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आचार्य श्री १०८ योगीन्द्र सागर जी महाराज


एक विभूति परम पूज्य गुरुदेव आचार्य योगीन्द्र सागर जी का जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था।ग्वालियर निवासी पं. फौदल प्रसाद शर्मा एवं श्रीमती दमयंती बाई शर्मा के दांपत्य जीवन में बालक रमेश ने १७ फरवरी १९६१ को जन्म लिया ।बालक रमेश को मात्र ४५ दिन की शिशु अवस्था में ही वात्सल्य रत्नाकर परमपूज्य आचार्य श्री विमल सागर जी का मंगल आशीर्वाद प्राप्त हो गया था।पढाई लिखाई में बालक रमेश का मन कम ही लगता था।गली मोहल्ले में होनेवाली सत्य नारायण की कथा सुनकर ८-९ वर्ष की उम्र में बालक रमेश अच्छे कथा वाचक बन गए,जिसे सुन ने २५-५० बच्चों की मण्डली आया करती थी । सत्य नारायण की कथा ने रमेश के जीवन में एक मौन क्रांति ला दी।मन में उत्सुकता पैदा कर दी ,प्यास जगा दी ,एक प्रश्न दिलो दिमाग में बैठा दिया की आखिर ये सत्य नारायण भगवान् कौन है ?इन्हें कैसे पाया जाये,एकांत में रमेश के मन में अमीरी ,गरीबी ,जीवन-म्रत्यु के विचार आते थे । ब्राहमण परिवार के सु संस्कारों से परिपूर्ण बालक रमेश अपने प्रारंभिक बाल जीवन से ही अपनी ज्ञान-पिपासा को शांत करने हेतु अनेक संत,ऋषि ,मुनियों और विद्वानों के संपर्क में आने की चेष्टा एवं योग्य गुरु की तलाश करते रहे। मन की शांति के लिए बालक रमेश दर दर भटकने लगे -मंदिर से लेकर मस्जिद ,गुरूद्वारे से चर्च ,मुल्ला मोलवी सेलेकर पंडित पुजारी तक लेकिन कही भी उन्हें संतोष नही मिला।अंत में जाकर चक्रवर्ती परम पूज्य सन्मति सागरजी (फफोतु) महाराज का सानिद्ध्य प्रप्ठो गया।उनकी खोज्पुरी हो चुकी थी।संकल्प विकल्प का भटकाव ख़तम हो गया। गुरु की पारखी नजरों ने भी एक द्रष्टि में हीरे की पहचान कर ली।दोनों एक दुसरे को खोना नहीं चाहते थे ।जिस रमेश को ठीक से देव दर्शन करना नहीं आता था ,जिसे जैन तत्व का ज्ञान नहीं था ,नमोकार मंत्र भी ठीक से याद नहीं था,जिसे जिन साधू चर्या का बोध नहीं था वह आचार्य श्री सन्मति सागर जी के चरणों में नत मस्तक होकर जिन दीक्षा ग्रहण करने की जिद करने लगा।वह दिग. मुद्रा धारण करना चाहता था।अन्तत: शिष्य की इच्छा पूरी हुई ।राग पर विराग की विजय हुई ।रविवार २५ फरवरी १९७९ को बामोरकलां शिवपुरी में आचार्य सन्मति सागर जी ने रमेश को जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान की। और उनका नाम मुनि श्री १०८ ऋषभ सागर रखा गया | धरती की दूब से लेकर स्रष्टिकी सर्वोत्तम करती मनुष्य तक सब पर आपकी दया करुणा और वात्सल्य द्रष्टि डेक कर सन्मति सागर जी ने २८ फरवरी १९८६ को कोटा में आपको बालाचार्य पद से सुशोभित किया । और आप बालाचार्य योगीन्द्र सागर बन गये |दीक्षा उपरान्त आपने जैनदर्शन .शास्त्र,पुराण व् तत्वों का गूढ़-गहन अध्यन्न किया।स्वद्यायको आप प्राण वायु मानते थे ।आपने जिन दीक्षा लेकर सिद्ध कर दिया की जैनधर्म किसी सम्प्रदाय विशेष का नहीं है यह एक ऐसा धर्म है जिसे जैन के आलावा अन्य जाती के लोग भी धारण कर सकते है।यह धर्म मनुष्यों के साथ तिर्यंच तक पालन कर सकते है ।साग वाड़ा में पूज्य आचार्य योगीन्द्र सागरजी द्वारा ४०० वर्ष पुरानी ७२ प्रतिमाये निकाली ।साथ ही इंद्र देव द्वारा उनका अभिषेक किया गया।ज्यो ज्यो प्रतिमा बाहर आती बरसात की झड़ी प्रारंभ हो जाती और उनका अभिषेक होता जाता ।आपकी समाधि १८-०३-२०१२ को १२:०५ पर हुई ।
आचार्य श्री १०८ सन्मति सागर (अजमेर वाले )