4) Contentment – UTTAM SHAUCH उत्तम शौच धर्मं :(Uttam Shauch meaning Supreme Contenment/Purity.)a)Be content with the material gains that you have accomplished thus far. Contrary to popular belief, striving for greater material wealth and pleasure will not lead to happiness. Desire for more is a sign that we do not have all that we want. Reducing this desire and being content with what we have leads to satisfaction. Accumulating material objects merely fuels the fire of desire.
b) Contentment or happiness, derived from material objects, is only perceived to be so by a soul in a state of false belief. The fact is that material objects do not have a quality of happiness and therefore happiness cannot be obtained from them! The perception of ‘enjoying’ material objects is indeed only that – a perception! This perception rewards the soul with only misery and nothing else. Real happiness comes from within, as it is the soul that possesses the quality of happiness.
धरि हिरदै सन्तोष, करहु तपस्या देह सों ।
शौच सदा निर्दोष, धरम बढो संसार में ॥
उत्तम शौच सर्व जग जाना, लोभ पाप को बाप बखाना ।
आशा-पास महा दुखदानी, सुख पावै सन्तोषी प्रानी ॥
प्रानी सदा शुचि शील जप तप, ग्यान ध्यान प्रभावतैं ।
नित गंग जमुन समुद्र न्हाये, अशुचि दोष सुभाव्तैं ।।
ऊपर अमल मल भर्यो भीतर, कौन विधि घट शुचि कहै ।
बहु देह मैली सुगुन थैली, शौच गुन साधू लहै ॥


उत्तम शौच धर्मं :
सत्य धर्म की चर्चा जब भी चलती है,तब-तब प्राय: सत्य वचन को ही सत्य धर्म समझ लिया जाता है| लेकिन सिर्फ सत्य वचन ही सत्य धर्म नहीं है| आत्म वास्तु के त्रिकालिक सत्य स्वरुप के आश्रय से उत्पन्न होने वाला वीतराग परिणिति रूप ही उत्तम सत्य धर्म है|

मुनिवर क्षमासागरजी महाराज :-
हम आनंद लें उस चीज़ में जो हमें प्राप्त है| यह ना देखें की दूसरे के पास क्या है, जो हमारे पास है,उस में खुश रहे अन्यथा मुश्किलें पैदा होती हैं |अपनी ऐसी ही मुश्किलों को आसान करने के लिए हमारे मन में सरलता होना चाहिए, ईमानदारी होना चाहिए,हमारे भीतर उन्मुक्त ह्रादयता होनी चाहिए. और इतना ही नहीं हम स्पष्टवादी होवें, बहुत सीधा-सादा जीवन जीने का प्रयास करें, जितना बन सकें भोलापन लावें| बच्चों में भी होता है भोलापन, पर वह अज्ञानतापूर्वक होता है | लेकिन ज्ञान हासिल करने के बाद का भोलापन ज्यादा काम का होता है | निशंक होकर , बहुत सहज होकर, भोलेपन से जियें तो हमारा जीवन बहुत ऊँचा और बहुत अच्चा बन सकता है | जो मलिनताएँ हमारे भीतर हैं उन्हें कैसे हटायें और कैसे हम अपने जीवन को, अपनी वाणी को, अपने मन को, अपने कर्म को पवित्र बनाएं |
जो आतंरिक सुचिता या आतंरिक निर्मलता का भाव है वही शौच धर्म है |लोभ के अभाव में शुचिता आती है |हम लोभ के प्रकार देखते हैं -
पहला है वित्तेषणा -> यह है धन- पैसे का लोभ | धन कितना ही बढ़ जाए कम ही मालुम होता है| धन का लोभ कभी रुकता नहीं है, बढ़ता ही चला जाता है |
दूसरा है पुत्रेषणा-लोकेषणा -> यह है अपने पुत्र और परिवार का लोभ |
तीसरा है समाज में अपनी प्रतिष्ठा का लोभ | यह तीन ही प्रकार के लोभ होते हैं , इन तीनों का लोभ हमें मलिन करता है | बस इन तीनों पे नियंत्रण पाना ही हमारे जीवन को बहुत निर्मल बना सकता है | लोभ की तासीर यही है की आशाएं बढ़ती हैं, आश्वासन मिलते हैं और हाथ कुछ भी नहीं आता | जो अपने पास है वह दिखने लगे तो सारा लोभ नियंत्रित हो जायेगा | व्यक्तिगत असंतोष, पारिवारिक असंतोष, सामाजिक असंतोष - कितने तरह के असंतोष हमें घेर लेते हैं | अगर हम समझ लें दूसरे के पास जो है वह उस में खुश है , और जो अपने पास है उस में हम आनंद लें तोह जीवन का अर्थ मिल जायेगा |
जीवन में निर्मलता के मायने हैं - जीवन का चमकीला होना | निर्मलता के मायने हैं – मन का भीगा होना | निर्मलता के मायने हैं- जीवन का शुद्ध होना | निर्मलता के मायने हैं -जीवन का सारगर्भित होना | निर्मलता के मायने हैं - जीवन का निखालिस होना | इतने सारे मायने हैं पवित्रता के, निर्मलता के | जब मुझे मलिनतायें घेरें तो उनपे मियंत्रण रखना ज़रूरी है | हमारा मन जितना भीग जाता है उतना ही निर्मल हो जाता है |
अगर किसी की आँख भर जाए तो वह कमज़ोर माना जाता है | आज कोई रोने लगे तो बिलकुल बुद्धू माना जाए|
आज अगर मन भीग जाए तो हम आउट ऑफ़ डेट माने जायें | बहुत कठोर हो गए हैं हम , हमारी निर्मलता हमारे कठोर मन से गायब हो गयी | जबकि हमारा मन इतना निर्मल होना चाहिए था की दूसरो के दुःख को , संसार के दुखों को देखकर द्रवित हो जाएँ उसमें डूब जाएँ |इसी तरह हमें जो प्राप्त है हम उसमें संतुष्ट होंगे और जो हमें प्राप्त नहीं है उसे पाने का शांतिपूर्वक सद्प्रयास करेंगे तोह हम जीवन में सदेव आगे बढ़ते जायेंगे |(By Muni shri Kshama Sagar ji)