मुनि श्री १०८ क्षमा सागर जी महाराज

मुनि क्षमा सागरजी महाराज दिग. वीतराग मुनि है ।युवा अवस्था में सागर विश्वविद्यालय से भू गर्भ विज्ञान में एम. टेक. की उपाधि ग्रहण की।मात्र २३ वर्ष की आयु में आपने आचार्य विद्या सागर जी के दर्शन के बाद घर का त्याग कर दिया ।आप १ सम्रद्ध परिवार के लाडले थे ।जीवन में न कोई निराशा थी और न कोई हताशा ,न कोई असफलता और न कोई विरक्ति प्रेरक घटना ।स्वेक्षा और स्व प्रेरणा से आप आत्म कल्याण के लिए प्रेरित हुए।मुनि क्षमा सागर जी जहा एक संवेदन शील कवि है ,वाही दूसरी और विचारक भी ।

संक्षिप्त परिचय

जन्म: २० सितम्बर १९५७
जन्म  नाम: वीरेंद्र कुमार सिंघई
जन्म स्थान: सागर
माता का नाम: श्रीमती आशादेवी
पिता का नाम: श्री जीवन कुमार सिंघई
क्षुल्लक दीक्षा : १० जनवरी १९८०
क्षुल्लक दीक्षा स्थान: नैना गिरी
ऐलक दीक्षा : ७ नवम्बर १९८०
ऐलक दीक्षा स्थान: मुक्तागिरी
मुनि दीक्षा:   २० अगस्त १९८२
मुनि दीक्षा स्थान :  नैना गिरी
दीक्षा गुरू: संत शिरोमणी आचार्य श्री विद्यासागर जी
विशेष : मुनिवर श्री प्रमाणसागर जी की प्रेरणा और परिकल्पना से तीर्थराज सम्मेद शिखर में गुणायतन के नाम से बनने जा रहा यह धर्मायतन जैन धर्म के परम्परागत मंदिरों/धर्मायतनों से एकदम अलग एक अद्भुत ज्ञानमंदिर होगा।
ग्रन्थ लेखन : जैन धर्म और दर्शन ,जैन तत्त्वविद्या ,तीर्थंकर ,धर्म जीवन का आधार,दिव्य जीवन का द्वार,ज्योतिर्मय जीवन आदि

मुनिश्री का ज्ञान सदेव भक्तों को अपने संदेह ,जिज्ञासा एवं शंकाओं के समाधान हेतु आकर्षित करती है।प्रश्नोत्तर के संवाद पूर्ण प्रहार में जहा एक ओर किशोर होते है तो वही दूसरी ओर प्रकांड विद्वान् भी।चूँकि मुनि श्री प्रश्न कर्ता को महत्त्व देते है ओर प्रश्न को सम्मान अत: प्रश्न कर्ता नि:संकोच अपनी जिज्ञासाओं के समाधान हेतु उन्हें घेरे रहते है।मुनि श्री न प्रश्न को कभी टालते है,न मजाक में लेते है ,न उलझाते है ,न ही प्रश्न को निरर्थक बताते है।वे प्रश्नकर्ता को उसके स्तर का उत्तर देकर संतुष्ट करते है।
जीवन, जगत,आत्मा, परमात्मा और इनसे सम्बंधित सेकड़ो रहस्यों को लेकर उठ रही जिज्ञासा के उत्तर मुनि श्री के मुख से सुनना,अपने आप में एक अनुभव है।जी किताबों में नहीं मिलता,ही शास्त्रों में उलझा रह जाता है,जो परम्पराओं से अस्पष्ट चला आ रहा है,जो पूछे जाने पर योग्य प्रतीत नहीं होता ,वह सब मुनि श्री के सानिध्य में प्रासंगिक चर्चा का विषय बन जाता है।मुनि श्री की मनीषा में धर्म की विज्ञानिकता एवं विज्ञान की धार्मिकता एक दुसरे के प्रतिरोधी न बन कर एक दुसरेके पूरक बन जाते है।धर्म और विज्ञान के प्रति मुनिश्री की यह द्रष्टि जैन और अजैन,समस्त बंधुओं को सामान रूप से अपनी तार्किकता के कारण आधुनिक और अनुकूल प्रतीत होती है।
आपके ज्ञान लोक से भक्तों का अज्ञान का अन्धकार सरलता से लुप्त हो जाता है।मुनि श्री की मन को छु जाने वाली भाषा एवं शेली प्रश्नकर्ता को उत्तर के मर्म तक सहज ही पंहुचा देती है।

गुरु
आचार्य श्री १०८ विद्या सागर जी महाराज

Muni Shri 108 Kshama Sagar Ji Maharaj

108 Kshamasagar Ji Maharaj Muni Kshamasagar, the disciple of Acharya Shri Vidhyasagar Ji Maharaj, is among one of the most respected Jain Munis. Muni Kshamasagar ji, an M.Tech. from the Sagar University, renounced all the worldly pleasures and material belongings to become an ascetic at the tender age of 23 to tread on the path of peace and salvation as propagated by his Guru Acharya Shri Vidhyasagar ji Maharaj.
Munishri's Amrit Vaani simplifies the complex Jain philosophy and provides answers and solutions to all the worldly problems in a very practical way. It is so easy to relate to his pravachans. At every point it feels, "Yes this is exactly what I do in my life and how I feel and what I go through" and then it becomes so easy to realize the right path and the right conduct that alleviates all wrongdoings hence all worries and pains.


Brief Introduction

Birth Date 20 Sep. 1957
Birth Place Sagar
Birth Name Veerendra Kumar Singhai
Mother's Name Shrimati Aashadevi Jain
Father's Name Shri Jeevan Kumar Singhai
Kshullak Diksha: 10 Jan. 1980
Kshullak Diksha Place: NainaGiri
Ailak Diksha: 07 Nov 1980
Ailak Diksha Place: Muktagiri
Muni Diksha 20 Aug 1982
Muni Diksha Guru Aacharya Shri 108 Vidyasagar Ji Maharaj
Muni Diksha Place : NainaGiri
Website : http://www.jinvaani.org/munishri-kshamasagar-ji.html
http://www.kshamasagarji.org
http://www.maitreesamooh.com


Aacharya
Aacharya Shri 108 Vidya Sagar Ji Maharaj