आचार्य श्री १०८ शांति सागर जी महाराज (छाणी)


संक्षिप्त परिचय

जन्म: कार्तिक वदी एकादशी, विक्रम संवत १९४५ (सन १८८८ )
जन्म स्थान : ग्राम - छाणी जिला- उदयपुर ,राजस्थान
जन्म का नाम श्री केवलदास जैन
माता का नाम : श्रीमती माणिकबाई
पिता का नाम : श्री भागचन्द्र जैन
ऐलक दीक्षा : सन १९२२ , विक्रम संवत १९७९
दीक्षा का स्थान : गढी, जिला - बासबाड़ा , राजस्थान
मुनि दीक्षा : भाद्र शुक्ल चौदस , संवत १९८० ,सन १९२३
मुनि दीक्षा का स्थान : सागबाड़ा , जिला-डूंगरपुर , राजस्थान
आचार्य पद : सन १९२६
आचार्य पद का स्थान : गिरिडीह , झारखण्ड
समाधि मरण : १७ मई १९४४ ज्येष्ठ वदी दशमी
समाधी स्थल : सागबाड़ा , जिला-डूंगरपुर , राजस्थान

दिगंबर वेश धारण कर दीक्षा लेना संयम का सर्वोच्च रूप है|बीसवी सदी में जैन मुनि परंपरा कुछ अवरुद्ध सी हो गयी थी , विशेष रूप से उत्तर भारत मे । शास्त्रों में मुनि महाराजों के जिस स्वरुप का अध्ययन करते थे,उसका दर्शन असंभव सा हो गया था । इस असंभव को तीन महान आचार्यों ने संभव बनाया, जो आचार्य आदिसागर अंकलीकर ,आचार्य शांति सागर (चरित्र चक्रवर्ती ) और आचार्य शांति सागर छाणी है ।इसमें आचार्य शांति सागर (चरित्र चक्रवर्ती ) और आचार्य शांति सागर छाणी दोनों सूर्यों का उदय समकालिक हुआ ।जिनकी परम्परा से आज हम मुनिराजों के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त करते है और अपने जन्म को धन्य मानते है ।
आचार्य श्री का नाम जन्म ईस्वी सन क्षुल्लक दीक्षा मुनि दीक्षा आचार्य पद समाधि प्राप्ति
आचार्य श्री १०८ शांति सागर दक्षिण 1872 1915 1920 1924 1955
आचार्य श्री १०८ शांति सागर (छाणी ) (उत्तर ) 1888 1922 1923 1926 1944
केसा संयोग है की दोनों ही आचार्य शांति के सागर है । दोनों हीओ आचार्यों ने भारत भर में मुनि धर्म व मुनि परंपरा को बढाया है । यहाँ तक की व्याबर (राजस्थान) में दोनों का ससंघ एक साथ चातुर्मास भी हुआ था ।
प्रशांत मूर्ति आचार्य शांति सागर जी छाणी (उत्तर) का जन्म कार्तिक वादी एकादशी विक्रम संवत १९४५ (सन १९८८)को ग्राम छाणी जिला उदयपुर (राजस्थान) में हुआ था । सम्पूर्ण भारत में परिभ्रमण कर भव्य जीवों को उपदेश देते हुए सम्पूर्ण भारतवर्ष में विशेष कर उत्तर भारत में इन्होने अपना भ्रमण क्षेत्र बनाया । उनके बचपन का नाम केवलदास जैन था जिसे उन्होंने वास्तव में सर्तक कर दिया । विक्रम संवत १९७९ (सन १९२२ ) में गढी , जिला बांसवाडा में क्षुल्लक दीक्षा एवं भाद्र पद शुक्ल चौदस संवत १९८० (सन १९२३ ) सागवाडा में मुनि दीक्षा तदुपरांत विक्रम संवत १९८३ (सन १९२६) में गिरिडीह में आचार्य पद प्राप्त किया ।दीक्षा उपरांत आचार्य महाराज ने अनेकत विहार किया।वे प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे । उन्होंने समाज में फेली कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया । मर्त्यु के बाद छाती पीटने की प्रथा ,दहेज़ प्रथा , बलि प्रथा आदि का उन्होंने डटकर विरोध किया ।छाणी के जमींदार ने तो उनके अहिंसा व्याख्यान से प्रभावित होकर राज्य मे सदेव के लिए हिंसा का निषेध करा दिया था और अहिंसा मय जैन धर्म अंगीकार कर लिया था ।
आचार्य श्री पर घोर उपसर्ग भी हुए जिन्हें उन्होंने समता भाव से सहा। उन्होंने मुलाराधना , आगम दर्पण , शांति शतक , शांति सुधा सागर आदि ग्रंथो का संकलन किया जिन्हे समाज ने प्रकाशित कराया ,जिस से आज हमारी श्रुत परंपरा सुरक्षित और वर्द्धिगत है । ज्येष्ठ वादी दशमी विक्रम संवत २००१ (सन १९४४ ) सागवाडा (राजस्थान) में आचार्य श्री शांति सागर जी छाणी का समाधि मरण हो गया ।
क्षाणी परंपरा में आचार्य श्री सूर्यसागर जी, आचार्य श्री विजयसागर जी हुए|

 


आचार्य श्री १०८ शांति सागर जी महाराज (छाणी)
आचार्य श्री १०८ सूर्य सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ विजय सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ विमल सागर जी महाराज (भिंड वाले)
आचार्य श्री १०८ सुमति सागर जी महाराज
आचार्य श्री विद्याभूषण सन्मति सागर जी

Aacharya Shri 108 Shantisagar Chani (Uttar)


Brief Introduction

Birth :
Kartik Vadi 11,Vikram Sanvat 1945,(1888)
Birth Place: 
Gram-Chani ,District - Udaypur
Birth Name :
Shri Kevaldas Jain
Mothers Name :
Shrimati Manik Bai
Father’s Name :
Shri Bhagchand Jain
Place of Kshullak Diksha :
1922,Vikram Samvat 1979,Gadi,District-Baasbaada,Raj.
Muni Diksha :
Bhadra Shukl 14, Samvat 1980,23 Sep.1923
Place of Muni Diksha :
Saaghbaada ,District - Dungarpur ,Rajsthan
Acharya Pada:
1926,vikramSamvat 1983,Giridih ,Jharkhand
Samadhi :
Saagbaada (Raj.), Jyeshth Vadi 10, Vi Samvat 2001,(wed. 17 may 1944)
 


Aacharya Shri 108 Shantisagar Ji Maharaj (Uttar)
Aacharya Shri 108 Surya Sagar Ji Maharaj
Aacharya Shri 108 Vijay Sagar Ji Maharaj
Aacharya Shri 108 Vimal Sagar Ji Maharaj(Bhind)
Aacharya Shri 108 Sumati Sagar Ji Maharaj
Aacharya Shri 108 Vidyabhushan Sanmati Sagar Ji Maharaj