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आचार्य १०८ श्री धर्म भूषण जी महाराज

सभ्यता एवं संस्कृति की भूमि ,कौरव पांडवो की कर्मस्थली ,भगवान् ऋषभदेव की विहारस्थली ,तीर्थंकरों की कल्याणक भूमि के रूप में प्रसिद्ध धर्मनगरी हस्तिनापुर की प्राकृतिक सुषमा का निकटस्थ साक्षी ग्राम करनावल (मेरठ) पूज्य आचार्य श्री १०८ श्री धर्मभूषण महाराज जी की पवित्र जन्म स्थली है ।एक लघु शिशु को माता श्रीमती हुकमा देवी जी और पिता श्री डालचंद जैन ने सन १९४०, श्रवण शुक्ला सप्तमी विक्रम संवत १९९६ में जन्म दिया ।२ पुत्रों (श्री सलेक चन्द्र जैन एवं श्री रूपचंद जैन) तथा दो पुत्रियों (श्रीमती कमला देवी एवं श्री जयमाला जैन )के साथ ही पुत्र प्रेमचंद खेले,पले और बढे।पिता जी आशीष छाया बहुत कम समय साथ रही ।दोनों भाइयों ने ही प्रेमचंद को पिता तुल्य वात्सल्य प्रदान किया।किसे ज्ञात था की वह लघु शिशु एक तेजस्वी दिव्यात्मा है जो भविष्य में विश्व के कल्याण और सुरक्षा हेतु अपना सर्वस्व त्याग कर देगा ।बाल्यावस्था से ही आप धनी,अपूर्व साहस से संयुक्त और कुछ कर दिखाने की भावना से ओत प्रोत थे।युवावस्था में भी उनकी स्वतंत्र चिंतन धारा,निष्काम साधना की ओर अग्रसर थी,दिन रात यही चिंतन करते रहते थे कि इस अमूल्य मानव जीवन को किस प्रकार आत्म विकास के मार्ग पर अग्रसर किया जाये।माता पिता का दिया नाम प्रेम उनके अन्तरंग और रॊम रॊम में बसा हुआ था।युवा प्रेमचंद ने १५ वर्ष कि आयु में विवाह भी किया ।पत्नी शीलवती एवं धर्म परायण थी।दो संताने भी हुई पुत्र आदीश जैन और पुत्री अंजना जैन।अनमने मन से व्यापार भी किया लेकिन पूर्व जनित संस्कार इस मध्य में भी उनके साथ रहे।श्रावक के षटकर्मों का नियमित पालन करते हुए.साधुओं की सेवा करने में आपको विशेष आनंद की अनुभूति होती थी।पुत्री जब उनकी पत्नी के गर्भ में थी तब ही ब्रह्मचर्य व्रत लेकर गृहस्थ जीवन को सांकेतिक तिलांजलि दे दी तथा १७ बर्ष की आयु में ही आपने १०८ आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज से संयम ले लिया।कपडा व्यवसाय भी किया पर वणिक वृत्ति से नहीं,मात्र गृहस्थ का पालन करने हेतु पूर्ण इमानदारी से।गृहस्थ अवस्था में वे सदेव यही ध्यान रकते थेकि शाश्वत सुख के लिए राग से विराग की और बढ़ना है,अगारी से अंगारी बनना है।


संक्षिप्त परिचय

जन्म: सन १९४०, श्रवण शुक्ला सप्तमी विक्रम संवत १९९६
जन्म स्थान : ग्राम करनावल (मेरठ)
जन्म का नाम प्रेमचंद जैन
माता का नाम : श्रीमती हुकमा देवी
पिता का नाम : श्री डालचंद जैन
क्षुल्लक दीक्षा : फाल्गुन सुदी दशमी विक्रम संवत २०३७ में १५ मार्च १९८१
दीक्षा का स्थान : रामपुर मनीहरण
मुनि दीक्षा : चैत्र वदी १५ संवत २०५१ (१० अप्रैल १९९४ )
मुनि दीक्षा का स्थान : गंनोर मंडी जिला सोनी पत
मुनि दीक्षा गुरु : आचार्य श्री शांति सागर जी (हस्तिनापुर वाले )
आचार्य पद : ज्येष्ठ सुदी ३ संवत २०५४ (८ जून १९९७)
आचार्य पद का स्थान : मुजफ्फर नगर (उ.प्र.)

