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श्वेतपिच्छाचार्य १०८ श्री विद्यानंद जी महाराज


संक्षिप्त परिचय

जन्म: २२ अप्रैल १९२५
जन्म स्थान : ग्राम : शेडवाल ,जिला : बेलगाम (कर्नाटक )
नाम : सुरेन्द्र कुमार
माता का नाम : श्रीमती सरस्वती बाई
पिता का नाम : श्री कलाप्पा उपाध्याय
दीक्षा गुरु : आचार्य श्री देशभूषण जी
मुनि दीक्षा तिथि: जुलाई २५ , १९६३
मुनि दीक्षा स्थान : दिल्ली
एलाचार्य पद : नवम्बर १७ , १९७८ को दिल्ली में
आचार्य पद तिथि: जुन २८ १९८७ दिल्ली में
विशेष : आचार्य विद्यानन्द जी वर्तमान के पहले आचार्य है जिन्हें मुनि दीक्षा लिए ५० साल हो गए है ।

कर्णाटक के शेडवाल ग्राम में २२ अप्रैल १९२५ को जन्मे बालक सुरेन्द्र कुमार जो आगे जाकर ऐसे आचार्य बन गए जिनका नाम से ही विद्या का स्मरण हो जाता है आचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज ।श्री कलाप्पा उपाध्याय के घर में श्रीमती सरस्वती बाई की कुक्षी से जन्मे बालक सुरेन्द्र कुमार । २५ जुलाई १९६३ को आचार्य देशभूषण जी से आपने मुनि दीक्षा ली।आपकी तपस्या और आपकी साधना केकारन १९८७ में आपको आचार्य पद की प्राप्ति हुई। और आप बन गए आचार्यश्री १०८ विद्यानंद जी महाराज।दिल्ली में आपने बहुत बार चौमासा कर के भारत की राजधानी में जैन धर्म का प्रचार-प्रसार का कार्य किया ।
आचार्य श्री के विदेश में रहने वाले भक्तों को जब पता चला की भारत सरकार ने मयूर पंख पर प्रतिबन्ध लगाने का सर्कुलर निकल है तो उनको चिंता हुई कि हमारे गुरुदेव कि चर्या का निर्वाह केसे होगा।क्युकी शीघ्र ही चातुर्मास का शुभारम्भ होने वाला था।इसलिए उन्होंने वहा से यथा शीघ्र श्वेत मयूर पंख दिल्ली भिजवा दिए और उपाध्याय जी ने उसकी नूतन पिच्छी बना दी ।पूज्य आचार्य श्री को चातुर्मास स्थापना के शुभ दिन श्वेत मयूर पंखो से निर्मित पिच्छी समर्पित की।श्वेत पंखो की पिच्छी देखकर हजारों उपस्थित श्रावकों को आश्चर्य हुआ और सबने एक स्वर से आचार्य श्री को श्वेतपिच्छाचार्य की उपाधि से अलंकृत किया । अब से आचार्य श्री का विरुद हुआ -श्वेतपिच्छाचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज
आचार्य विद्यानन्द जी वर्तमान के पहले आचार्य है जिन्हें मुनि दीक्षा लिए ५० साल हो गए है ।

आचार्य श्री १०८ शांति सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ पाय सागर जी महाराज
आचार्य श्री १०८ जय कीर्ति जी महाराज
आचार्य श्री १०८ देशभूषण जी महाराज
श्वेतपिच्छाचार्य १०८ श्री विद्यानंद जी महाराज

Aacharya Shri 108 Vidyanand Ji Maharaj

In the true tradition of Jain Acharyas we are lucky to have Acharya Vidyanandji in the 20th century. It is for many many centuries that a person of this calibre, vision, knowledge, exceptional managerial skills and towering personality is available to the Jains. Many historical and landmark projects were undertaken by him to help the Jains to come together (cutting across the sectarian barriers) and understand the great treasures (of values, philosophy and literature) inherited by us as a result of excellent work done by Jain Acharyas over many many centuries.His command over many languages (current and ancient), depth of knowledge and great amount of research in old scripts is reflected in his actions, thinking, discourses and many books written by him. He has widely traveled across the length and breadth of the country covering thousands of miles on barefoot including visit to ice covered Amarnath Caves in Himalayas accessible only for a few days in a year for the benefit of all living beings. May his continued presence be a constant source of inspiration for all of us to spread the message of Sarvodaya (world religion), for the benefit of all living beings.


Brief Introduction

Birth :
April 22; 1925
Birth Place: 
Village Shedwal, Distt: Belgam (Karnataka)
Name :
Surendra Kumar
Mothers Name :
Smt. Saraswati Bai
Father’s Name :
Shri Kalappa Upadhayaya
Eduction :
Jain Gurukul Shedwal (Belgam) Study of Jain and other Literature and manuscripts in digerent parts of the muntry and deep study and analysis of different religions at Calcutta.
Place of Muni Diksha :
Delhi
Muni Diksha Guru :
Acharyashri Deshbhushanji
Date OF Muni Diksha :
July 25, 1963
Eilacharya :
In Delhi on November 17, 1978
Acharya Pada:
In Delhi June 28th 1987
Spaical :
Acharya Vidyanand Ji Maharaj is only a Jain Sadhu completed 50 years in jain diksha.
 


Aacharya Shri 108 Shantisagar Ji Maharaj (Charitra Chakravarti)
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