logo1 logo2
Tirthnkar_Mother_dream
tirthnkar_detail-2

१२ चक्रवर्ती के बारे में विशेष जानकारी

Bharat Chakravarti's Detail
भरत चक्रवर्ती की विस्तृत जानकारी
Heaven
जिस स्वर्ग से आये थे सर्वार्थ सिद्धि ( प.पु./२०/१२४-१९३) २ अच्युत (म.पु./पूर्ववत्)
Birthplace Ayodhya
जन्मस्थान अयोध्या
Parents Mother:-Queen Yashwati Father :- King Rishabdev
माता-पिता माता - यशस्वती रानी ,पिता - ऋषभदेव
Height 500 Bow
ऊंचाई ५०० धनुष
Age/आयु ८४ लाख पूर्व
कुमार काल 77 Lakh Purv /७७ लाख पूर्व
मंडलीक काल 1000 Years/१ हजार साल
विजयकाल 60000 Years
राज्य काल 6 Lakh Purv 61000 Years
संयम काल 1 Lakh Purv
कौन से तीर्थ काल में हुए भगवान ऋषभदेव
प्राप्त गति मोक्ष
भगवान ऋषभदेव की यशस्वती रानी से भरत महाराज का जन्म हुआ था। भगवान ने दीक्षा के लिए जाते समय भरत को साम्राज्य पद पर प्रतिष्ठित किया था। एक समय राज्यलक्ष्मी से युक्त राजर्षि भरत को एक ही साथ नीचे लिखे हुए तीन समाचार मालूम हुए थे। पूज्य पिता को केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है, अन्त:पुर में पुत्र का जन्म हुआ है और आयुधशाला में चक्ररत्न प्रकट हुआ है। क्षणभर में भरत ने मन में सोचा कि केवलज्ञान का उत्पन्न होना धर्म का फल है, चक्र का प्रकट होना अर्थ का फल है और पुत्र का उत्पन्न होना काम का फल है अत: भरत महाराज ने सबसे पहले समवसरण में जाकर भगवान की पूजा की, उपदेश सुना, तदनन्तर चक्ररत्न की पूजा करके पुत्र का जन्मोत्सव मनाया।
अनन्तर भरत महाराज ने दिग्विजय के लिए प्रस्थान कर दिया। चक्ररत्न सेना के आगे-आगे चलता था। सम्पूर्ण षट्खण्ड पृथ्वी को जीत लेने के बाद वापस आते समय वैलाश पर्वत को समीप देखकर सेना को वहाँ ठहराकर स्वयं समवसरण में जाकर राजा भरत ने विधिवत् भगवान की पूजा की और वहाँ से आकर सेना सहित अयोध्या के समीप आ गये।
उस समय भरत महाराज का चक्ररत्न नगर के गोपुर द्वार को उल्लंघन कर आगे नहीं जा सका, तब चक्ररत्न की रक्षा करने वाले कितने ही देवगण चक्र को एक स्थान पर खड़ा हुआ देखकर आश्चर्य को प्राप्तहुए। भरत महाराज भी सोचने लगे कि समस्त दिशाओं को विजय करने में जो चक्र कहीं नहीं रुका, आज मेरे घर के आँगन में क्यों रुक रहा है?
इस प्रकार से बुद्धिमान भरत ने पुरोहित से प्रश्न किया। उसके उत्तर में पुरोहित ने निवेदन किया कि हे देव! आपने यद्यपि बाहर के लोगों को जीत लिया है तथापि आपके घर के लोग आज भी आपके अनुकूल नहीं हैं, वे आपको नमस्कार न करके आपके विरुद्ध खड़े हुए हैं। इस बात को सुनकर भरत ने हृदय में बहुत कुछ विचार किया। अनन्तर मंत्रियों से सलाह करके कुशल दूत को सबसे पहले अपने निन्यानवे भाइयों के पास भेज दिया।
वे भाई दूत से सब समाचार विदित करके विरक्तमना भगवान ऋषभदेव के समवसरण में जाकर दीक्षित हो गये। अनन्तर भरत ने मन में दुःख का अनुभव करते हुए चक्र के अभ्यन्तर प्रवेश न करने से विचार-विमर्शपूर्वक एक दूत को युवा बाहुबली भाई के पास भेजा। दूत के समाचार से बाहुबली ने कहा कि ‘‘मैं भरत को भाई के नाते नमस्कार कर सकता हूँ किन्तु राजाधिराज कहकर उन्हें नमस्कार नहीं कर सकता, पूज्य पिता की दी हुई पृथ्वी का मैं पालन कर रहा हूँ, इसमें उनसे मुझे कुछ लेना-देना नहीं है’’, इत्यादि समाचारों से बाहुबली ने यह बात स्पष्ट कर दी कि यदि वे मुझसे जबरदस्ती नमस्कार कराना चाहते हैं तो युद्ध भूमि में ही अपनी-अपनी शक्ति का परिचय दे देना चाहिए। इस वातावरण से महाराज भरत सोचने लगे, अहो! जिन्हें हमने बालकपन से ही स्वतंत्रतापूर्वक खिला-पिलाकर बड़ा किया है, ऐसे अन्य कुमार यदि मेरे विरुद्ध आचरण करने वाले हों तो खुशी से हों परन्तु बाहुबली तरुण, बुद्धिमान, परिपाटी को जानने वाला, विनयी, चतुर और सज्जन होकर भी मेरे विषय में विकार को कैसे प्राप्त हो गया? इस प्रकार छह प्रकार की सेना सामग्री से सम्पन्न हुए महाराज भरतेश्वर ने अपने छोटे भाई को जीतने की इच्छा से अनेक राजाओं के साथ प्रस्थान किया।
दोनों तरफ की सेना के प्रवाह को देखकर दोनों ओर के मुख्य-मुख्य मंत्री विचार कर इस प्रकार कहने लगे कि व्रूâर ग्रहों के समान इन दोनों का युद्ध शान्ति के लिए नहीं है क्योंकि ये दोनों ही चरमशरीरी हैं, इनकी कुछ भी क्षति नहीं होगी, केवल इनके युद्ध के बहाने से दोनों ही पक्ष के लोगों का क्षय होगा, इस प्रकार निश्चय कर तथा भारी मनुष्यों के संहार से डरकर मंत्रियों ने दोनों की आज्ञा लेकर धर्म युद्ध करने की घोषणा कर दी अर्थात् इन दोनों के बीच जलयुद्ध, दृष्टियुद्ध और बाहुयुद्ध में जो विजय प्राप्त करेगा, वही विजय लक्ष्मी का स्वयं स्वीकार किया हुआ पति होगा। मनुष्यों से एवं असंख्य देवों से भूमण्डल और आकाशमण्डल के व्याप्त हो जाने पर इन दोनों का दृष्टियुद्ध प्रारंभ हुआ किन्तु बाहुबली ने टिमकार रहित दृष्टि से भरत को जीत लिया, जलयुद्ध में भी बाहुबली ने भरत के मुँह पर अत्यधिक जल डालकर आकुल करके जीत लिया क्योंकि भरत की ऊँचाई पाँच सौ धनुष और बाहुबली की पाँच सौ पच्चीस धनुष प्रमाण थी। मल्लयुद्ध में भी बाहुबली ने भरत को जीतकर उठाकर अपने कंधे पर बिठा लिया। दोनों पक्ष के राजाओं के बीच ऐसा अपमान देख भरत ने क्रोध से अपने चक्ररत्न का स्मरण किया और उसे बाहुबली पर चला दिया परन्तु उनके अवध्य होने से वह चक्र बाहुबली की प्रदक्षिणा देकर तेजरहित हो उन्हीं के पास ठहर गया। उस समय बड़े-बड़े राजाओं ने चक्रवर्ती को धिक्कार दिया और दुःख के साथ कहा कि ‘बस-बस’ यह साहस रहने दो, बंद करो, यह सुनकर चक्रवर्ती और भी अधिक संताप को प्राप्त हुए। आपने खूब पराक्रम दिखाया, ऐसा कहकर बाहुबली ने भरत को उच्चासन पर बैठाया।
इस घटना से बाहुबली उसी समय विरक्त हो गये और संसार, शरीर, वैभव आदि की क्षणभंगुरता का विचार करते हुए बड़े भाई भरत से अपने अपराध की क्षमा कराकर तपोवन को जाने लगे, तब भरत भी अत्यधिक दुःखी होकर बाहुबली को समझाने और रोकने लगे। बाहुबली अपने वैराग्य को अचल करके तपोवन को चले गये और दीक्षा लेकर एक वर्ष का योग धारण कर लिया। एक वर्ष की ध्यानावस्था में सर्पों ने चरणों के आश्रय वामीरन्ध्र बना लिये, पक्षियों ने घोंसले बना लिये और लताएँ ऊपर तक चढ़कर बाहुबली के शरीर को ढँकने लगीं किन्तु योग चक्रवर्ती बाहुबली भगवान योग में लीन थे। इधर भरत महाराज का चक्रवर्ती पट्ट पर महासाम्राज्य अभिषेक हुआ। दीक्षा लेते समय बाहुबली ने एक वर्ष का उपवास किया था, जिस दिन उनका वह उपवास पूर्ण हुआ, उसी दिन भरत ने आकर उनकी पूजा की और पूजा करते ही उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हो गया। ‘‘वह१ भरतेश्वर मुझे से संक्लेश को प्राप्त हुआ है अर्थात् मेरे निमित्त से उसे दु:ख पहुँचा है, यह विचार बाहुबली के हृदय में विद्यमान रहता था, इसलिए भरत के पूजा करते ही बाहुबली का हृदय विकल्प रहित हो गया और उसी समय उन्हें केवलज्ञान प्रकट हो गया। भरतेश्वर ने बहुत ही विशेषता से बाहुबली की पूजा की। केवलज्ञान प्रकट होने के पहले जो भरत ने पूजा की थी, वह अपना अपराध नष्ट करने के लिए ही थी और अनन्तर की पूजा केवलज्ञान के महोत्सव की थी। उस समय देव कारीगरों ने बाहुबली भगवान की गंधकुटी बनाई थी। समस्त पदार्थों को जानने वाले बाहुबली अपने वचन रूपी अमृत के द्वारा समस्त संसार को संतुष्ट करते हुए पूज्य पिता भगवान ऋषभदेव के सामीप्य से पवित्र हुए वैलाशपर्वत पर जा पहुँचे।

