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आचार्य श्री १०८ जय सागर जी महाराज

पिता सुन्दरलाल के घर जन्मे सुनील(कल्लू )।आपकी माता जी नाम चमेली बाई था।आपका जन्म पिंडराइ ग्राम में हुआ था ।बचपन से ही आप पर आपकी दादी माँ (जो बाद में आर्यिका देव मति माता जी बनी)का बड़ा स्नेह था ।आपके अन्दर धामिक संस्कार दादी माँ के द्वारा ही आये थे।आपके बड़े भाई शरद छोटे भाई सन्देश और बहिन सुषमा के साथ खेलकर आपका बचपन निकला।सुनील को बचपन से ही दादी माँ का बहुत प्यार मिला।आपके पिता जी देहांत बहुत जल्द हो गया ।आपकी परवरिश आपकी माँ , दादी माँ ने और बड़े भाई ने की।पारस (अब मुनि पुलक सागर जी )आपके बड़े पापा (ताऊ)के लड़के थे।जब वो पिंडराइ आते तो दादी माँ उनके साथ सभी को सुबह अभिषेक पूजनके लिए ले जाया करती ।छोटी सी उम्र में धोती पहनना ,कलश देकर अभिषेक करना ये इनकी नित्य क्रिया में शामिल था ।सुनील बचपन में पारस की धोती खींच देते थे ।तब दादी माँ समझाती कोई बात नहीं हमारे भगवान् बन ने केलिए कपडे उतरने पड़ते है।कौन जनता था की ये दोनों बालक आगे चलकर आचार्य जय सागर और मुनि पुलक सागर बनकर जैन धर्म की प्रभावना करेंगे।

संक्षिप्त परिचय

जन्म:  
जन्म स्थान : पिंडराइ ग्राम
जन्म का नाम सुनील(कल्लू )
माता का नाम : चमेली बाई
पिता का नाम : सुन्दरलाल जैन
मुनि दीक्षा : ११ नव. १९८४
दीक्षा गुरु : आचार्य श्री १०८ सन्मति सागर जी महाराज
मुनि दीक्षा स्थल : पारसोला (राज.)
आचार्य पद तिथि:
आचार्य पद प्रदाता : आचार्य श्री १०८ सन्मति सागर जी महाराज


१ बार सुनील अपनी दादी माँ को लेकर मुक्तागिरी ले जाने का कार्यक्रम बनाया । वो लोग रायपुर आ गए।उनके परिचित के यहाँ पारिवारिक अडचने आ गयी जिससे वो मुक्तागिरी की यात्रा पर नहीं जा पाए,तभी पता चला की दुर्ग में सन्मति सागर जी महाराज विराजित है तो वो उनके दर्शन करने वह चले गए ।सुनील ने १९६८ में सर्वप्रथम आचार्य सन्मति सागर जी के दर्शन किये और दादी माँ को वह छोड़कर वापस लौट आये।तभी आचार्य श्री ने दशलक्षण के १० उपवास किये और प्रतिज्ञा ली वे पूनम को तभी आहार लेंगे जब कोई दीक्षा लेने का नियम लेगा।तब आपकी दादी माँ ने दीक्षा के लिए आचार्य श्री से निवेदन किया और वो बन गयी क्षुल्लिका देवमती।सुनील ने भी आचार्य श्री विद्यासागर जी के पास जाकर ब्रह्मचर्य व्रत का नियम ले लिया ।उनकी क्षुल्लक दीक्षा का दिन जुलाई १९८५ में तय हुआ ।परन्तु किसी कारन से आचार्य विद्या सागरजी ने अन्य ब्रह्मचारीगणों को दीक्षा दे दी और सुनील को से कहा तुम्हे बाद में देंगे।यहाँ बात सुनील को समझ में नहीं आई की पहले हां करने के बाद बाद में मना क्यों कर दी।अत: वो अपनी आर्यिका देवमती माता जी के पास आया और अपनी सारी बात उन्हें बताई।तब उन्होंने आचार्य श्री सन्मति सागर जी से सुनील को दीक्षा देने की बात कही।आचार्य श्री तैयार हो गए और ११ नव. १९८४ को पारसोला (राज.) में उन्हें उन्हें मुनि दीक्षा दी गयी और नाम पाया मुनि श्री १०८ जय सागर जी महाराज।आगे जाकर आचार्य सन्मति सागर जी ने उन्हें आचार्य पद देकर उन्हें बना दिया आचार्य श्री १०८ जय सागर जी महाराज ।


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Aacharya Shri 108 Jai Sagar Ji


Brief Introduction

Birth :
 
Birth Place: 
Pindrai
Birth Name :
Sunil Jain
Mothers Name :
Smt. Chameli Bai
Father’s Name :
Sundarlaal
Diksha Tithi :
11 Nov. 1984
Diksha Name :
Muni Shri 108 Jai Sagar Maharaj
Diksha Guru:
Acharya Shri 108 Sanmati Sagar Ji Maharaj
Place of Muni Diksha :
Parsola,Raj.
Aacharya Pad :
Acharya Pad Pradata:
Aacharya Shri 108 Sanmati Sagar Ji Mahgaraj
Place:


Aacharya Shri 108 Aadisagar Ji Maharaj (Anklikar)
Aacharya Shri 108 Mahaveer Kirti Ji Maharaj
Aacharya Shri 108 Vimal Sagar Ji Maharaj
Aacharya Shri 108 Sanmati Sagar Ji Maharaj
Aacharya Shri 108 jai Sagar Ji Ji Maharaj