आचार्य श्री १०८ वीर सागर जी महाराज


संक्षिप्त परिचय


आचार्य श्री वीर सागर जी का जन्म महाराष्ट्र प्रान्त के ओरंगाबाद जिले के 'ईर' नमक ग्राम में विक्रम संवत १९३३ सन १८७६ में पूर्णिमा के दिन हुआ था ।इनकी माता जी का नाम भाग्यवती और पिताजी रामसुख जी थे ।आपके बचपन का नाम हीरालाल जैन था ।आपके जन्म के पूर्व आपकी माता जी ने एक सफ़ेद बैल सपने में देखा था ।कक्षा ७ वी तक आपने हिंदी व् उर्दू दोनों भाषाओँ में लोकिक अध्ययन किया और उसके बाद अपने पिता जी के साथ व्यापार में उनका साथ देने लगे । आपने ८ साल की उम्र में ही अष्ट मूलगुण सहित यज्ञोपवीत संस्कार कराया ।आप बाल ब्रह्मचारी थे । आपने विवाह नहीं किया था । आपने बचपन में स्वयं ही ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया था ,जब आपके माता-पिता ने आपके विवाह की चर्चा करी तब आपने अपने व्रत के बारे में उन्हें बता दिया ।आप की त्याग की भावना बचपन से ही थी । आप रसपरित्याग पूर्वक भोजन करते थे तथा समय समय पर उपवास भी किया करते थे ।माता-पिता के वियोग के बाद आपने कचनेर में धार्मिक पाठशाला खोलकर बच्चों को निशुल्क अध्ययन करना प्रारंभ किया ।
विक्रम संवत १९७८ सन १९२१ में ऐलक श्री पन्ना लाल जी से नंदगाँव में चातुर्मास में सप्तम प्रतिमा के व्रत लिए और ब्रहमचारी खुशालचंद जी के साथ रहने लगे ।दक्षिण भारत के कोन्नुर ग्राम में आपने सर्वप्रथम आचार्य शांति सागर जी (चरित्र चक्रवर्ती) के दर्शन किये और विक्रम संवत १९८० सन १९२३ में आचार्य शांति सागर जी (चरित्र चक्रवर्ती) जी से क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण करी । क्षुल्लक अवस्था में प्रथम चातुर्मास समडोली में हुआ ।और सन १९२४ में समडोली में ही मुनि दीक्षा हुई,और आचार्य शांति सागर जी के प्रथम शिष्य होने का गौरव प्राप्त हुआ ।आपने अपने गुरु के साथ १२ चातुर्मास किये ।और फिर गुरु आज्ञा से अलग होकर धर्म की प्रभावना के लिए प्रथम चातुर्मास ईडर नगर में किया ।आचार्य शिव सागर जी आपसे दीक्षित पहले मुनि हुए ।समाधि के पूर्व आचार्य शांति सागर जी ने पत्र लिख कर अपना आचार्य पद आपको प्रदान किया ।
एक बार कर्म उदय आने पर आपके पीठ पर बहुत बड़ा फोड़ा हो गया था जिसे डॉ. के कहने पर बिना बेहोशी के डॉ. द्वारा ऑपरेशन करवाया ।इस घटना से आपकी सहनशीलता का पता चला ।आपको मृगी का रोग भी था ,जब कभी आपको मृगी का दोरा पड़ता तब आप सूत्र- श्लोक को बहत जोर जोर से बोलने लगते थे ।
आपके प्रमुख शिष्यों में मुनि शिव सागर जी , मुनि धर्म सागर जी ,मुनि पद्म सागर जी ,मुनि जय सागर जी ,मुनि सन्मति सागर जी मुनि श्रुत सागर जी ,आचार्य कल्प श्रुत सागर जी प्रमुख है ।आचार्य श्री से दीक्षित आर्यिका में आर्यिका वीरमति माताजी ,आर्यिका कुन्थुमति माताजी ,आर्यिका सुमतिमति माताजी,आर्यिका पार्श्वमति माताजी जी ,आर्यिका इंदुमती माताजी जी ,आर्यिका सिद्धमति माताजी जी ,आर्यिका ज्ञान मति माताजी जी ,आर्यिका वासुमती माताजी ,आर्यिका सुपार्श्वमति माताजी जी प्रमुख है ।
आचार्य शांति सागर जी से आचार्य पद मिलने के बाद आपने उस पद को सफलता पूर्वक निभाया और २ वर्ष तक जयपुर में ही चातुर्मास किये,क्योकि आप शारीरिक रूप से अस्वस्थ थे और विहार करने की शक्ति आपने नहीं थी। विक्रम संवत २०१४ का चातुर्मास सानंद जयपुर संपन्न हो गया था कि इसी बीच आश्विन कृष्णा १५ को आचार्य श्री वीर सागर जी का सहसा ही समाधि मरण हो गया । आचार्य वीर सागर जी के समाधि मरण के बाद आचार्य शिव सागर जी को उनका आचार पद प्रदान किया गया ।

आचार्य श्री १०८ शांति सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ वीर सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ शिव सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ ज्ञान सागर जी महाराज
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या
आचार्य श्री १०८ शांति सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ वीर सागर जी महाराज
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Aacharya Shri 108 Veer Sagar Ji Maharaj (Charitra Chakravarti)







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OR
Aacharya Shri 108 Shantisagar Ji Maharaj (Charitra Chakravarti)
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Aacharya Shri 108 Vardhamaan Sagar Ji Maharaj