ब्राह्मण वर्ण की उत्पत्ति


किसी समय भरत सोचते हैं कि मैं जिनेन्द्र देव का महामह यज्ञ कर धन वितरण करता हुआ समस्त संसार को संतुष्ट करूँ, सदा निःस्पृह रहने वाले मुनि तो हमसे धन लेते नहीं परन्तु ऐसा गृहस्थ भी कौन है जो धन-धान्य आदि सम्पत्ति के द्वारा पूजा करने योग्य है? जो अणुव्रतों में मुख्य है, श्रावकों में श्रेष्ठ है उसे दान देना उचित है। ऐसा सोचकर भरत ने योग्य व्यक्तियों की परीक्षा करने की इच्छा से समस्त राजाओं को बुलाया और घर के आँगन में हरे-भरे अंकुर, पुष्प और फल खूब डलवा दिये। उन लोगों में जो अव्रती थे वे बिना कुछ सोच विचार के राजमंदिर में चले आये। राजा भरत ने उन्हें एक ओर हटाकर बाकी बचे हुए लोगों को बुलाया। पाप से डरने वाले कितने लोग तो वापस चले गये और कितने लोग वापस लौटने लगे, परन्तु चक्रवर्ती के विशेष आग्रह से जब कुछ लोग दूसरे प्रासुक मार्ग से ले जाये गये तब प्रश्न करने पर उन्होंने कहा-महाराज! आज पर्व के दिन कोंपल, हरे पत्ते तथा पुष्प आदि का विघात नहीं किया जाता, हे देव! हरे अंकुर आदि में अनन्त निगोदिया जीव रहते हैं ऐसे सर्वज्ञ देव के वचन हैं। इस उत्तर से भरत महाराज बहुत प्रभावित हुए और व्रतों में दृढ़ रहने वाले उन सबकी प्रशंसा कर उन्हें दान, मान आदि से सम्मानित कर पद्म नामक निधि से प्राप्त हुए एक से लेकर ग्यारह तक की संख्या वाले ब्रह्मसूत्र नाम के व्रतसूत्र से उन सबके चिन्ह किये। भरत ने इन्हें उपासकाध्ययनांग से इज्या, वार्ता, दत्ति, स्वाध्याय, संयम और तप का उपदेश दिया। त्रेपन गर्भान्वय क्रियाएँ, अड़तालीस दीक्षान्वय क्रियाएं और सात कत्र्रन्वय क्रियाएं भी बतलार्इं। व्रतों के संस्कार से ब्राह्मण, शस्त्र धारण करने से क्षत्रिय, न्यायपूर्वक धन कमाने से वैश्य और नीच वृत्ति का आश्रय लेने से शूद्र कहलाते हैं।

भरत के सोलह स्वप्न


कुछ काल बीत जाने के बाद एक दिन चक्रवर्ती भरत ने अद्भुत फल दिखाने वाले कुछ स्वप्न देखे। उनके देखने से खेद खिन्न हो भरत ने यह समझ लिया कि इनका फल कटु है और ये पंचम काल में फल देने वाले होंगे। इस प्रकार विचार कर भरत ने भगवान के समवसरण में जाकर पूजा-भक्ति आदि करके भगवान से प्रार्थना की-हे भगवन्! मैंने सिंह, सिंह के बालक आदि सोलह स्वप्न देखे हैं, उनका फल क्या है? और मैंने ब्राह्मण वर्ण की स्थापना की है, वह योग्य है या अयोग्य? कृपया हमारे संशय को दूर कीजिए। यद्यपि अवधिज्ञान से भरत ने इन स्वप्नों का फल जान लिया था, फिर भी सभी को विशेष जानकारी होने के लिए भगवान से सुनना चाहते थे। भरत का प्रश्न समाप्त होने पर जगद्गुरु भगवान अपनी दिव्यध्वनि से सभा को संतुष्ट करने लगे। हे भरतराज! सुनो!
तुमने जो ‘पृथ्वी पर अकेले विहार कर पर्वत की चोटी पर चढ़ते हुई तेईस सिंह देखे हैं’ उसका फल यह है कि महावीर स्वामी को छोड़कर शेष तीर्थंकरों के समय दुष्ट नयों की उत्पत्ति नहीं होगी।
‘अकेले सिंह के पीछे हिरणों के बच्चे’ देखने से महावीर के तीर्थ में परिग्रही कुलिंगी बहुत हो जावेंगे।
‘बड़े हाथी के बोझ को घोड़े पर लदा’ देखने से पंचम काल के साधु तपश्चरण के समस्त गुणों को धारण करने में समर्थ नहीं होगे।
‘सूखे पत्ते खाने वाले बकरों को देखने’ से आगामी काल में मनुष्य दुराचारी हो जावेंगे।
‘गजेन्द्र के कंधे पर चढ़े हुए वानरों’ को देखने से आगे चलकर क्षत्रियवंश नष्ट हो जावेंगे, नीच कुल वाले पृथ्वी का पालन करेंगे।
‘कौवों के द्वारा उलूक को त्रास दिया जाना’ देखने से मनुष्य धर्म की इच्छा से जैन मुनियों को छोड़कर अन्य साधुओं के पास जावेंगे।
‘नाचते हुए बहुत से भूतों के देखने से’ लोग व्यंतरों को देव समझकर उनकी उपासना करने लगेंगे।
‘मध्य भाग में शुष्क और चारों तरफ से पानी से भरे हुए तालाब’ के देखने से धर्म मध्य भागों से हटकर यत्र-तत्र रह जावेगा।
‘धूल से मलिन हुए रत्नों की राशि के देखने से’ पंचमकाल में ऋद्धिधारी उत्तम मुनि नहीं होंगे।
‘कुत्ते को नैवेद्य खाते हुए’ देखने से व्रत रहित ब्राह्मण गुणी पात्रों के समान आदर पावेंगे।
‘ऊँचे स्वर से शब्द करते हुए तरुण बैल का विहार’ देखने से पंचमकाल में अधिकतर लोग तरुण अवस्था में मुनिपद को धारण करेंगे।
‘परिमण्डल से घिर हुए चन्द्रमा’ के देखने से पंचमकाल के मुनियों में अवधिज्ञान और मन:पर्ययज्ञान नहीं होगा।
‘परस्पर मिलकर जाते हुए दो बैलों के’ देखने से पंचमकाल में मुनिजन साथ-साथ रहेंगे, अवेâले विहार करने वाले नहीं होगे।
‘मेघों के आवरण में रुके हुए सूर्य’ के देखने से प्राय: पंचमकाल में केवलज्ञानरूपी सूर्य का उदय नहीं होता है।
‘सूखे वृक्ष के देखने से’ स्त्री-पुरुषों का चारित्र भ्रष्ट हो जायेगा।
‘जीर्ण पत्तों के देखने से’ महा औषधियों का रस नष्ट हो जावेगा।
हे भरत! इन स्वप्नों को तुम बहुत समय बाद का फल देने वाला समझो तथा जो तुमने ब्राह्मण वर्ण की स्थापना की है, सो आज तो ठीक है किन्तु ये भी पंचमकाल में जाति के मद से युक्त होकर प्राय: धर्मद्रोही हो जावेंगे, फिर भी अब जिनकी सृष्टि की है, उन्हें नष्ट करना ठीक नहीं है।
भगवान के उपर्युक्त वचन को सुनकर भरत महाराज अपना संशय दूर करके ऋषभदेव को बार-बार प्रणाम करके वहाँ से लौटे। खोटे स्वप्नों से होने वाले अनिष्ट की शांति के लिए जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक और उत्तम पात्र को दान देना आदि पुण्य कार्य किये।
बहुत काल तक साम्राज्य सुख का अनुभव करते हुए महाराज भरत ने किसी समय दर्पण में मुख देखते हुए एक श्वेत केश देखा और तत्क्षण भोगों से विरक्त हो गये। अपने पुत्र अर्वâकीर्ति को राज्यपद देकर जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली, उन्हें उसी समय मन:पर्ययज्ञान प्रकट हो गया और उसके बाद ही केवलज्ञान प्रकट हो गया। ये भरतकेवली अब देवाधिदेव भगवान हो गये और इन्द्रों द्वारा वन्दनीय गंधकुटी में विराजमान हो गये। बहुत काल तक भव्य जीवों को धर्मोपदेश देते हुए अन्त में शेष कर्मों का नाश करके मुक्तिधाम को प्राप्त हो गये।

