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आचार्य श्री १०८ पाय सागर जी महाराज


आचार्य श्री १०८ पाय सागर जी महाराज का जन्म ऐनापुर ग्राम में हुआ था।उन्होंने अपने बारे में बताया की वो एक नाटक कम्पनी का प्रमुख अभिनेता थे। आपसी अनबन होने के कारण उन्होंने कम्पनी छोड़ दी थी ।और वो कुछ दिन तक क्रांतिकारी सरीके रहे।मैंने मिल मालिको के विरोध में मजदूरों के सत्याग्रह की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन दिया।इसके बाद मेरमण सांसारिक विडंबना से उचटा।अपने कूलधर्म जैनधर्म का बिलकुल भी ज्ञान नहीं था ।यहाँ तक की णमोकार मंत्र कोभिनाही जानता था।इसलिए मैंने जटाविभूतिधारी रुद्राक्ष माला -अलंकृत चिदम्बर बाबा का रूप धारण किया औरिन साधुत्व का अभिनय करता हुआ काशी पंहुचा।गंगा जी में गहरे गोते लगाये।वह पर हर्प्रकर के साधुओं से मिला।में लोकिक कार्यों में पूर्ण दक्ष था,इसलिए साधु बनने पर पर भी मेरी विचार शक्ति मृत नहीं हुई।वह मुर्छित अवश्य थी।जब में जटा विभूति धारी सधुके रूप में शोलापुर पंहुचा तब मेरी द्रष्टि में यह बात आई कि पाखंडी साधु के रूप में फिर कर आत्म वंचना तथा पर प्रतारणा के कार्य में लगे रहना महा मुर्खता है।मैंने भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के शास्त्रों का परिशीलन किया था,उस शास्त्र ने साहस प्रदान किया कि में उस साधुत्व के वेष का त्याग कर सका।अब में सुन्दर वस्त्रादि से सुसज्जित गुंडे के रूप में यत्र तत्र विचरण करने लगा शायद ही कोई ऐसा दोष हो जो मुझमे न हो।मैं अत्यंत विषयान्ध व्यक्ति बन गया।

संक्षिप्त परिचय

जन्म: फाल्गुन शुक्ला ५
जन्म स्थान : ऐनापुर
नाम :  
माता का नाम :  
पिता का नाम :  
ऐलक दीक्षा : कार्तिक सुदी ४ , सन १९२३, गोकाक जैन मंदिर
मुनि दीक्षा गुरु : चा.च.आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज
मुनि दीक्षा तिथि: वीर सं. २४५६,सन 1929
मुनि दीक्षा स्थान : सिद्ध क्षेत्र सोनागिर जी
मुनि दीक्षा नाम : मुनि श्री १०८ पाय सागर जी महाराज
समाधि : स्तवनिधि तीर्थ (कर्णाटक)
आचार्य पद त्याग : १२ अक्टूबर १९५६
सुयोग कि बात है ।उग्र तपस्वी दिग. आचार्य शान्तिसागर जी महाराज का कोन्नुर आना हुआ।उस समय में सायकिल हाथ में लिए बना ठना उनके पास से निकला ।सेकड़ों जैनी उन मुनिराज कि प्रणाम करते।मैं वहां एक कोने में खड़ा हो गया।मेरी नजर उन पर पड़ी ।मैंने उन्हें ह्रदय से उन्हें प्रणाम नहीं किया ।नाम मात्र को हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया।उस समय उनके साथ वाले लोगों ने महाराज जी को मेरे विषय में बताया और कहा -"महाराज ये जैन कुलोत्पन्न है।महान व्यसनी है।इसे धर्म का कुछ नहीं सुहाता ।मेरी निंदा महाराज जी के कानो में पहुची किन्तु उनके मुख मंडल पर अपूर्व शांति थी ।नेत्रों में मेरेप्रती करूणा थीऔर बलबान आकर्षण शक्ति थी।महाराज ने लोगों को शांत किया ।उनके मुह से ये शब्द निकले ,'इसने आज हमारे दर्शन किये है इसलिए इसे कुछ न कुछ लाभ अवश्य होगा '
मैं उनके मुखमंडल को बड़े ध्यान से टकटकी लगाये देख रहा था।सचमुच में शांति के सागर दिखे'। में भारत भर घूमकर बड़े बड़े नामधारी साधु देखे थे,मुझे ऐसा लगा कि आज सचमुच में मुझे इस साधु के रूप में अपूर्व निधि मिली।मैंने उन्हें अध्यात्मिक जादूगर के रूप में देखा ।मेरे मन में आंतरिक वैराग्य का बीज पहले से ही था उनके संपर्क ने उसमे प्राण दाल दिए।
मैंने उनके जीवन का बहुत सूक्ष्मता से अधयन्न किया।उठते बैठते ,बोलते चलते उनकी साडी प्रवृतियों की बारीकी से जांच की।उस समय मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि आज मुझ आद्यात्मिक अंधे को सचमुच में नेत्रों की उपलब्धि हो गयी है।मैंने उनसे मांस ,मधु,मद्य के सेवन के त्याग का नियम ले लिया।हिंसा आदि पापों के त्याग और देव दर्शन करने का नियम लिया।मेरी आत्मा पर उनका इतना प्रभाव पड़ा कि मैंने उनसे आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का नियमले लिया।लोगो ने मेरे पुराने जीवन को देख कर विरोध किया परन्तु मेरे निवेदन करने पर उन्होंने मुझे ऐलक दीक्षा प्रदान की।चन्द्र सागर जी ने आक्षेप किया की इसे तो प्रतिमाओं का स्वरुप भी नहीं पता ये ऐलक पद का निर्वाह केसे करेगा। उस समय मैंने महाराज जी से कहा की मैं शेड्वाल की पाठशाला में जाकर अधयन्न करना चाहता हूँ।उस समय सबको यह भय था की ये वापस आएगा या भी नहीं ।तब मेरी जमानत बालगोंडा ने ली।अद्यान्न करके आने पर मेरा प्रवचन हुआ जिस से साडी जनता बहुत प्रभावित हुई ।उसके बाद मेरी दीक्षा मुनि नेमी सागर जी के साथ एक ही दिन हुई।"
विशेष :- जब ये आहार करते थे तो आहार के बीच में इतने ध्यान मग्न हो जाते थे की लोगो को बोल कर बताना पड़ता था की महाराज जी आहार चल रहे है। अंत समय में रोगों ने इन्हें घेर लिया फिर भी संयम के पथ से कभी नहीं हटे और कहते थे ये मेरे पूर्व कर्म का उदय है।इनका जीवन बहुत ही शिक्षाप्रद रहा है।


आचार्य श्री १०८ शांति सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ पाय सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ अनंत कीर्ति जी महाराज
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श्वेतपिच्छाचार्य १०८ श्री विद्यानंद जी महाराज

Aacharya Shri 108 Paay Sagar Ji Maharaj


Brief Introduction

Birth :
Phagun Shukla 5
Birth Place: 
Ainapur
Name :
 
Ailak Diksha :
Kartik Sudi 4
Ailak Diksha Place :
Gokaak Jain Mandir
Place of Muni Diksha :
Kolhapur
Muni Diksha Guru :
Acharyashri Shanti Sagar Ji Maharaj
Muni Diksha Tithi:
14 Dec 1961
Acharya Pada Guru:
 
LANGUAGES KNOWN
 


Aacharya Shri 108 Shantisagar Ji Maharaj (Charitra Chakravarti)
Aacharya Shri 108 Paaysagar Ji Maharaj
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