5) Truth – UTTAM SATYA उत्तम सत्य धर्मं :(Uttam Satya meaning To speak affectionate and just words with a holy intention causing no injury to any living being.)a) If talking is not required, then do not talk. If it is required then only use the minimum of words, and all must all be absolutely true. Talking disturbs the stillness of the mind. Consider the person who lies and lives in fear of being exposed. To support one lie he has to utter a hundred more. He becomes caught up in a tangled web of lies and is seen as untrustworthy and unreliable. Lying leads to an influx of paap karma.
b) Satya comes from the word Sat, which means existence. Existence is a quality of the soul. Recognising the soul’s true nature as it really exists and taking shelter in the soul is practising Nischay Satya Dharma.
कठिन वचन मति बोल, पर-निन्दा अरु झूठ तज ।
सांच जवाहर खोल, सतवादी जग में सुखी ॥
उत्तम सत्य बरत पा लीजे, पर-विश्वासघात नहीं कीजे ।
सांचे झूठे मानुष देखो, आपन पूत स्वपास न पेखो ॥
पेखो तिहायत पुरुष सांचे, को दरब सब दीजिये ।
मुनिराज-श्रावक की प्रतिष्ठा, सांच गुन लख लीजिये ॥
ऊंचे सिन्हासन बैठि वसु न्रुप, धरम का भूपति भया ।
वच झूठ सेति नरक पहुंचा, सुरग में नारद गया ॥

उत्तम सत्य धर्मं :
सत्य धर्म की चर्चा जब भी चलती है,तब-तब प्राय: सत्य वचन को ही सत्य धर्म समझ लिया जाता है| लेकिन सिर्फ सत्य वचन ही सत्य धर्म नहीं है| आत्म वास्तु के त्रिकालिक सत्य स्वरुप के आश्रय से उत्पन्न होने वाला वीतराग परिणिति रूप ही उत्तम सत्य धर्म है|

उत्तम सत्य- मुनिवर क्षमासागरजी महाराज
जिसका मन जितना सच्चा होगा उसका जीवन उतना ही सच्चा होगा. और जीवन उन्ही का सच्चा बनता है, वह ही सच के पास जाते हैं जो कषायों से मुक्त होकर आत्मस्थ हो जाते हैं.सत्य को पाना, सच्चा होना, सच बोलना - यह तीनों ही चीज़ें हमें अपने जीवन में सीख लेनी चाहिए.
सच को पाने का सीधा सा अर्थ है की हम आत्मस्वरूप को प्राप्त कर लें. इस संसार में सच्चाई इतनी ही है की हम शुद्धता का अनुभव करें. हम अपनी निर्मलता का अनुभव करें और उसमें लीन हो जाएँ, आत्मस्थ हो जाएँ - येही सच को पाना है. निर्विकार हो जाना ही सत्य को पाना है.चारों कषायों के अभाव में हम जो अपनी आत्मा की शुद्ध अवस्था को प्राप्त करते हैं वास्तव में वही सच्चाई है. लेकिन इस सच को पाने के लिए सच का आचरण करना पड़ेगा, भीतर से सच्चा होना पड़ेगा.यदि हम इतना पुरुषार्थ कर लें तो धीरे-धीरे हमारे जीवन में खूब ऊंचाई, खूब अच्छाई आ जायेगी.
सत्य को प्राप्त करने के मायने यहीं हैं की हमारा जीवन अत्यंत शांत और राग- द्वेष से रहित हो जाए .जब भी हम किसी की सच्चाई का सम्मान नहीं करते तोह मानियेगा हम उस व्यक्ति को झूठा होने के लिए प्रेरित करते हैं. यदि हम सच्चाई का सम्मान करना शुरू कर दें तो कोई व्यक्ति झूट क्यूँ बोलेगा ?
जिसका जीवन सच्चा हो जाता है, उसके द्वारा बोला गया हर शब्द सत्य होता है. क्यूंकि सच्चा व्यक्ति कभी दूसरो को क्षती नहीं पहुंचता .यदि झूठा व्यक्ति सच भी बोलेगा तो दुसरे को क्षती पहुंचाने के लिए ही बोलेगा .इसलिए बहुत ज़रूरी है पहले सच्चा होना और फिर सच बोलना.
आचार्यों ने स्पष्ट करने के लिए लिखा है - "सत्यम वद प्रियंवद " . सच बोले , प्रिय बोले. अप्रिय और असत्य तो बोलो ही मत. यदि झूट भी प्रिय हो तो मत बोलो और सच भी अप्रिय हो तो मत बोलो. इस प्रकार हम संभलके सोच-समझके अपने वचनों का प्रयोग करें तो अपने जीवन को उंचा उठा सकते हैं.