Sagar Chakravarti's Detail
सगर चक्रवर्ती की विस्तृत जानकारी
Heaven Achyut Heaven
जिस स्वर्ग से आये थे अच्युत स्वर्ग
Birthplace Ayodhya
जन्मस्थान अयोध्या
Parents Mother:-Queen Subala Father :- King Samudravijay
माता-पिता माता - सुबाला रानी ,पिता - समुद्र विजय
Height 450 Bow
ऊंचाई ४५० धनुष
Age/आयु ७२ लाख पूर्व
कुमार काल 50,000 Years/५० हजार साल
मंडलीक काल 5000 Years/५ हजार साल
विजयकाल 30000 Years
राज्य काल 70 Lakh Purv 30000 Years
संयम काल 1 Lakh Purv
कौन से तीर्थ काल में हुए भगवान अजितनाथ
प्राप्त गति मोक्ष
पूर्व भव नं.२ मे विदेह में वत्सकावती देश का राजा जयसेन था (४८/५८) तथा पूर्व भव में अच्युत स्वर्ग में महाकाल नामक देव था (४८/६८)। इस भव में कौशल देश के इक्ष्वाकु वंशी राजा समुद्रविजय का पुत्र था (४८/७१-७२) तथा प.पु./५/७४ की अपेक्षा इसके पिता का नाम विजयसागर था। यह द्वितीय चक्रवर्ती था (देखें - शलाकापुरुष )। दिग्विजय करके भोगों में आसक्त हो गया। यह देखकर पूर्व भव के मित्र मणिकेतु नामक देव ने अनेक दृष्टान्त दिखाकर इसको संबोधा। जिसके प्रभाव से यह विरक्त हो कर मुक्त हो गया (४८/१३६-१३७)। यह अजितनाथ भगवान् का मुख्य श्रोता था -

Maghva Chakravarti's Detail
मघवा चक्रवर्ती की विस्तृत जानकारी
Heaven Madhyam Graveyak
जिस स्वर्ग से आये थे मध्यम ग्रैवेयक में अहमिंद्र
Birthplace Ayodhya
जन्मस्थान अयोध्या
Parents Mother:-Queen Bhadra Father :- King Sumitra
माता-पिता माता - भद्रारानी ,पिता - महाराजा सुमित्र
Height 42½ Bow
ऊंचाई साढ़े ४२ धनुष
Age/आयु 500000 years /५ लाख वर्ष
कुमार काल 25000 years /२५ हजार वर्ष
मंडलीक काल 25000 years /२५ हजार वर्ष
विजयकाल 10000 Years
राज्य काल 390000 Years
संयम काल 50000 Years
कौन से तीर्थ काल में हुए धर्मनाथ तीर्थंकर
प्राप्त गति मोक्ष /सनत्कुमार स्वर्ग
श्री धर्मनाथ तीर्थंकर के तीर्थ में मघवा चक्रवर्ती हुए हैं, ये तृतीय चक्रवर्ती थे। इनके पूर्वभव का वर्णन इस प्रकार है- श्री वासुपूज्य भगवान के तीर्थकाल में ‘नरपति’ नाम के राजा ने राज्य, भोगों से विरक्त होकर जैनेश्वरी दीक्षा ले ली। घोरातिघोर तप करके मध्यम ग्रैवेयक में अहमिंद्र हो गए। वहाँ की सत्ताईस सागर की आयु में दिव्य सुखों का अनुभव कर अंत में वहाँ से च्युत होकर अयोध्यापुरी के इक्ष्वाकुवंश महाराजा सुमित्र की भद्रारानी से ‘मघवा’ नाम के पुत्र हुए। इनकी पाँच लाख वर्ष की आयु थी, साढ़े चालीस धनुष ऊँचा शरीर था। इनकी आयुधशाला में चक्ररत्न उत्पन्न हो गया, तब इन्होंने दिग्विजय करके छह खण्ड पृथ्वी को जीतकर सार्वभौम एकछत्र शासन किया। एक समय मनोहर उद्यान में ‘‘श्री अभयघोष’’ केवली का आगमन हुआ। उनकी गंधकुटी में पहुँचकर भक्तिपूर्वक तीन प्रदक्षिणा देकर वन्दना, स्तुति, भक्ति, पूजा करके चक्रवर्ती ने केवली भगवान का दिव्य उपदेश सुना, पुन: विरक्तमना होकर अपने पुत्र प्रियमित्र को राज्य देकर स्वयं जैनेश्वरी दीक्षा ले ली।
निर्दोष संयम का पालन करते हुए अंत में शुक्लध्यान से घातिया कर्मों का नाशकर दिव्य केवलज्ञान प्राप्त कर लिया। गंधकुटी की रचना देवों के द्वारा की गई। बहुत काल तक श्रीविहार कर चक्रवर्ती केवली भगवान ने असंख्य भव्यों को धर्मामृत पान से तृप्त किया। अनंतर चतुर्थ शुक्लध्यान से सम्पूर्ण अघातिया कर्मों का नाशकर निर्वाणधाम को प्राप्त किया है। ऐसे ये मघवा चक्रवर्ती अनंत-अनंतकाल तक सिद्धशिला के ऊपर विराजमान रहेंगे। इनके श्रीचरणों में मेरा कोटि-कोटि वंदन है।

Sanatkumar Chakravarti's Detail
सनत्कुमार चक्रवर्ती की विस्तृत जानकारी
जिस स्वर्ग से आये थे माहेन्द्र (प.पु./२०/१२४-१९३) २ अच्युत (म.पु./पूर्ववत्)
Birthplace Ayodhya
जन्मस्थान हस्तिनापुर (प.पु./२०/१२५-१९३)अयोध्या (म.पु./पूर्ववत्)
Parents Mother:-Queen Sehdevi Father :- King Sumitra
माता-पिता माता - सहदेवी ,पिता - महाराजा विजय
Height 42 Bow
ऊंचाई ४२ धनुष
Age/आयु 300000 years/ ३ लाख वर्ष
कुमार काल 50,000/५० हजार वर्ष
मंडलीक काल 50,000/५० हजार वर्ष
विजयकाल 10000 Years
राज्य काल 90000 Years
वैराग्यनिमित्त देवों द्वारा रूप की परीक्षा में गर्व हानि
परीषहजय भयंकर कुष्ठ आदि रोगों की उद्भूति, देवों द्वारा परीक्षा में शरीर के प्रति नि:स्पृहता, धर्म के प्रभाव से रोगों का अभाव
संयम काल 1 Lakh Years
कौन से तीर्थ काल में हुए धर्मनाथ तीर्थंकर
प्राप्त गति मोक्ष /सनत्कुमार स्वर्ग
कुरुजांगल देश के हस्तिनापुर नगर१ में कुरुवंश की परम्परा में चतुर्थ चक्रवर्ती सनत्कुमार हुए जो रूपपाश से खिंचकर आये हुए देवों द्वारा संबोधित हो दीक्षित हो गये थे। आराधना कथाकोश में इनका जीवनवृत्त इस प्रकार है-
ये सनत्कुमार चक्रवर्ती सम्यग्दृष्टियों में प्रधान थे। उन्होंने छह खण्ड पृथ्वी अपने वश में कर ली थी। नवनिधि, चौदह रत्न, चौरासी लाख हाथी, इतने ही रथ, अठारह करोड़ घोड़े, चौरासी करोड़ शूरवीर, छ्यानवे करोड़ ग्राम, छ्यानवे हजार रानियाँ इत्यादि विशाल वैभव था। बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजा चक्रवर्ती की आज्ञा शिरसा धारण करते थे। ये चक्रवर्ती कामदेव पद के धारक भी थे।
एक दिन सौधर्म स्वर्ग के इन्द्र ने अपनी सभा में मनुष्यों के रूप की प्रशंसा करते हुए सनत्कुमार के रूप को सबसे उत्कृष्ट कहा। उस समय कौतुकवश परीक्षा करने के लिए मणिचूल और रत्नचूल नाम के दो देव यहाँ भूमण्डल पर आये। गुप्तवेष से स्नानागार में राजा के रूप को देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए। अनन्तर द्वारपाल से कहा कि चक्रवर्ती को कहो कि स्वर्ग से दो देव आपके रूप को देखने के लिए आये हैं। चक्रवर्ती ने स्नान करके वस्त्राभूषणों से अलंकृत हो सिंहासन पर आरूढ़ होकर उन देवों को आने को कहा। उस समय वे देव सभा में आकर बोले-महाराज! स्नान के समय जो आपका रूप था, वह अब नहीं रहा। ऐसा सुनकर सभी सभासदों को बहुत ही आश्चर्य हुआ।
देवों ने एक घड़े में जल भर दिया और एक बिन्दु जल निकाल दिया फिर सभा से पूछा कि क्या जल कम हो गया है? उत्तर में सबने कहा-जल ज्यों की त्यों भरा है। बस! देवों ने कहा-ऐसे ही राजा के रूप में जो अन्तर हुआ है वह तुम्हें पता नहीं चल रहा है। इस घटना से चक्रवर्ती संसार के विषय भोगों से विरक्त हो गये। अपने पुत्र सुकुमार को राज्य देकर जैनेश्वरी दीक्षा ले ली और घोराघोर तपश्चरण करने लगे। पराधीन प्रकृति, विरुद्ध आहार आदि के निमित्त से और असाता कर्म के तीव्रोदय से मुनिराज सनत्कुमार के शरीर में भयंकर रोग उत्पन्न हो गये किन्तु वे मुनि शरीर से निर्मम होने से उसकी उपेक्षा करके अपनी आवश्यक क्रियाओं में सावधान थे और कठिन से कठिन तप कर रहे थे।
पुन: किसी समय सौधर्म स्वर्ग की इन्द्रसभा में मुनियों के चारित्र की प्रशंसा करते हुए इन्द्र ने सनत्कुमार मुनि की प्रशंसा की। उस समय मदनकेतु नाम का देव उनकी परीक्षा के लिए यहाँ आया। वैद्य का वेष बनाकर वन में साधु के पास गया। मुनिराज ने कहा-भाई! मुझे सबसे ब़ड़ा रोग है यदि तुम उसकी दवाई कर सको तो ठीक है। वैद्य ने पूछा-वह क्या है? मुनिराज ने कहा-वह रोग है ‘जन्म लेना’ यदि इस रोग की दवाई तुम्हारे पास है तो दे दो। वैद्य वेषधारी देव ने कहा-इस रोग को तो मैं कुछ नहीं समझता हूँ। उस समय मुनिराज ने अपनी तप शक्ति से उत्पन्न हुई ऋद्धियों के बल से क्षणमात्र में अपने एक हाथ का कुष्ठ रोग नष्ट करके उस वैद्य को बता दिया और कहा कि जब शरीर मेरा नहीं है, तब मैं इसकी चिंता क्यों करूँ ? इसलिए मैं निस्पृह हूँ। यह चमत्कार देखकर वैद्य ने अपने रूप को प्रगट कर मुनि की अनेक स्तुतियों से स्तुति करते हुए पूजा की और कहा-हे नाथ! जन्म-मरण को दूर करने वाली औषधि तो आपके पास ही है और आप स्वयं इसका सेवन कर भी रहे हैं तथा हम जैसे संसारी दीन प्राणी भी आप जैसे महापुरुषों की शरण में आकर इस रोग का नाश कर सकते हैं।
इस प्रकार मुनि का माहात्म्य प्रगट कर वह देव स्वर्ग चला गया। इधर मुनिराज सनत्कुमार उपसर्ग एवं परीषहों को सहन करने में समर्थ अपने चारित्र को वृद्धिंगत करते हुए घातिया कर्मों का नाशकर केवली हो गये और बहुत काल तक पृथ्वी पर विहार कर अघातिया कर्मों का भी नाशकर शाश्वत सुखमय सिद्धपद को प्राप्त हो गये।
इन चक्रवर्ती की कुल आयु तीन लाख वर्ष की थी। उसमें पचास हजार वर्ष कुमार काल में, पचास हजार वर्ष मांडलिक अवस्था में, दस हजार वर्ष दिग्विजय में, नब्बे हजार वर्ष चक्रवर्ती होकर राज्य के उपभोग में और एक लाख वर्ष संयमी मुनि अवस्था में व्यतीत हुए हैं।
ये चक्रवर्ती पन्द्रहवें धर्मनाथ तीर्थंकर के तीर्थ में हुए हैं। आज लोक के अग्रभाग में विराजमान सिद्ध परमात्मा हैं उन्हें मेरा बारम्बार नमस्कार होवे।

