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आचार्य श्री १०८ पुण्य सागर जी महाराज

आचार्य श्री पुण्य सागर जी महाराज :राजस्थान की डूंगरपुर जिले के एक ग्राम में श्री मोहन लाल जी के घर में ,माता श्रीमती वीणा देवी की कुक्षी से जन्मे महावीर (आचार्य श्री पुण्य सागर जी का बचपन का नाम ) । मोहन लाल जी और श्रीमती वीणा देवी जी दोनों ही धर्म परायण थे ।एक दिन वीणा देवी ने श्री मोहन लाल जी से कहा की उन्हें कुछ दिनों से बहुत ही सुन्दर सुन्दर स्वप्न आ रहे है और सपने में जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन होते है ।तब उन्होंने कहा ऐसा लगता है आपकी कोख से कोई पुण्यात्मा जीव का जन्म होगा ।तब वीणा जी का ख़ुशी का और बाद गयी जब ३ सितम्बर को उन्होंने १ पुत्र को जन्म दिया ।उनका नाम महावीर रखा गया ।और किसे पता था की यह महावीर भी महावीर की तरह ही आगे जाकर जैन धर्म की प्रभावना करेगा ।आपको बचपन से ही माता पिता ने धर्म के संस्कारों दिए ।बचपन में ही महावीर जी ने सत्य ,अहिंसा और क्षमा को धारण कर लिया था ।१ बार उनके ग्राम में आचार्य श्री सन्मति सागर जी का आगमन हुआ।पूरा गाँव ही धर्ममय हो गया ।उस समय आचार्य श्री ने छोटे बच्चो को धर्म का ज्ञान देने के लिए पाठशाला की स्थापना की ।उन बच्चो में महावीर भी था ।आचार्य श्री ने प्राचीन पद्धति के अनुसार जनेहु पहनाकर शिक्षा देना प्रारंभ की।जनेहु पहना देख महावीर के माता पिता ने आचार्य श्री सन्मति सागर जी से निवेदन किया की कृप्या आप इसका जनेहु उतर दीजिये ये ७ बहनों में केवल १ ही भाई है ।तब आचार्य श्री ने कहा की १ वर्ष के पालन के बाद इसका जनेहु उतार देना लेकिन १ बात याद रखना की इसके कदम घर में नही टिकेंगे ।और ये आगे चलकर जैन धर्म की पताका फेरायेगा ।आचार्य श्री के ऐसे वचन सुनकर माता पिता दोनों डर गए ।महावीर का मंदिर आना जाना भी बंद हो गया ।लेकिन जिस प्रकार हवा और मन को वश में करना मुश्किल है वैसे ही महावीर को घर मे रोकना भी मुश्किल था ।१ वर्ष बाद ही पिता के व्यापार के कारण परिवार को सागवाडा जान पड़ा ।जब महावीर १४ वर्ष के हुए तब वहां आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी का आगमन हुआ ।पूरा परिवार प्रवचन सुन ने जाता था केवल महावीर को जाने की आज्ञा नहीं थी ।लेकिन महावीर जयंती के कुच्दीन पूर्व पता नही महावीर के मन में क्या आया वो पहुच गये आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी के प्रवचन सुनने ।सभा में सबसे पीछे बैठकर आचार्य श्री के मार्मिक प्रवचन सुनने लगे ।प्रवचन का प्रभाव पड़ा की वो घर जाना भी भूल गये और व्ही आचार्य श्री के पास रुक गये ।अगले दिन जब माता पिता ने उन्हें सफ़ेद कपडे में देखा तो घर चलने के लिए कहा।तब आपने घर जाने से मना कर दिया ।तब घरवालो ने आचार्य श्री से कहा की वो सिर्फ उसे खाना खिलने ले जाना चाहते है ।तब आचार्य श्री की आज्ञा से वो घर चले गये ।परन्तु माता पिता ने उसे घर में ही बंद कर दिया ।उसके बाद २ दिन तक महावीर ने खाना नही खाया तब घर वाले उन्हें वापस आचार्य श्री के पास ले गये।और वहा वो बढ़ गये जैनिश्वरी दीक्षा के लिए ।तब माता ने बहुत समझाया और कहा कि मुनि धर्म पालना असान काम नहीं है।तब महावीर ने कहा कि असान काम तो सब कर लेते है कठिन काम करना ही दरियादिल कि पहचान है ।तब माता जी ने आशीर्वाद दिया कि जा ही रहे हो तो पीछे मुड़कर मत देखना ,मुनि धर्म का पालन करना और अपने कुल कि मर्यादा बनाये रखना ।इसके बाद आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी ने पहले क्षुल्लक फिर एलक और फिर मुनि पुण्य सागर बना दिया ।कुछ समय आचार्य श्री के साथ रहकर अकेले विहार किया।उनके प्रवचन और गंभीर चिंतन से जन मानस में ऐसे गहरी छाप छोड़ी ।सन १९९३ में क्षुल्लक दीक्षा के बाद प्रथम चातुर्मास भिंड -इटावा में हुआ जहा आहार के बाद मौन रहकर साधना और शास्त्रों का अध्ययन प्रमुख कार्य था ।

संक्षिप्त परिचय

जन्म: ३ सितम्बर
जन्म स्थान : जिला -डूंगरपुर ,राजस्थान
जन्म का नाम महावीर जैन
माता का नाम : श्रीमती वीणा देवी
पिता का नाम : श्री मोहन लाल जी
क्षुल्लक दीक्षा तिथि : सन १९९३
ऐलक दीक्षा तिथि :  
ऐलक दीक्षा गुरु : आचार्य श्री १०८ पुष्पदंत सागर जी महाराज
मुनि दीक्षा तिथि : ३१ जनवरी , १९८०
दीक्षा नाम : पुण्य सागर जी महाराज
दीक्षा गुरु : आचार्य श्री १०८ पुष्पदंत सागर जी महाराज
मुनि दीक्षा स्थल :  
आचार्य पद तिथि:  
आचार्य पद प्रदाता:  
आचार्य पद स्थल :  
विशेषता :  


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