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आचार्य श्री १०८ सन्मति सागर (अजमेर वाले )


मानव समाज का कल्याण करने वाले भव्यों को मोक्ष मार्ग पर लगाने वाले दिग . साधुओं में आचार्य श्री सन्मति सागर (अजमेर वालों )का परम स्थान है |आप अत्यंत सरल स्वभावी साधू थे | आपका जन्म राजस्थान के प्रसिद्द अजमेर नगर में खंडेलवाल जैन समाज के ब्रिज गोत्रीय परिवार में श्रीमान सेठ फूल चंद जी की धर्म पत्नी जोधी बाई की कुक्षी से मिति भाद्रपद शुक्ल सप्तमी विक्रम संवत १९६८ को हुआ | आपका बचपन का नाम भवरलाल था |छोटी सी उम्र में ही माता पिता का देहांत हो गया |आपका पालन पोषण एवं विद्याद्यान्न कार्य आपके चाचा जी श्री सेठ मानमल जी जैन तथा इनके पुत्र श्री भागचंद द्वारा हुआ | आपकी बहिन भावरी बाई है जिनका विवाह जोधपुर निवासी श्री सेठ धन्नालाल जी के साथ हुआ | आपके मामा श्री सेठ चैन सुख जी दोसी ,मल्हार गंज ,इंदौर निवासी है | आपकी धार्मिक शिक्षा सेठ भाग चंद सोनी के परिवार द्वारा संचालित जैन पाठशाला में हुई तथा लोकिक शिक्षा सरकारी स्कूल में हुई | बाद में आप किराना की दुकान पर संतोष मय जीवन बिताने लगे |श्रावक के योथोचित कर्म आदि नित्य क्रिया करने लगे |

संक्षिप्त परिचय

जन्म: भाद्रपद शुक्ल सप्तमी विक्रम संवत १९६८
जन्म स्थान : अजमेर,राजस्थान
नाम : भवरलाल
माता का नाम : जोधी बाई
पिता का नाम : श्रीमान सेठ फूलचंद जी
क्षुल्लक दीक्षा गुरु : : मुनि श्री १०८ निर्मल सागर जी
क्षुल्लक दीक्षा : विक्रम संवत २०११
मुनि दीक्षा गुरु :
मुनि दीक्षा तिथि: विक्रम संवत २०२५
मुनि दीक्षा स्थान : दिल्ली के पास खेकड़ा ग्राम
मुनि दीक्षा नाम : मुनि श्री १०८ सन्मति  सागर 
आचार्य पद : समाज और साधुओं ने आपको आचार्य पद से विभूषित किया
समाधि : संवत २०४३ फागुन सुदी ४ दिनांक ३ -३ - ८७
समाधि स्थान : झरला पाटन

संसार की विचित्रता का ध्यान रकते हुए उदासीन रूप में रहते थे |वैराग्य मय परिणाम होने के कारण आपने आजीवन ब्रह्मचारी रहना ही उचित समझा | एक समय अजमेर में १०८ मुनि श्री विमल सागर जी (भिंड वाले )संघ सहित पदारे |उस समय वह १ ब्रह्मचारी जी की दीक्षा हुई |जिनका नाम शांति सागर रखा गया था | उस समय वैराग्य मय द्रश्य देख कर आपकी भी वैराग्य में ब्रद्धि होने लगी | जिसके कारण व्यापार तथा गृह कार्य में अरुचि के भाव होने लगे |कुछ समय बाद आपने विमल सागर जी से २ प्रतिमा के व्रत ग्रहण किये तथा अपना विशेष समय तत्व चर्चा में बिताने लगे |इसके बाद आप नसीराबाद आये |जहा पर श्री १०८ मुनि ज्ञान सागर जी विराजमान थे |उनके धर्मोपदेश से संयम तप की और आप की रूचि बढ़ने लगी |तब आपने सप्तम प्रतिमा के व्रत ग्रहण किये | विक्रम संवत २०११ में इसरी पञ्च कल्याणक के शुभ अवसर पर आपने मुनि श्री १०८ निर्मल सागर जी से क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की और उसके १ वर्ष बाद आपने एलक दीक्षा ग्रहण की | संवत २०२५ में आपने समस्त परिग्रह का त्याग कर मुनि दीक्षा ग्रहण की और आपका नाम सन्मति सागर रखा गया | दीक्षा दिल्ली के पास खेकड़ा ग्राम में हुई |कोटा पञ्च कल्याणक के अवसर पर आपने कोटा वाले सूरजमल को दीक्षा देकर विजय सागर नाम दिया |ब्रह्मचारी अहिल्या बाई को आर्यिका दीक्षा देकर विजय मति नाम रखा |ब्रह्मचारी जयंती लाल को क्षुल्लक दीक्षा दी जिसका नाम शान्तिसागर रखा |हीरालाल जी का नाम क्षुल्लक वीरसागर रखा |शिखर जी की यात्रा के बाद ग्वालियर की और विहार किया | कुण्डलपुर में आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी के संघ के साथ विक्रम संवत २०३५ का चातुर्मास किया |वर्षा योग के बाद विहार करते हुए अनेक गाँव से कटनी आ गए |कटनी से १ मील दूर किसी सिरफिरे ने मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर मारा |मक्खियो ने महाराज जी के शारीर पर काटना शुरू कर दिया | अति पीड़ा के बावजूद आगे चलते रहे कुछ देर बाद चक्कर आ गया | पंडित जगन मोहन लाल जी तथा कुछ श्रावकों को सुचना मिलते ही वहां पर आये और महाराज जी को ले आये |डॉ. ने महाराज जी के कान से मक्खियाँ निकाली |श्री सम्मेद शिखर जी दिग . जैन समाज और साधुओं ने आपको आचार्यकल्प की पदवी प्रदान की |श्री गोम्मटेश्वर महा मस्तकाभिषेक के बाद दक्षिण की यात्रा करते हुए बडवानी पहुचे |बडवानी से विहार करते समय एक गाँव में मुनि ऋषभ सागर जी जो बाद में युवाचार्य योगीन्द्र सागर हुए ने आपके दर्शन का लाभ लिया और आपके संघ के साथ हो लिए |संघ रानीपुर आया |वहां के श्रावकों की भक्ति पर चातुर्मास की स्वीकृति प्रदान की |वह की समाज और साधुओं ने आपको आचार्य पद से विभूषित किया तथा मुनि ऋषभ सागर जी को उपाध्याय पद से विभूषित किया नाम रखा गया योगिचंद्र सागर | इस रानी पुर के शुभ अवसर पर संवत २०२९ का आसोज सुदी १० बुधवार दिनांक २९ -१० -८२ को ब्रह्मचारी मगनलाल जी को क्षुल्लक दीक्षा देकर शील सागर नाम दिया अब आपके संघ में ५ पिच्छीधारी साधू हो गये | आचार्य गुरु सन्मति सागर जी ने इस नश्वर शरीर से निर्मम्त्व भाव सहित सावधानी पूर्वक समाधि मरण संवत २०४३ फागुन सुदी ४ दिनांक ३ -३ - ८७ को प्रात: ५ :१५ बजे झरला पाटन में स्वर्गवास हो गया |
आचार्य श्री १०८ सन्मति सागर (अजमेर वाले )