SYMBOL : Deer
चिन्ह: हिरन


Aathon darav saaj shuchi chit-har, harashi harashi gun gaai.
Baajat drim drim mridang gat, naachat taa thei thaai.
Param-dharama simaran Dharam jin, asharan-sharan nihaari.
Poojun paay gaay gun sundar, naachoon dai dai taari.
.

Om hrim shri Shantinath jinendray anarghyapad praptaay arghyam nirvapameeti swahaa.
आठों दरव साज शुचि चित -हर , हरषि हरषि गुण गाई ,
बाजत द्रम द्रम मृदंग गत , नाचत ता थेई थाई |
परम -धरम सिमरन धरम जिन , अशरण -शरण निहारी ,
पूजन पाय गाय गुण सुन्दर , नाचूँ दे दे तारी ||

ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्ताय अर्घ्यम निर्वपामीति स्वाहा
Bhagwan Shantinath Garbh Kalyanak Detail
भगवान शांतिनाथ के गर्भ कल्याणक की विस्तृत जानकारी
Heaven Sarvarthasiddha
जिस स्वर्ग से आये थे सर्वार्थसिद्धि
Garbh Kalyanak Date Bhādrapada Krishna 7
गर्भ कल्याणक तिथि भाद्रपद कृष्ण ७
Garbh Star Bharani
गर्भ नक्षत्र भरणी
Bhagwan Shantinath Janam Kalyanak Detail
भगवान शांतिनाथ के जन्म कल्याणक की विस्तृत जानकारी
Birthplace Hastinapur,Gajpur
जन्मस्थान हस्तिनापुर ,गजपुर
Parents Mother:-Queen Aira Devi,Father :- King Visvasena
माता-पिता माता -ऐरा,पिता - विश्वसेन 
Complex Golden
वर्ण स्वर्ण
Height /ऊंचाई 40 Bow /४० धनुष
Age/आयु 1,00,000 Years/१,००,००० वर्ष
Birth Kalyanak Date Jyaiṣṭha Krishna 14
जन्म कल्याणक तिथि ज्येष्ठ कृष्ण १४
Birth Star Bharani
जन्म नक्षत्र भरणी
Dynasty /वंश Ikshvaku/ इक्ष्वाकु
Nativity /कुमार काल 25000 Years /२५००० वर्ष
State Period /राज्य काल 50 Thousand years/ ५० हजार वर्ष
Bhagwan Shantinath Tap Kalyanak Detail
भगवान शांतिनाथ के तप कल्याणक की विस्तृत जानकारी
Reason of Quietness Recall Race
वैराग्य कारण जाति स्मरण
Initiation Date Jyaiṣṭha Krishna 14
दीक्षा तिथि ज्येष्ठ कृष्णा १४
Initiation Star Bharani
दीक्षा नक्षत्र भरणी
Initiation Forest Aamra
दीक्षा वन आम्र
Initation Period /दीक्षा काल Afternoon /अपराहन
Seh-Dikshit / सह दीक्षित 1000 / १०००
Bhagwan Shantinath Kevalgyan Kalyanak Detail
भगवान शांतिनाथ के केवलज्ञान कल्याणक की विस्तृत जानकारी
KevalGyan's place Aamra
केवलज्ञान का स्थान आम्र
Kevalgyan's Date Pauṣa Shukl 10
केवलज्ञान की तिथि पौष शुक्ल १०
Kevalgyan Time Forenoon
केवालोत्पत्ति काल पूर्वाहन
Kevli Period 24984 Years
केवली काल २४९८४ वर्ष
Kevalgyan Nakshtra Bharani
केवल नक्षत्र भरणी
समवशरण भूमि 4½ योजन
गणधरो की संख्या 36
Yaksh / यक्ष Garud / गरुड़
Yakshini / यक्षिणी Mansi /मानसी
Main Gandhar / मुख्य गणधर Chakrayudh /चक्रायुध
No. Of Muni / ऋषि संख्या 62000
No. Of Aaryika आर्यिका संख्या 60300
Main Aaryika / मुख्य आर्यिका Harisena/ हरिषेणा
Purvdhar पूर्व धर 800
Shikshak/ शिक्षक 41800
Avadhigyani अवधिज्ञानी 3000
Kevli /केवली 4000
Vikriyadhari/विक्रियाधारी 6000
Vipulmati/ विपुलमती 4000
Shravak श्रावक 200000
Shravika श्राविका 400000
Vaadi वादी 2400
Bhagwan Shantinath Moksha Kalyanak Detail
भगवान शांतिनाथ के मोक्ष कल्याणक की विस्तृत जानकारी
Sahmukt / सह्मुक्त 900
Indulgence Retirement 1 Month ago
भोग निवृत्ति १ माह पहले
Salvation Place Sammedh Shikhar Ji
मोक्ष स्थान सम्मेद शिखर जी


back to menu

SYMBOL : HeGoat
चिन्ह: बकरा


Jal chandan tandul prasoon charu,deep dhoop leri.
Phaljut jajan karon mansukh dhari, haro jagat pheri.
Kunthu sun araj daaskeri, naath sun araj daaskeri.
Bhavsindhu paryon hon naath,nikaaro baanh pakar meri.
Prabhu sun araj daaskeri, naath sun araj daaskeri.
Jagjaal paryon hon begi nikaaro, baanh pakar meri.
.

