9) Uttam Aakinchanya उत्तम आकिंचन्य धर्म : (Uttam Akinchanya meaning SUPREME DETACHMENT)SUPREME DETACHMENT: The philosophical term “attachments” denotes the state of being firmly and for a long time attached with one’s senses to some worldly objects. Not to have the least attachment is known as Akinchanya (non-attachment). This means to put a limit to ambitions, to put a check on desires. Attachment is of two kinds: Internal Attachment - The feeling of love, hatred, affection and ill will for living beings; and wrong belief are internal attachments. External Attachment - Greed for wealth and property is external attachment. Greed for worldly possessions consists in desiring more than what is needed by an individual.

उत्तम आकिंचन्य धर्म :
ज्ञानानंद स्वभावी आत्मा को छोड़कर किंचित मात्र भी पर पदार्थ तथा पर के लक्ष्य से आत्मा में उत्पन्न होने वाले मोह-राग-द्वेष के भाव आत्मा के नहीं हैं- ऐसा जानना, मानना और ज्ञानानंद स्वभावी आत्मा के आश्रय से उनसे विरत होना, उन्हें छोड़ना ही उत्तम आकिंचन्य धर्म है|
किंचित मात्र भी मेरा नहीं है, ऐसा अभिप्राय महान धर्म है, मेरा स्वभाव है, अपने से अतिरिक्त कोई भी अन्य पदार्थ मेरा नहीं है, शांति मेरा स्वभाव है मुझे वही चाहिए और कुछ नहीं, ये गर्जना है उस योगी की, शांति के उपासक की - [जिनेन्द्र वर्णी जी]
ज्यो ही मानस्तंभ में विराजित समता मूर्ति पर द्रष्टि गयी, इंद्रभूति की अंतर्चेतना जाग्रत हो गयी, अभिमान गलित होकर अकिंचन्य अवस्था को प्राप्त हो गए ! - क्या महानता होगी उस वीतरागता की, क्या महिमा होगी उस वीतरागता की...विश्व गुरु की वाणी खीरी नहीं....उनके दर्शन अभी किये नहीं...इंद्रभूति समवशरण में जाने ही वाले है की मानस्तम्भ में विराजित वीतरागता के दर्शन मात्र से अनादी काल का मित्यात्व एक साथ नष्ट हो गया और उनके पता चल गया...इस दुनिया में मेरे से भी ज्ञानी कोई व्यक्तित्व है...और उसी समय उत्तम अकिंचन्य अवस्था अर्थात संसार में न कोई मेरा न मैं किसी, ये तो दुनिया मेला इसीका...ये ज्ञात हो गया...! जय हो उत्तम अकिंचन्य धर्म की...महान वीतराग धर्म की ! ~~ शांति पथ प्रदर्शन [जिनेन्द्र वर्णी जी]