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आचार्य श्री १०८ वासुपुज्यसागर जी महाराज

मध्य प्रदेश को बड़ा सोभाग्य प्राप्त हुआ कि जैन धर्म के महान आचार्यों में से एक ,गुजरती,मराठी,हिंदी,मेवाड़ी आदि भाषाओँ के ज्ञाता,न्याय,प्राकृत,संस्कृत,आयुर्वेद आदि विषयों के विद्वान् बाल ब्रह्मचारी आचार्य श्री १०८ वासुपूज्य सागर जी महाराज का जन्म हुआ।आपकी माता का नाम रामा देवी और पिता जी का नाम कालीचरण था।आपके बचपन का नाम दयाचंद था।जैसा नाम था वैसा ही काम था ।आपके ३ भाई और ३ बहने थी।आप उनमे से ३ न. के थे।आपका जन्म गोलालारे जैन परिवार में हुआ था। बालक अवस्था में ही आपके सभी गुण स्पष्ट झलकने लगे ।आप बचपन से ही किसी को सताते नहीं थे ,दया तो आपमें कूट कूट के भरी थी।जब आप थोड़े बड़े हुए और पढने जाने लगे ।आप पढाई में बहुत होशियार थे।आपने लोकिक शिक्षा ग्यारहवीं कक्षा तक ग्रहण की।
आप साइंस ,बायोलॉजी के बहुत बड़े विद्वान् थे।पुण्य उदय से आचार्य पार्श्व सागर जी आपके गॉव में आये। तब आपका मन घर में न लगकर आचार्य श्री के पास लगा रहता था।स्कूल से वापस आकर आप आचार्य श्री की सेवा में चले जाते थे।१ बार आचार्य श्री ने आपको अपने साथ चलने को कहा तो आप सहर्ष तैयार हो गये।पर घर वालों की अनुमति न मिलने से आपको रुकना पड़ा।परन्तु आप हमेशा घर से निकलने का कोई न कोई रास्ता देकते रहते थे।जब आचार्य श्री कुण्डलपुर में थे तब आपने घर पर न बताकर उनके पास चले गये और आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत और दो प्रतिमा के व्रत ले लिया ।
परिवार वालों का आपके प्रति अधिक स्नेह होने से वे आपको वापस जबरदस्ती घर ले आये परन्तु आपके मन को वापस ना ला सके।आपका मन आचार्य श्री के पास जाने के लिए करने लगा।आपके परिवार वालो ने आपसे शादी करने को कहा परन्तु आपने साफ़ मनाकर दिया की आप विवाह बंधन में नही बंधना चाहते ।और वापस आचार्य श्री के पास आ गए और जैन धर्म का अधयन्न करने लगे।आपने आचार्य श्री से दीक्षा देने के लिए निवेदन किया।आपको योग्य समजकर आचार्य श्री ने स्वीकृति प्रदान कर दी।आपको आचार्य श्री ने डायरेक्ट मुनि दीक्षा दी और आप का नाम करण हुआ मुनि श्री १०८ वासुपूज्य सागर जी ।
गुरु का स्वास्थ्य ख़राब होने पर आपने उनकी बहुत सेवा की । जबुनकी समाधि का समय आया तो उन्होंने आपसे आचार्य पद लेने के लिए कहा आपने मन कर दिया।मन करने पर आचार्य श्री का दिल भर आया और उनकी आँखों से आंसू निकल आया ।आपने सोचा की आचार्य श्री की समाधि ना बिगड़ जाये इसलिए आप आचार्य पद लेने को तैयार हो गए ।परन्तु आपने आचार्य श्री को कहा की में आपकी समाधि के बाद ही आचार्य पद ग्रहण करूँगा उसके पहले में आपको नमोस्तु करूँगा ।आचार्य श्री को संतोष प्राप्त हुआ।आचार्य श्री ने अपने हाथों से १९८८ में वैशाख सुदी तीज को आपको आचार्य पद प्रदान किया आचार्य श्री की समाधि आषाड़ वादी एकम को हुई।जब तक आचार्य श्री थे तब तक उनके सामने आपने संघ का सञ्चालन किया।आचार्य श्री वासुपुज्यसागर जी कठिन चरित्र का पालन करते है।आप हमेशा अधयन्न में लगे रहते है।आपने जैन धर्म की काफी प्रभावना की है।


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