Om hrim shri Kunthunath jinendray anarghyapad praptaay arghyam nirvapameeti swahaa.
जल चन्दन तंदुल प्रसून चारु ,दीप धुप लेरी ,
फलजुत जजन करों मनसुख धरी , हरो जगत फेरी ,
कुन्थु सुन अरज दासकेरी , नाथ सुन अरज दासकेरी ,
भवसिंधु परयों हों नाथ ,निकारो बांह पकड़ मेरी ,
प्रभु सुन अरज दासकेरी , नाथ सुन अरज दासकेरी ,
जगजाल परयों हों बेगि निकारो , बांह पकड़ मेरी

ॐ ह्रीं श्री कुन्थुनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्ताय अर्घ्यम निर्वपामीति स्वाहा
Bhagwan Kunthunath Garbh Kalyanak Detail
भगवान कुन्थुनाथ के गर्भ कल्याणक की विस्तृत जानकारी
Heaven Sarvarthasiddha
जिस स्वर्ग से आये थे सर्वार्थसिद्धि
Garbh Kalyanak Date Śrāvaṇa Krishna 10
गर्भ कल्याणक तिथि श्रावण कृष्ण १०
Garbh Star Krithika
गर्भ नक्षत्र कृत्तिका
Bhagwan Kunthunath Janam Kalyanak Detail
भगवान कुन्थुनाथ के जन्म कल्याणक की विस्तृत जानकारी
Birthplace Hastinapur,Gajpur
जन्मस्थान हस्तिनापुर ,गजपुर
Parents Mother:-Queen Shrimati,Father :- King Sursen
माता-पिता माता -श्रीमती,पिता - शूरसेन राजा
Complex Golden
वर्ण स्वर्ण
Height /ऊंचाई 35 Bow /३५ धनुष
Age/आयु 95,000 years/९५,००० वर्ष
Birth Kalyanak Date Vaiśākha Shukl 1
जन्म कल्याणक तिथि वैशाख शुक्ल १
Birth Star Krithika
जन्म नक्षत्र कृत्तिका
Dynasty /वंश Kuru/ कुरु
Nativity /कुमार काल 23750 Years/२३७५० वर्ष
State Period /राज्य काल 47500 year / ४७५०० लाख वर्ष
Bhagwan Kunthunath Tap Kalyanak Detail
भगवान कुन्थुनाथ के तप कल्याणक की विस्तृत जानकारी
Reason of Quietness Recall Race
वैराग्य कारण जाति स्मरण
Initiation Date Vaiśākha Shukl 10
दीक्षा तिथि वैशाख शुक्ल १०
Initiation Star Krithika
दीक्षा नक्षत्र कृत्तिका
Initiation Forest Sahetuk
दीक्षा वन सहेतुक
Initation Period /दीक्षा काल Afternoon /अपराहन
Seh-Dikshit / सह दीक्षित 1000 / १०००
Bhagwan Kunthunath Kevalgyan Kalyanak Detail
भगवान कुन्थुनाथ के केवलज्ञान कल्याणक की विस्तृत जानकारी
KevalGyan's place Sahetuk
केवलज्ञान का स्थान सहेतुक
Kevalgyan's Date Chaitra Shukl 3
केवलज्ञान की तिथि चैत्र शुक्ल ३
Kevalgyan Time Forenoon
केवालोत्पत्ति काल पूर्वाहन
Kevli Period 23734 Years
केवली काल २३७३४ वर्ष
Kevalgyan Nakshtra Krithika
केवल नक्षत्र कृत्तिका
समवशरण भूमि 4 योजन
गणधरो की संख्या 35
Yaksh / यक्ष Gandhrav/ गंधर्व
Yakshini / यक्षिणी Mahamansi /महामानसी
Main Gandhar / मुख्य गणधर Swayambhu /स्वयंभू
No. Of Muni / ऋषि संख्या 60000
No. Of Aaryika आर्यिका संख्या 60350
Main Aaryika / मुख्य आर्यिका Bhavita / भाविता
Purvdhar पूर्व धर 700
Shikshak/ शिक्षक 43150
Avadhigyani अवधिज्ञानी 2500
Kevli /केवली 3200
Vikriyadhari/विक्रियाधारी 5100
Vipulmati/ विपुलमती 3350
Shravak श्रावक 100000
Shravika श्राविका 300000
Vaadi वादी 2000
Bhagwan Kunthunath Moksha Kalyanak Detail
भगवान कुन्थुनाथ के मोक्ष कल्याणक की विस्तृत जानकारी
Sahmukt / सह्मुक्त 1000
Indulgence Retirement 1 Month ago
भोग निवृत्ति १ माह पहले
Salvation Place Sammedh Shikhar Ji
मोक्ष स्थान सम्मेद शिखर जी


back to menu

SYMBOL : Fish
चिन्ह: मछली


Shuchi swachchh patheeram, gandh gaheeram, tandulsheeram pashp charum. 
Var deepam dhoopam, aanandroopam, lai phal bhoopam arghya karum. 
Prabhu deendayaalam arikulkaalam, viradvishaalam sukumaalam. 
Hani mum janjaalam, hai jagpaalam, Ar-gunmaalam varbhaalam.
.

Om hrim shri Arahnath jinendray anarghyapad praptaay arghyam nirvapameeti swahaa.
शुचि स्वच्छ पटिरं , गंध गहीराम , तंदुल श्रीरम पुष्प चरुं ,
वर दीपम धूपं , आनन्दरूपम् , ले फल भूपं अर्घ्य करुं |
प्रभु दीनदयालम अरिकुलकालम , विराद्विशालम् सुकुमालम ,
हनि मम जंजालम , है जगपालम् , अर-गुणमालाम वरभालम् . ||

ॐ ह्रीं श्री अरहनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्ताय अर्घ्यम निर्वपामीति स्वाहा
Bhagwan Arahnath Garbh Kalyanak Detail
भगवान अरहनाथ के गर्भ कल्याणक की विस्तृत जानकारी
Heaven Sarvarthasiddha
जिस स्वर्ग से आये थे सर्वार्थसिद्धि
Garbh Kalyanak Date Phālguna Shukl 3
गर्भ कल्याणक तिथि फाल्गुन शुक्ल ३
Garbh Star Revathi
गर्भ नक्षत्र रेवती
Bhagwan Arahnath Janam Kalyanak Detail
भगवान अरहनाथ के जन्म कल्याणक की विस्तृत जानकारी
Birthplace Hastinapur,Gajpur
जन्मस्थान हस्तिनापुर ,गजपुर
Parents Mother:-Queen Mitra,Father :- King Sudarsan
माता-पिता माता -मित्रा,पिता - सुदर्शन 
Complex Golden
वर्ण स्वर्ण
Height /ऊंचाई 30 Bow /३० धनुष
Age/आयु 84,000years / ८४००० वर्ष
Birth Kalyanak Date Mārgaśīrṣa Shukl 14
जन्म कल्याणक तिथि मार्गशीर्ष शुक्ल १४
Birth Star Rohini
जन्म नक्षत्र रोहिणी
Dynasty /वंश Kuru/ कुरु
Nativity /कुमार काल 21000 Years /२१००० वर्ष
State Period /राज्य काल 42 Thousand year / ४२ हजार वर्ष
Bhagwan Arahnath Tap Kalyanak Detail
भगवान अरहनाथ के तप कल्याणक की विस्तृत जानकारी
Reason of Quietness Cloud destruction
वैराग्य कारण मेघ विनाश
Initiation Date Mārgaśīrṣa Shukl 10
दीक्षा तिथि मार्गशीर्ष शुक्ल १०
Initiation Star Revathi
दीक्षा नक्षत्र रेवती
Initiation Forest Sahetuk
दीक्षा वन सहेतुक
Initation Period /दीक्षा काल Afternoon /अपराहन
Seh-Dikshit / सह दीक्षित 1000 / १०००
Bhagwan Arahnath Kevalgyan Kalyanak Detail
भगवान अरहनाथ के केवलज्ञान कल्याणक की विस्तृत जानकारी
KevalGyan's place Sahetuk
केवलज्ञान का स्थान सहेतुक
Kevalgyan's Date Kārtika Shukl 12
केवलज्ञान की तिथि कार्तिक शुक्ल १२
Kevalgyan Time Forenoon
केवालोत्पत्ति काल पूर्वाहन
Kevli Period 20984 years
केवली काल २०९८४ वर्ष
Kevalgyan Nakshtra Revathi
केवल नक्षत्र रेवती
समवशरण भूमि 3½ योजन
गणधरो की संख्या 30
Yaksh / यक्ष Kuber/ कुबेर
Yakshini / यक्षिणी Jaya/जया
Main Gandhar / मुख्य गणधर Kumbh / कुम्भ
No. Of Muni / ऋषि संख्या 50000
No. Of Aaryika आर्यिका संख्या 60000
Main Aaryika / मुख्य आर्यिका Kunthusena / कुन्थुसेना
Purvdhar पूर्व धर 610
Shikshak/ शिक्षक 35834
Avadhigyani अवधिज्ञानी 2800
Kevli /केवली 2800
Vikriyadhari/विक्रियाधारी 4300
Vipulmati/ विपुलमती 2055
Shravak श्रावक 100000
Shravika श्राविका 300000
Vaadi वादी 1600
Bhagwan Arahnath Moksha Kalyanak Detail
भगवान अरहनाथ के मोक्ष कल्याणक की विस्तृत जानकारी
Sahmukt / सह्मुक्त 1000
Indulgence Retirement 1 Month ago
भोग निवृत्ति १ माह पहले
Salvation Place Sammedh Shikhar Ji
मोक्ष स्थान सम्मेद शिखर जी


