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आचार्य श्री १०८ चन्द्र सागर जी महाराज

आपका जन्म दिगंबर जैन गोलालारे ,संघई गोत्र ग्राम पुलावली जिला भिंड के निवासी श्री सुर्यपाल जैन के घर संवत १९५९ ज्येष्ठ सुदी पंचमी को हुआ था।आपकी पूज्यनीय माता जवाहर बाई ने आपका गृहस्थ नाम गंगाराम रखा ।

संक्षिप्त परिचय

जन्म: संवत १९५९ ज्येष्ठ सुदी पंचमी
जन्म नाम : गंगाराम
जन्म स्थान : भिडं (म.प्र.) 
माता जी नाम : श्रीमती जवाहर बाई
पिताजी नाम : श्री सुर्यपाल जैन
शिक्षा : मैट्रिक
क्षुल्लक दीक्षा : आषाढ सुदी पंचमी संवत २०३०
क्षुल्लक दीक्षा स्थान : मुरेना
क्षुल्लक दीक्षा गुरु : आचार्य श्री १०८ कुन्थु सागर जी महाराज
ऐलक दीक्षा :
ऐलक दीक्षा स्थान : अम्बाह
ऐलक दीक्षा गुरु : आचार्य श्री १०८ कुन्थु सागर जी महाराज
मुनि दीक्षा :
मुनि दीक्षा स्थान : पोरसा
मुनि दीक्षा गुरु : आचार्य श्री १०८ कुन्थु सागर जी महाराज
आचार्य पद :
आचार्य पद स्थान : फिरोदाबाद्र
आचार्य पद प्रदाता : आचार्य श्री १०८ कुन्थु सागर जी महाराज
समाधि :
समाधि स्थान : सम्मेद शिखर

आप बाल काल से ही धर्म ध्यान से लीन रहते थे ।आपके ३ भाई और १ बहन थी ।संवत २०२० ,में श्री १०८ आचार्य विमल सागर माहराज का आगमन ग्राम पुलावली हुआ।धर्म प्रभावना से प्रभावित होकर पूर्व से बाल ब्रह्मचारी होते हुए दो प्रतिमा के व्रत धारण किये ।संवत २०२६ में पुन: आचार्य विमल सागर जी से सात प्रतिमा व्रत ग्रहण किये और उनके साथ संघ में विहार कर धर्म साधना में बने रहे।सागोन जिला कोटा में आचार्य श्री जी की समाधि के बाद बुद्धिसेन ब्रह्मचारी के साथ मुरेना आ गए ।यहाँ श्री १०८ आचार्य कुन्थु सागर जी से आषाढ सुदी पंचमी संवत २०३० में आपने क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की और क्षुल्लक शांति सागर जी के नाम से विख्यात हुए।मुरेना से विहार कर माघ वादी ३ संवत २०३० में अतिशय क्षेत्र श्री सोनिया जी में पहुच कर केशलोंच किया।विहार करते हुए आप अम्बाह आते यहाँ आपने ऐलक दीक्षा ग्रहण की ।पोरसा में महा शक्ति योग्य विधान हुआ वहां आपने आचार्य श्री से मुनि दीक्षा ग्रहण कर श्री १०८ मुनि श्री चन्द्र सागर जी महाराज के नाम से जाने, जाने लगे।
आचार्य श्री के साथ विहार करते हुए निगोडिया पहुचे वह आचार्य श्री का केश लोंच बड़े धूम धाम से हुआ।और आपको आचार्य कल्प पद की प्राप्ति हुई। इसके पश्चात फिरोदाबाद आये यहाँ सिद्ध चक्र विधान पाठ बड़े धूम धाम से संपन्न हुआ।यहाँ आचार्य श्री कुन्थु सागरजी का स्वास्थ्य दिन प्रति दिन गिरने लगा।उस समय वरिष्ठ शिष्य कोई नहीं था ,मात्र आप वहां मौजूद थे तो आचार्य श्री ने अपना आचार्य पद आपको देकर समाधि ले ली।इस प्रकार क्वार सुदी पंचमी सन१९७९ को आप श्री १०८ आचार्य चन्द्र सागर जी कहलाये।वहां से विहार कर भिंड आकर धर्म प्रभावना की। इसके पश्चात इटावा में चातुर्मास आपने संघ सहित किया।यहाँ श्रावकों को धर्म चेतना दी।यहाँ से विहार कर सम्मेद शिखर जी की और विहार किया ।श्री सम्मेद शिखर जी में आचार्य पद का पालन करते हुए समाधि हुई।