतर उसका बेटा वापस आ गया।
2)१ बार १ जैन बन्धु मंदार गिरी की वंदना करके आचार्य श्री के पास आकर रोने लगे और कहाकि मेरा परिवार दुखी है।पटना में कार्य चल ही नहीं रहा पटना छोड़ना पड़ेगा ।तब आचार्य भरत सागर जी ने कहा पटना छोड़ने की कोई जरुरत नहीं है।कुछ ही दिनों में लाभ होगा ।वह घर गया और चंद दिनों में ही उसे २५ लाख का फायदा हुआ। ऐसे ही कही उदारण है जिस से पताचलता है की आचार्य श्री जो १ बार बोल देते थे उनके वचन फलीभूत हो जाया करते थे। २१ अक्टूबर २००६ को उदयपुर (राज.)के निकट आचार्य श्री ने समाधि मरण कर इस नश्वर शरीर का त्याग कर दिया ।


आचार्य श्री १०८ आदिसागर जी महाराज (अंकलीकर)
आचार्य श्री १०८ महावीर कीर्ति जी महाराज
आचार्य श्री १०८ विमल सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ भरत सागर जी महाराज

Aacharya Shri 108 Bharat Sagar Ji


Brief Introduction

Birth :
Chaitra Sudi 9 ,7th April 1949,Ramnavmi
Birth Place: 
Lohariya ,Raj.
Birth Name :
Chotelaal
Mothers Name :
Gulabidevi
Father’s Name :
Kishan Laal
Diksha Tithi :
6 Nov. 1972
Diksha Name :
Shri Bharat Sagar Ji Maharaj
Diksha Guru:
Acharya Shri Vimalsagarji Maharaj
Place of Muni Diksha :
Sammed Shikharji Siddhakshetra
Aacharya Pad :
10/02/1996
Acharya Pad Pradata:
Aacharya Shri Vimal Sagar Ji
Samadhi Tithi
21 Oct. 2006
Importance
 


Aacharya Shri 108 Aadisagar Ji Maharaj (Anklikar)
Aacharya Shri 108 Mahaveer Kirti Ji Maharaj
Aacharya Shri 108 Vimal Sagar Ji Maharaj
Aacharya Shri 108 Bharat Sagar Ji Ji Maharaj