back to menu

Subhoum Chakravarti's Detail
सुभौम चक्रवर्ती की विस्तृत जानकारी
Heaven Madhyam Graveyak
जिस स्वर्ग से आये थे जयन्त वि. (प.पु./२०/१२४-१९३) २ महाशुक्र (म.पु./पूर्ववत्)
Birthplace Ayodhya
जन्मस्थान दृशावती (प.पु./२०/१२५-१९३) अयोध्या (म.पु./पूर्ववत्)
Parents Mother:-Queen Taara / Chitramati Father :- King Kirtiveerya/ Sahastrabahu
माता-पिता माता - तारा / चित्रमती ,पिता - कीर्तिवीर्य / सहस्रबाहु
Height 28 Bow
ऊंचाई २८ धनुष
Age/आयु 60000 Years/ ६०००० वर्ष
कुमार काल 5000 Years/५ हजार वर्ष
मंडलीक काल 5000 Years/५ हजार वर्ष
विजयकाल 500 Years
राज्य काल 49500 Years
संयम काल 0
कौन से तीर्थ काल में हुए अरनाथ तीर्थंकर
प्राप्त गति सातवे नरक
हस्तिनापुर नगर१ में कौरववंशी कार्तवीर्य नाम का राजा था, उसने कामधेनु के लोभ में जमदग्नि नामक तपस्वी को मार डाला। जमदग्नि का लड़का परशुराम था। यह भी बड़ा बलवान था अत: उसने कुद्ध होकर पिता को मारने वाले कार्तवीर्य को मार डाला तथा अनेकों क्षत्रियों को भी मार डाला। उस समय कार्तवीर्य राजा की तारा नाम की रानी गर्भवती थी, वह गुप्तरूप से कौशिक ऋषि के आश्रम में जा पहुँची, वहाँ उसने क्षत्रियों के त्रास को नष्ट करने वाले आठवें चक्रवर्ती को जन्म दिया। चूँकि वह पुत्र भूमिगृह-तलघर में उत्पन्न हुआ था इसलिए ‘सुभौम’ इस नाम से पुकारा जाने लगा। इधर वह बालक गुप्तरूप से ऋषि के आश्रम में बढ़ रहा था, उधर परशुराम के यहाँ अशुभ सूचक उत्पात होने से निमित्तज्ञानियों ने बतलाया कि तुम्हारा शत्रु उत्पन्न हो गया है। उसके जानने का उपाय यह है कि ‘‘तुम्हारे द्वारा मारे गये क्षत्रियों की दाढ़ें जिसके भोजन करते समय खीररूप में परिणत हो जायें, वही तुम्हारा शत्रु है।’’
यह सुनकर परशुराम ने शीघ्र ही एक दानशाला खुलवाई और वहीं मध्य में क्षत्रियों की दाढ़ों से भरा हुआ पात्र रखकर वहाँ विद्वान आदमी नियुक्त कर दिया। जब सुभौम को इस बात का पता लगा तब वह शीघ्र ही वहाँ पहुँचकर भोजनशाला में खाने के लिए बैठ गया। ब्राह्मण के अग्रासन पर बैठे हुए कुमार सुभौम के आगे दाढ़ों का पात्र रखा गया और उसके प्रभाव से समस्त दाढ़ें खीररूप परिणत हो गर्इं। यह सूचना शीघ्र ही परशुराम को दी गई और वह अपना फरसा लेकर शीघ्र उसे मारने आ गया। उस समय सुभौम के पुण्य से वह थाली चक्ररत्न बन गई। उसने उसी चक्र से शीघ्र ही परशुराम को मार गिराया। वह सुभौम चक्रवर्ती अष्टम चक्री के रूप में प्रगट हो गया। चौदह रत्न, नव निधियाँ और बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजा उसकी सेवा करन लगे। शठ के प्रति शठता दिखाने वाले उस चक्रवर्ती ने क्रोधयुक्त हो चक्ररत्न से इक्कीस बार पृथ्वी को ब्राह्मण रहित कर दिया। चक्रवर्ती सुभौम साठ हजार वर्ष तक जीवित रहा परन्तु तृप्ति को प्राप्त नहीं हुआ इसलिए आयु के अन्त में मरकर नरक गया। उत्तरपुराण में सुभौम चक्रवर्ती का कथानक कुछ विशेष है यथा-राजा सहस्रबाहु की रानी चित्रमती थी। वह चित्रमती कन्याकुब्ज देश के राजा ‘पारत’ की पुत्री थी। इनके कृतवीर (कार्तवीर्य) नाम का पुत्र हुआ। इसी से संबंधित एक कथा और है-
राजा सहस्रबाहु के काका शतबिन्दु से उनकी श्रीमती स्त्री के जमदग्नि नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। यह श्रीमती (जमदग्नि की माँ) चित्रमती के पिता राजा पारत की बहन थी। कुमारावस्था में माँ के मर जाने से जमदग्नि तापस हो गया और पंचाग्नि तप तपने लगा।
किसी समय एक सौधर्म स्वर्ग का देव और एक ज्योतिषी देव दोनों मिले, आपस में सम्यक्त्व-मिथ्यात्व की चर्चा करने लगे। स्वर्ग के देव ने कहा कि मिथ्यात्व के कारण जीव अनंत संसार में परिभ्रमण करता है। दोनों ही चर्चा के अनन्तर एक-दूसरे के धर्म की परीक्षा के लिए वहाँ आये और जहाँ यह जमदग्नि तप कर रहा था, वहाँ चिड़ा-चिड़ी का रूप बनाकर उस साधु की दाड़ी में रहने लगे। एक दिन चिड़ा किसी चिड़ी के विवाह में जाने लगा तब चिड़ी ने कहा कि वापस आने के लिए कुछ शपथ करके जाओ। उत्तर में चिड़ा बोला कि इस तापस की जो गति होगी, उसको छोड़कर तू चाहे जो शपथ करवा ले। बस, यह सुनते ही जमदग्नि एकदम क्रोधित हो इनको मारने लगा, तब वे दोनों उड़कर सामने के पेड़ पर जा बैठे। तब उसने इन्हें कुछ विशेष समझकर पूछा कि ‘मेरे कठिन तप से होने वाली भावी गति को तुमने क्यों नहीं पसंद किया?’’ उत्तर में चिड़ा ने कहा-अरे! ‘अपुत्रस्य कुतो गति:’ पुत्ररहित मनुष्य की कोई गति नहीं होती, ऐसा वेदवाक्य है फिर आप बालब्रह्मचारी रहकर क्यों तप कर रहे हो? ऐसे वचन सुनकर वह अज्ञानी तापसी विषयासक्त हो गया। आचार्य कहते हैं कि जब अनादिकाल से मनुष्य की विषयों में होने वाली बुद्धि बड़ी मुश्किल से गुरु के उपदेश से हटाई जाती है तब यदि गुरु उपदेश ही विषयों का पोषक मिल जाये, फिर क्या पूछना?
वह तापस सीधे अपने मामा राजा पारत के पास आया और कन्या की याचना करने लगा। राजा बहुत ही दु:खी हुए फिर भी साधु के शाप दे देने के डर से उन्होंने कहा-मेरी सौ पुत्रियों में तुम्हें जो चाहे, उसे ले जाओ। उस तापस के अधजले मुरदे जैसे विरूप को देखकर सब कन्याएँ भाग गर्इं। तब उस तापस ने धूलि में खेलती हुई एक कन्या को केला दिखाकर कहा-क्या तू मुझे चाहेगी? उस बालिका ने ‘हाँ’ कहकर केला ले लिया। बस तापस उसे गोद में लेकर गया और उसे बड़ी कर उससे विवाह कर लिया। उस समय लोग उसकी अज्ञानता को धिक्कारते थे। तभी से ऋषि आश्रम में पत्नी सहित रहने की कुप्रथा चल पड़ी। उन जमदग्नि और रेणुका से इन्द्र (परशुराम) और श्वेतराम ऐसे दो पुत्र उत्पन्न हुए।
कुछ दिन बाद अिंरजय नाम के एक साधु रेणुका के जो बड़े भाई थे, वे वहाँ आये। रेणुका ने उनकी बड़ी भक्ति की। भाई! ‘आपने हमें विवाह में कुछ नहीं दिया, अब कुछ दीजिए’ ऐसी याचना करने में मुनि ने ‘कामधेनु’ नाम की विद्या और मंत्र सहित फरसा ये दो चीजें दे दीं। किसी दिन उस वन में सहस्रबाहु राजा कृतवीर के साथ आये। उनका सत्कार करके रेणुका ने ‘कामधेनु’ से उत्पन्न हुई खीर का भोजन कराया। कृतवीर ने अपनी माँ की छोटी बहन रेणुका से पूछा-ऐसा भोजन राजाओं के यहाँ दुर्लभ है सो यहाँ वन में तुम्हारे यहाँ केसे आया? उत्तर में रेणुका ने मुनि द्वारा प्रसाद में प्राप्त कामधेनु विद्या बता दी। कृतघ्नी कृतवीर ने उसे मांगा। जमदग्नि के नहीं देने पर उसने उस साधु को मारकर वह कामधेनु ले ली और अपने नगर आ गये।
वन से कुश लेकर आकर दोनों ऋषियों ने जब माता का रूदन और पिता का निधन देखा तब वे कुपित हो मंत्रित फरसा लेकर गये और राजा सहस्रबाहु तथा कृतवीर को मार दिया। रानी चित्रमती गर्भवती थी। उसके भाई शांडिल्य नामक तापस ने इस घटना को देख बहन को अज्ञातरूप से ले जाकर किन्हीं मुनि के समीप उसे बिठा दिया। उसके पुत्ररत्न का जन्म हुआ, तब वनदेवता ने भावी चक्रवर्ती जानकर उसके पुण्य से उस बालक की रक्षा की। रानी के प्रश्न करने पर मुनि ने कहा-हे अम्ब! यह बालक सोलहवें वर्ष में चक्रवर्ती होगा, तू भय मत कर।
तापस शांडिल्य, चित्रमती को पुत्र सहित अपने स्थान पर ले गया और सुभौम नाम रखा। इधर परशुराम, श्वेतराम दोनों ऋषिपुत्र इक्कीस बार क्षत्रियों का वंश निर्मूल करके सुख से राज्य कर रहे थे। निमित्तज्ञानी द्वारा बताने पर शत्रु का निर्णय करने के लिए दानशाला में मरे हुए क्षत्रियों के दांत (दाढ़ें) पात्र में रखा दीं। ये सुभौम वहाँ दानशाला में पहुँचे। वे दांत शालि चावल बन गये, तब परशुराम आया। उसी समय सुभौम के पुण्य से चक्ररत्न प्रगट हो गया। कुमार ने उससे ब्राह्मण को मार डाला। इस आठवें चक्रवर्ती की हजार वर्ष की आयु थी। अट्ठाईस धनुष (११२ हाथ) ऊँचा शरीर था। यह छह खण्ड का अधिपति हो गया।
किसी दिन रसोईये ने सुभौम को रसायना नाम की ‘कढ़ी’ परौसी, सुभौम राजा ने उसके नाम से चिढ़कर उसे दण्डित किया, जिससे वह मरकर ज्योतिष्क देव हो गया। कुअवधि से यहाँ आकर व्यापारी के वेष में राजा को अच्छे-अच्छे फल देने लगा। रसना इन्द्रिय लंपट राजा भी उसमें आसक्त हो गया, तब एक दिन यह कपट से राजा को समुद्र के मध्य में ले गया और वेष प्रगट कर बदला चुकाने के लिए मारने को उद्यत हुआ। आराधना कथाकोश में बताया है कि जब तक सुभौम वहाँ ‘णमोकार’ मंत्र जपता रहा, तब तक देव उसे मार नहीं सका। तब उसने कपट से कहा-राजन्! यदि आप अपने मंत्र को लिखकर मिटा देंगे (छोड़ देंगे) तब मैं आपको जीवित छोड़ दूँगा अन्यथा मार दूँगा। प्राणों के लोभ से राजा ने मंत्र की अवहेलना कर दी। बस, देव ने उसे मार दिया। वह मिथ्यात्व से मरकर नरक चला गया। देखो! जो मंत्र रक्षक था, राजा ने उसे ही जब छोड़ दिया, तब उसकी रक्षा वैâसे होती? इसलिए बुद्धिमानों को संकट में धर्म की ही शरण लेना चाहिए, धर्म को छोड़ना नहीं चाहिए।
अरनाथ तीर्थंकर के बाद दो सौ करोड़ वर्षों के बीत जाने पर उन्हीं के तीर्थ में ये सुभौम चक्रवर्ती हुए हैं।