गृहस्थ जीवन में रहते हुए वे कर्तव्यनिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता भी रहे। करनावल में एक बार सरकारी योजना बनी कि करनावल में स्थित तालाबों मे मछली पालन होगा ,यह प्राणिमात्र के प्रति करुणा भाव रखने वाले संवेदन शील प्रेमचंद जी को कैसे सहन होता कि उनकी मातृभूमि पर यह न्रशंस कार्य हो,उन्होंने पुरजोर विरोध किया और प्रशासन की इस योजना को निरस्त कराया ।देखने में भले ही कृशकाय थे पर रहे अतुल बलशाली।१ बार गाँव में डाकू आ गए प्रेमचंद ने अपूर्व सूझ बुझ और शक्ति का परिचय देकर डाकुओं को बहार निकल।ना जाने ऐसे कितने प्रसंग इनके जीवन के साथ संलग्न है।सच में जब व्यापार भी उत्कर्ष पर था और छोटी बेटी और बेटे किशोर भी नहीं हुए थे तभी आचार्य श्री विमल सागर जी से स्वीकृत आजीवन ब्रहमचर्य व्रत का वर्षों तक निर्तिचार शील व्रत का पालन करते हुए मिति फाल्गुन सुदी दशमी विक्रम संवत २०३७ में १५ मार्च १९८१ को रामपुर मनीहरण में सम्राट आचार्य प्रवर गुरु १०८ शांति सागर जी महाराज जी से क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की और आप ब्रा. प्रेमचंद से पूज्य १०५ श्री क्षुल्लक कुलभूषण जी बन गए।संभवत: आचार्य श्री शांति सागर जी (हस्तिनापुर वाले )भी भली भांति जानते थे कि ऐसे तेजस्वी प्रतिभा संपन्न व्यक्तित्व का धनी शिष्य ही मेरे कुल का अलंकरण हो सकता है।जैसे शिष्य वैसे ही गुरु और जैसे गुरु वैसे ही शिष्य ।सुयोग्य गुरु का सुयोग्य शिष्य का मिलना सहज नहीं होता। प्रारंभ में हो सम्पूर्ण जैन समाज को प्रसन्न और सम्रद्ध देखने की ही आप की भावना रही और अब तो पूर्णतया समाज के ही मध्य है।महापुरुषों के साथ संघर्ष और उपसर्ग तो संभवत: अपनी उग्रता दिखाए बिना नहीं रहते ।ब्रह्मचारी अवस्था से ही उपसर्ग आपके साथ रहे ।एक बार चिलकाना में मधुमक्खियों ने भयंकर आक्रमण किया। सारा समाज दुःख में डूब गया पराप शांति से ,सहजता से उपसर्ग को सहा।शारीरिक ,वैचारिक किसी भी प्रकार की विपरीतता में आपने धैर्य नही छोड़ा।आप तो अर्ह्निश यही सोचते कि मानव मात्र के लिए कौन सी व्यवथा दी जाये जिससे वह भी शांति का सुकद वातावरण निर्मित किया जाये जिस से विषमता कि धू धू करती ज्वालाए शांत हो सकते।उनके अन्तरंग में एक संवेदन शील दिल धडकता है जिसमे करुणा का सागर हिलोरे लेता है।इसलिए क्षुल्लक बनकर भी वे संतुष्ट नहीं हुए और समपूर्णतया के लिए प्रयत्नशील रहे।लंगोटी और चादर भी परिग्रह है,बोझ है,भार है यह समझकर १०८ श्री शांति सागर जी (हस्तिनापुर वालों )से गंनोर मंदी जिला सोनी पत मे चैत्र वादी १५ संवत २०५१ (१० अप्रैल १९९४ )को लंगोटी के भार से निर्भार हो कर बन गए पूज्य मुनि श्री १०८ धर्म भूषण जी महाराज और सम्रद्ध कर दी वह पुनीत पावन परम्परा जो श्रमण रत्न संत शिरोमणि चरित्र रत्नाकर १०८ श्री शांति सागर जी "छाणी",आचार्य सूर्य सागर,आचार्य जय सागर ,आचार्य शान्तिसागर (हस्तिनापुर वाले ) महाराज जी है । इस परम्परा के आप पट्ट शिष्य आचार्य श्री १०८ धर्म भूषण जी है।पूज्य मुनि श्री कि साधना अनवरत चलती रही और मुजफ्फर नगर (उ.प्र.)में ज्येष्ठ सुदी ३ संवत २०५४ (८ जून १९९७)को उन्हें आचार्य पद प्रदान किया गया।पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गौरव प्रथम आचार्य श्री धर्म भूषण जी सम्पूर्ण भारत में आज आपनी कठोर साधना के कारन विख्यात है।

 


आचार्य श्री १०८ शांति सागर जी महाराज (छाणी)
आचार्य श्री १०८ सूर्य सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ विजय सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ विमल सागर जी महाराज (भिंड वाले)
आचार्य श्री १०८ निर्मलसागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ जयसागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ शांतिसागर जी महाराज (हस्तिनापुर वाले)
आचार्य १०८ श्री धर्म भूषण जी महाराज

Aacharya Shri 108 Dhrambhushan Sagar ji


Brief Introduction

Birth :
Shravan Shukla 7 Vikram Samvat 1996 Year 1940
Birth Place: 
Gram-Karnaval,Merath
Birth Name :
Shri Prem Chand Jain
Mothers Name :
Shrimati Hukma Devi Jain
Father’s Name :
Shri DaalChand Jain
Ksullak Diksha :
Phalgun Sudi 10,Vikram Samvat 2037,15 March 1981
Place of Kshullak Diksha :
Rampur Maniharn
Muni Diksha :
Chaitra Vadi 15 ,10 April 1994
Place of Muni Diksha :
Gannor Mandi Sonipat
Diksha Guru :
Aacharya Shri 108 Shanti Sagar Ji Maharaj(Hastinapur)
Acharya Pada:
Jyesth Sudi 3,8 June 1997
Place of Acharya Pada:
Mujaffar Nagar ,UP

Aacharya Shri 108 Shantisagar Ji Maharaj (Uttar)
Aacharya Shri 108 Surya Sagar Ji Maharaj
Aacharya Shri 108 Vijay Sagar Ji Maharaj
aacharya Shri 108 Nirmal Sagar Ji Maharaj
Aacharay Shri 108 Jai Sagar Ji Maharaj
Aacharya Shri 108 Shanti Sagar ji Maharaj(Hastinapur)
Aacharya Shri 108 Dhrambhushan Sagar Ji Maharaj