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आचार्य श्री १०८ पार्श्व सागर जी महाराज

कार्तिक सुदी ६ विक्रम संवत १९७२ शनिवार श्रवण नक्षत्र में जन्मे श्री पार्श्व सागर जी महाराज के बचपन का नाम राजेन्द्रकुमार था।आपका जन्म कोटला नाम के गाँव में हुआ था।आपके पिता का नाम राम स्वरुप और माता का नाम जानकी बाई था।बुद्धि की तीव्रता से आपने जल्द ही मिडिल क्लास पास कर ली और आगे की पड़ी के लिए मुरेना चले गए।परन्तु पापोदय से आपके पिता जी की म्रत्यु ३६ वर्ष की अवस्था में हो गयी ।आप मुरेना छोड़कर वापस घर चले आये ।उस समय से आपका मन घर से उदास ही रहता था,पर माँ की सेवा करने के लिए घर मे रहकर ही ब्रह्मचर्य का पालन करने लगे।४३ वर्ष तक माके साथ रहकर उनकी समाधि करायी ।समाधि कराने के बाद कुछ समय ही घर पर रहे ।

संक्षिप्त परिचय

जन्म: अश्विनी कृष्णा ७ सन १९१५
जन्म स्थान : कोसमा उत्तरप्रदेश
जन्म का नाम नेमिचंद्र जैन
माता का नाम : कटोरिदेवी जैन
पिता का नाम : बिहारिलालजी जैन
मुनि दीक्षा तिथि : फाल्गुन शुक्ला १३ सन १९५२
दीक्षा नाम : विमलसागरजी महाराज
दीक्षा गुरु : आचार्य श्री १०८ महावीरकीर्तिजी महाराज
मुनि दीक्षा स्थल :  
आचार्य पद तिथि:  
आचार्य पद प्रदाता: आचार्य श्री १०८ महावीरकीर्तिजी महाराज
समाधि स्थल : सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र
समाधि तिथि : पौष कृष्णा १२ सन १९९४
विशेषता : विध्वान, निमित्तज्ञान शिरोमणि

वैराग्य का कारण :पर्युषण पर्व की चतुर्दशी के दिन उपवास किया था ।प्रात: काल की दिनचर्या और अभिषेक पूजन के बाद चटाई पर लेटे थे ,अचानक नींद लग जाती है और उन्हें स्वप्न आता है कि दो जंगली सूअर सामने रखे खाने के लिए आक्रमण करते है,इनमे से १ ने तो कंधे पर पैर रखकर खाने कि कोशिश की और दुसरे पुन: खाने के लिए झपटता है।इतने में नींद खुल जाती है,शरीर काप जाता है ,देखते है यहाँ न तो सूअर है न खाना ।मैंने तो उपवास किया है और नींद लग जाने से ये स्वप्न आया है।मेरा जीवन व्यर्थ में ही नष्ट हो रहा है इस लिए मुझे आत्म कल्याण करना चाइये।ऐसा निश्चय कर जिसका कर्ज देना था उसका सामान बेच कर कर्ज चुकाते है ।आचार्य श्री विमल सागर जी म.प्र. में विराजमान है ऐसा जान कर कार्तिक सुदी १२ दिन गुरूवार दिनांक १२/११/५९ को सातवी प्रतिमा के व्रत ग्रहण करते है। और उनका नाम पार्श्व कीर्ति रक जाता है। फागुन सुदी १४ दिनांक १२/३/६० को क्षुल्लक दीक्षा लीऔर नाम बाहुबली सागर रखा गया।सावन सुदी ७ में मुनि दीक्षा आचार्य विमल सागर जी द्वारा १८/८/६१ को प्रदान की गयी और आप मुनि श्री १०८ पार्श्व सागरजी बन गए ।गुरु के पास रहकर ११ वर्ष तक आपने गहन अध्यन्न और तप चरण करके हर कार्य में समर्थ होकर धर्म प्रभावना करी ।गुरु आज्ञा से संघ से प्रथक विहार कर सेकड़ो व्रती बनाये,अनेको दीक्षाए दी और कई लोगो को पापो का त्याग करवाकर धर्म के मार्ग पर लगाया।सागवाडा चातुर्मास में संवत २०३६ दिनांक ६/१२/१९७९ को आचार्य विमल सागर जी ने पत्र द्वारा पीछी,भाव और मुर्हत भेजकर चतुर्विध संघ और समाज द्वारा आचार्य पद प्रदान किया ।सन १९८१ फागुन सुदी १४ को आपने १२ वर्ष की समाधि का नियम लिया ।सन १९८५ में श्रवणबेलगोला में आपने (४ रस का त्याग तो पहले से था ) दूध और बुरे का भी आजन्म त्याग कर दिया।सन ८८ में महावीर जयंती के दिन धान्य का भी त्याग कर दिया ।२९/५/८८ को आपने चन्द्र प्रभु भगवान् को साक्षी मान कर आहार पानी का त्याग कर यम समाधि ले ली।आषण वदी एकम के दिन सायं काल के समय आचार्य श्री ने इस नश्वर शरीर का त्याग कर दिया


आचार्य श्री १०८ आदिसागर जी महाराज (अंकलीकर)
आचार्य श्री १०८ महावीर कीर्ति जी महाराज
आचार्य श्री १०८ विमल सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ पार्श्व सागर जी महाराज

Aacharya Shri 108 ParshvSagar Ji

 


Brief Introduction

Birth :
Ashwin krisna 7 ,Year 1915.
Birth Place: 
Kosma Uttarpradesh
Birth Name :
Nemichandra Jain
Mothers Name :
Katoridevi Jain
Father’s Name :
Biharilal Jain
Muni Diksha :
Falgun Shukl 13 ,Year-1952
Diksha Name :
Vimal Sagar Ji Maharaj
Diksha Guru:
Aacharya Mahaveer Kirti Ji
Place of Muni Diksha :
 
Place of Aacharya Pad :
Tundla Uttarpradesh
Aacharya Diksha :
 
Acharya Pad Pradata:
Aacharya Mahaveer Kirti Ji
Samadhi Place:
SammedShikharji Siddhakshetra
Samadhi Tithi
Poash Krishna 12 Year-1994
Importance
Nimmit Gyani.


Aacharya Shri 108 Aadisagar Ji Maharaj (Anklikar)
Aacharya Shri 108 Mahaveer Kirti Ji Maharaj
Aacharya Shri 108 Vimal Sagar Ji Maharaj
Aacharya Shri 108 Parshva Sagar Ji Maharaj