Padam Chakravarti's Detail
पद्म चक्रवर्ती की विस्तृत जानकारी
जिस स्वर्ग से आये थे ब्रह्मस्वर्ग. (प.पु./२०/१२४-१९३) २ अच्युत(म.पु./पूर्ववत्)
Birthplace Hastinapur / Varanshi
जन्मस्थान हस्तिनापुर(प.पु./२०/१२५-१९३) वाराणसी(म.पु./पूर्ववत्)
Parents Mother:-Queen Mayuri Father :- King Padamrath
माता-पिता माता - मयूरी/ चित्रमती ,पिता - पद्मरथ / पद्मनाभ
Height २२ Bow
ऊंचाई २२ धनुष
Age/आयु 30000 Years/ ३०,००० वर्ष
कुमार काल 500 Years/५०० वर्ष
मंडलीक काल 500 Years/५०० वर्ष
विजयकाल ३०० वर्ष
राज्य काल १८७०० वर्ष
संयम काल १०००० वर्ष
कौन से तीर्थ काल में हुए मल्लिनाथ भगवान
प्राप्त गति मोक्ष
उज्जयिनी नगरी में श्रीधर्मा नाम के प्रसिद्ध राजा थे, उनकी श्रीमती नाम की रानी थी। राजा के बलि, बृहस्पति, नमुचि और प्रह्लाद ऐसे चार मंत्री थे । किसी समय सात सौ मुनियों सहित महामुनि अकंपनाचार्य उज्जयिनी के बाहर उपवन में विराजमान हुए । महामुनि की वंदना के लिए नगर के लोग उमड़ पड़े। महल पर खड़े हुए राजा ने मंत्रियों से पूछा कि ये लोग असमय में कहाँ जा रहे हैं? उत्तर में मंत्रियों ने कहा कि राजन्! ये लोग अज्ञानी दिगम्बरों की वंदना के लिए जा रहे हैं ।
श्रीधर्मा ने भी जाने की इच्छा प्रकट की, मंत्रियों के द्वारा बहुत रोकने पर भी राजा चल पड़ा, तब मंत्री भी उसके साथ हो लिए। वहाँ मुनियों की वंदना कर कुछ विवाद करने लगे । उस समय गुरु आज्ञा से सब मुनि मौन लेकर बैठे थे इसीलिए ये चारों मंत्री विवश होकर लौट आये। लौटते समय उन्होंने एक मुनि को सामने आते हुए देखकर उन्हें राजा के समक्ष छेड़ा। सब मंत्री मिथ्यामार्ग से मोहित तो थे ही अत: श्रुतसागर नामक उक्त मुनिराज ने उन्हें वाद-विवाद में जीत लिया । उस दिन रात्रि के समय उक्त मुनिराज प्रतिमायोग से उसी वाद की जगह विराजमान थे । ये सब मंत्री संघ को मारने के लिए जाते हुए मार्ग में उन मुनि को मारने के लिए उद्यत हुए परन्तु वनदेव ने उन्हें कीलित कर दिया । यह देख राजा ने उन्हें अपने देश से निकाल दिया ।

हस्तिनापुर से जुड़ा था पुराना वैर


उस समय हस्तिनापुर में महापद्म नामक चक्रवर्ती रहते थे । किसी समय चरमशरीरी महापद्म चक्रवर्ती किसी निमित्त से विरक्त हो गये, इनके दो पुत्र थे । राजा ने बड़े पुत्र ‘पद्म’ को राज्य देकर छोटे पुत्र विष्णुकुमार के साथ दीक्षा धारण कर ली। तपश्चरण करते हुए मुनि विष्णुकुमार अनेक ऋद्धियों के भण्डार हो गये । इधर उज्जयिनी से निकाले गये बलि आदि चारों मंत्री राजा पद्म को प्रसन्न कर उसके मंत्री हो गये । उस समय राजा पद्म बलि मंत्री की सहायता से किले में स्थित सिंहबल राजा को पकड़ने में सफल हो गये इसलिए उन्होंने बलि से कहा कि ‘वर’ मांग कर इष्ट वस्तु को ग्रहण करो। बलि ने प्रणाम कर कहा कि ‘अभी आवश्यकता नहीं है, जब आवश्यकता होगी तब माँग लूँगा’ यह कहकर अपना वर धरोहर रूप में रख दिया । अनन्तर ये मंत्री सुखपूर्वक रहने लगे ।
किसी समय धीरे-धीरे विहार करते हुए अकंपनाचार्य सात सौ मुनियों के साथ हस्तिनापुर आये और चार माह के लिए वर्षायोग धारण कर नगर के बाहर विराजमान हो गए। उस समय शंका को प्राप्त हुए ये बलि आदि भयभीत हो गये और अहंकार के साथ उन्हें हटाने का उपाय सोचने लगे । बलि ने राजा पद्म के पास आकर कहा कि राजन्! आपने जो वर दिया था उसके फलस्वरूप सात दिन का राज्य मुझे दिया जाये। ‘संभाल, तेरे लिए सात दिन का राज्य दिया’ यह कहकर राजा पद्म अपने अन्त:पुर में रहने लगे । बलि ने राज्य सिंहासन पर आरूढ़ होकर उन अकंपनाचार्य आदि मुनियों पर उपद्रव करवाया। उसने चारों तरफ से मुनियों को घेरकर उनके समीप पत्तों का धुँआ कराया तथा जूठन व कुल्हड़ आदि पिंकवाए। अकंपनाचार्य सहित सब मुनि आदि ‘उपसर्ग दूर हुआ तो आहार, विहार करेंगे, अन्यथा नहीं’ इस प्रकार सावधिक संन्यास धारण कर उपसर्ग सहित हुए कायोत्सर्ग से खड़े हो गये । उस समय विष्णुकुमार मुनि के अवधिज्ञानी गुरु मिथिलानगरी में थे । वे अवधिज्ञान से विचारकर तथा दया से युक्त हो कहने लगे कि हा! आज अकंपनाचार्य आदि सात सौ मुनियों पर अभूतपूर्व दारुण उपसर्ग हो रहा है । उस समय उनके पास बैठे हुए क्षुल्लक ने पूछा-हे नाथ! कहाँ हो रहा है? गुरु ने कहा-हस्तिनापुर में। क्षुल्लक ने कहा-हे नाथ! यह उपसर्ग किसके द्वारा दूर हो सकता है? गुरु ने कहा-जिन्हें विक्रियाऋद्धि प्राप्त हुई है ऐसे विष्णुकुमार मुनि से यह उपसर्ग दूर हो सकता है । क्षुल्लक पुष्पदंत ने उसी समय जाकर मुनि विष्णुकुमार से सब समाचार कहा। तब मुझे विक्रिया ऋद्धि है या नहीं? इसकी परीक्षा के लिए मुनि ने अपनी भुजा पैलाई सो वह भुजा बिना रुकावट के आगे बढ़ती ही चली गई। जिससे उन्हें ऋद्धि प्राप्ति का निश्चय हो गया। ऐसे जिनशासन के स्नेही वे विष्णुकुमार मुनि राजा पद्म के पास जाकर बोले-हे पद्मराज! राज्य पाते ही तुमने यह क्या कर रखा है ऐसा कार्य कुरुवंशियों में तो कभी नहीं हुआ है ।
राजा पद्म ने नम्रीभूत होकर कहा-हे नाथ! मैंने बलि के लिए सात दिन का राज्य दे रखा है इसलिए इस विषय में मेरा अधिकार नहीं है । हे भगवन्! आप ही इस उपसर्ग को दूर करने में समर्थ हैं । विष्णुकुमार ने वहाँ जाकर मुनियों के उपसर्ग को दूर करने के लिए बलि को समझाया। उसने कहा कि यदि ये सब मुनि मेरे राज्य से चले जाते हैं तो उपसर्ग दूर हो सकता है । अन्यथा ज्यों का त्यों बना रहेगा। उत्तर में मुनि विष्णुकुमार ने कहा कि ये आत्मध्यान में लीन हैं । इस उपसर्ग में एक कदम भी नहीं जा सकते हैं । उस समय मुनियों के ठहरने के लिए तीन डग भूमि बलि से मांगी, तब बलि ने स्वीकार कर लिया ।

