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आचार्य श्री १०८ नेमिसागर जी महाराज


इनके पिता का नाम अन्ना था |इनके १ भाई की म्रत्यु पैदा होते ही हो गयी |दुसरे भाई की म्रत्यु ८ वर्ष की आयु में हो गयी |माता की म्रत्यु के समय इनकी आयु १२ वर्ष की थी |नेमिनाथ तीर्थंकर की माता का नाम शिवादेवी था ,इनकी माता जी का भी यही नाम था |जहा इनकी दीक्षा के संस्कार हुए वहां नेमिनाथ भगवान् की मूर्ति थी जिससे इनका नाम नेमी सागर रखा गया |

संक्षिप्त परिचय

जन्म:  
जन्म स्थान : कुडची बेलगाँव
नाम : नेमन्ना
माता का नाम : शिवादेवी
पिता का नाम : नेमराज
ऐलक दीक्षा : सन १९२३, गोकाक जैन मंदिर
मुनि दीक्षा गुरु : चा.च.आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज
मुनि दीक्षा तिथि: कार्तिक सुदी १५ संवत १९८१
मुनि दीक्षा स्थान : समडोल बेलगाँव
मुनि दीक्षा नाम : मुनि श्री १०८ नेमिसागर जी महाराज
समाधि :  
आचार्य पद त्याग :  
आचार्य श्री १०८ नेमि सागर जी महाराज बहुत ही सरल स्वाभाव के थे |इनके बचपन का नाम नेम्मना स्वामी था |जैन धर्म से पूर्ण विमुख व्यापारी के जीवन को आचार्य शांति सागर जी ने बदल के रख दिया |और नेम्मना स्वामी को आचार्य नेमी सागर बना दिया |उनका दीक्षा से १ उपवास और १ एकासन का व्रत का नियम था |इस प्रकार उनका जीवन उपवासों में बीता |उन्होंने तीस चौबीसी व्रत के ७२० उपवास किये |कर्म दहन के १५६ तथा चरित्र शुद्धि व्रत के १२३४ उपवास किये |दस लक्षण में ५ बार १० -१० उपवास किये |अष्टान्हिका में ३ बार ८ -८ उपवास किये |इस प्रकार २४ उपवास किये |सोलह कारण व्रत के १६ उपवास भी किये |२ ,३ ,४ उपवास तो जब चाए तब कर लेते थे |उन्हें उपवास में आनंद आता था |इनके दीक्षा लेने के भाव १८ वर्ष की आयु में हो गये थे | उनका उसके पूर्व के जीवन की कथा बड़ी अद्भुत है जो इस प्रकार है :- नेमिसागर जी महाराज का पूर्व का जीवन सच मुच में आचार्य पद था |उन्होंने यह बात बताई थी ”मैं अपने निवास स्थान कुड्ची ग्राम में मुसलमानों का बड़ा स्नेह पत्र था |मैं मुस्लिम दरगाह में जाकर पैर पड़ा करता था |१६ वर्ष की उम्र तक उनकी दरगाह पर जाकर अगरबत्ती जलाता था ,शक्कर चढ़ाता था |वहां योवानो की संख्या अधिक है |जब मुझे अपनी महिमा का बोध हुआ तब मैंने दरगाह आदि की तरफ जाना बंद कर दिया |मेरा परिवर्तन मुसलमानों को सहाय नहीं हुआ |वे लोग मेरे विरुद्ध हो गए और मुझे जान से मारने का विचार करने लगे |जहा मोका मिलता है यवन वर्ग बल प्रयोग करता आया है |ऐसी स्तिथि में अपनी धर्म प्रभावना के रक्षण निम्मित्त में कुड्ची से चार मील की दुरी पर स्थित एनापुर ग्राम में चला गया |वह के पाटिल की धर्म में रूचि थी |वहा हम पर बहुत प्यार करता था |इससे एनापुर में रहना ठीक समझा |फिर वहां पर ठेके पर जमीन लेकर रामू (जो बाद में कुन्थु सागर महाराज के रूप में प्रसिद्द हुए )और मैंने काम चालू किया |आचार्य महाराज नस्लापुर में थे में उनके पास १ माह तक रहा | चातुर्मास एनापुर में हुआ |में हर समय उनके पास रहा |नेमी सागर और रामू ने शर्त राखी की ६ माह के भीतर अवश्य दीक्षा लेंगे |इसके बाद पाय सागर और मैंने एक साथ एलक दीक्षा ली |पहले मेरी दीक्षा के संस्कार हुए |एलक दीक्षा के १० महीने के बाद मुनि दीक्षा ली |
नेमि सागर जी का गुठनो के बल बैठ कर आसन लगाने में प्रसिद्द रहे है |उन्होंने बताया इस आसन के लिए विशेष एकाग्रता लगती है |इससे मन का निरोध होता है |बिना एकाग्रता के यह आसन नहीं बनता है |इसे गोड़ासन कहते है |गोड़ासन करने की प्रारंभ अवस्था में गुठने पर फफोले उठ आये थे परन्तु उनको दबाकर अपना आसन का कार्य जारी रक |(महाराज जी की आसन की फोटो सबसे ऊपर देखे )


आचार्य श्री १०८ शांति सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ नेमि सागर जी महाराज

आचार्य श्री १०८ नेमिसागर जी महाराज





आचार्य श्री १०८ शांति सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ नेमि सागर जी महाराज