इस प्रकरण में उत्तरपुराण में ऐसा लिखा है कि

महामुनि विष्णुकुमार वामन (ब्राह्मण) का रूप लेकर बलि के पास आशीर्वाद देते हुए पहुँचे और बोले- महाभाग! तू दातारों में श्रेष्ठ है इसलिए आज मुझे भी कुछ दे। उत्तर में बलि ने इच्छित वस्तु माँगने को कहा, तब ब्राह्मण वेषधारी विष्णुकुमार मुनि ने कहा कि हे राजन्! मैं अपने पैर से तीन डग धरती चाहता हूँ तू यही मुझे दे दे। तब बलि ने कहा ‘यह तो बहुत थोड़ा क्षेत्र है इतना ही क्यों माँगा? ले लो’ इतना कहकर उसने ब्राह्मण के हाथ में जलधार छोड़कर तीन पैर धरती दे दी।’’ अनन्तर वामन मुनि विष्णुकुमार ने विक्रिया ऋद्धि से अपने शरीर को इतना बड़ा बना लिया कि वह ज्योतिष्पटल को छूने लगा। उन्होंने एक पैर मेरु पर्वत पर रखा और दूसरा मानुषोत्तर पर्वत पर रखा और तीसरे डग के लिए अवकाश न मिलने से वह डग आकाश में घूमता रहा। उस समय विष्णु मुनि के प्रभाव से तीनों लोकों में क्षोभ मच गया। किम्पुरुष आदिदेव ‘क्या है’? यह शब्द करने लगे । वीणा बांसुरी बजाने वाले गन्धर्व देव अपनी-अपनी देवियों के साथ उन मुनिराज के समीप मधुर गीत गाने लगे । लाल-लाल तलुवे से सहित एवं आकाश में स्वच्छन्दता से घूमता हुआ उनका पैर अत्यधिक सुशोभित हो रहा था। ‘हे विष्णो! हे प्रभो! मन के क्षोभ को दूर करो, दूर करो, आप के तप के प्रभाव से आज तीनों लोक चल-विचल हो उठे हैं ।’ इस प्रकार मधुर गीतों के साथ वीणा बजाने वाले देवों, धीर-वीर विद्याधरों तथा सिद्धान्त की गाथाओं को गाने वाले एवं बहुत ऊँचे आकाश में विचरण करने वाले चारण ऋद्धिधारी मुनियों ने जब उन्हें शांत किया तब वे धीरे-धीरे अपनी विक्रिया को संकोचकर स्वभावस्थ हो गये । उस समय देवों ने शीघ्र ही मुनियों का उपसर्ग दूर कर दुष्ट बलि को बाँध लिया और उसे दण्डित कर देश से निकाल दिया । उस समय किन्नर देव तीन वीणाएँ लाये थे । उसमें घोषा नाम की वीणा तो उत्तर श्रेणी में रहने वाले विद्याधरों को दी, महाघोषा वीणा सिद्धवूटवासियों को और सुघोषा नाम की वीणा दक्षिण तटवासी विद्याधरों को दी। इस प्रकार उपसर्ग दूर करने से जिनशासन के प्रति वत्सलता प्रगट करते हुए विष्णुकुमार मुनि ने सीधे गुरु के पास जाकर प्रायश्चित्त द्वारा विक्रिया की शल्य छोड़ी। स्वामी विष्णुकुमार घोर तपश्चरण कर घातिया कर्मों का क्षयकर केवली हुए और अन्त में मोक्ष को प्राप्त हुए ।

यह कथा हरिवंशपुराण के आधार पर है

अन्यत्र बतलाया है कि उस समय उपसर्ग से पीड़ित मुनियों के गले धुएँ और अग्नि की भयंकर लपटों से पीड़ित हैं ऐसा समझकर श्रावकों ने विवेकगुणों से उन मुनियों को खीर का आहार दिया था। उसी स्मृति में रक्षाबंधन पर्व के दिन आज भी सर्वत्र घर-घर में लोग खीर बनाते हैं और पात्र की प्रतीक्षा करते हैं । मुनियों के अभाव में श्रावक आदि पात्रों को भोजन कराकर भोजन करते हैं । धर्म तथा धर्मात्माओं के प्रति वात्सल्य करने वाले मुनि श्री विष्णुकुमार की तथा उपसर्ग विजेता अवंâपनाचार्य आदि मुनियों की कथा सुनते हैं और उनकी पूजा करते हैं । धर्म की रक्षा करने के लिए आपस में रक्षासूत्र बाँधते हैं । वह दिन श्रावण शुक्ला पूर्णिमा का था अत: आज तक उस दिन की स्मृति में ‘रक्षाबंधन’ पर्व मनाते हैं ।
श्री विष्णुकुमार मुनि के पिता ‘महापद्म’ चक्रवर्ती श्री मल्लिनाथ भगवान के तीर्थ में हुए हैं । इनको इस पृथ्वी पर हुए आज लगभग पैंसठ लाख छियासी हजार पाँच सौ वर्ष हो गये किन्तु आज भी यह हस्तिनापुर क्षेत्र उन मुनियों की स्मृति को जीवन्त कर रहा है और भव्यजीवों को उपसर्ग सहन करने का तथा विष्णुकुमार मुनि सदृश धर्मात्माओं के प्रति वात्सल्य भाव रखने का उपदेश दे रहा है ।

Harisen Chakravarti's Detail
हरिसेन चक्रवर्ती की विस्तृत जानकारी
जिस स्वर्ग से आये थे माहेन्द्र (प.पु./२०/१२४-१९३) २ सनत्कुमार (म.पु./पूर्ववत्)
Birthplace Kaampilya / Bhogpur
जन्मस्थान काम्पिल्य(प.पु./२०/१२५-१९३) भोगपुर(म.पु./पूर्ववत्)
Parents Mother:-Queen Mayuri Father :- King Padamnabh / Hariketu
माता-पिता माता - वप्रा/ एरा पिता - पद्मनाभ / पद्मनाभ
Height 20 Bow
ऊंचाई २० धनुष
Age/आयु 10000 Years/ १०,००० वर्ष
कुमार काल 325 Years/३२५ वर्ष
मंडलीक काल 325 Years ३२५ वर्ष
विजयकाल १५० वर्ष
राज्य काल ८८५० वर्ष
संयम काल ३५० वर्ष
कौन से तीर्थ काल में हुए मुनिसुव्रत भगवान
प्राप्त गति मोक्ष / सर्वार्थ सिद्धि
कांपिल्यनगर के राजा सिंहध्वज की पट्टरानी वप्रादेवी थीं। उनके हरिषेण नाम का पुत्र था। उन राजा की दूसरी रानी महालक्ष्मी थी, यह अत्यंत गर्विष्ठ थी। किसी समय आष्टान्हिक पर्व में महामहोत्सव करके महारानी वप्रा ने जिनेन्द्र भगवान का रथोत्सव कराने का निश्चय किया। तभी रानी महालक्ष्मी ने जैनरथ के विरुद्ध होकर उसे रोक दिया और ब्रह्मरथ निकलाना चाहा। तब वप्रा महारानी ने शोक से संतप्त हो अन्न-जल का त्याग कर दिया और दु:ख से व्याकुल हो रोने लगी। पुत्र हरिषेण ने माता के दु:ख को देखकर स्थिति जानकर चिंतन किया-
मैं पिता के विरोध में भी नहीं बोल सकता हूँ और न माता का दु:ख देख सकता हूँ। वह उद्विग्नमना घर से निकलकर वन में पहुँचा। वहाँ भटकते हुए अंगिरस ऋषि के शिष्य शतमन्यु के आश्रय में पहुँचा। इसी के पूर्व की एक घटना थी-चंपानगरी के राजा जनमेजय को एक कालकल्प राजा ने बहुत बड़ी सेना लेकर घेर लिया। जब तक राजा में युद्ध हो, बीच में ही माता नागवती अपनी पुत्री को लेकर लंबी सुरंग के मार्ग से निकलकर वन में शतमन्यु के आश्रम में पहुँच गई थी। वहाँ आश्रम में उस पुत्री ने हरिषेण को देखा तो वह उसके प्रति आसक्त हो गई। माता नागवती ने कहा-पुत्रि! एक महामुनि ने कहा था कि तू चक्रवर्ती की स्त्रीरत्न होगी। तपस्वियों ने भी जब कन्या का हरिषेण के प्रति अनुराग जाना, उसी समय अपकीर्ति के डर से हरिषेण को आश्रम से निकाल दिया, वह शोकाकुल हुआ। इधर माता के दु:ख से तो व्याकुल था ही, कन्यारत्न के लिए और भी चिंतित हो गया।
इधर भटकते हुए हरिषेण सिंधुनद नगर में पहुँचता है। वहाँ नगर की स्त्रियाँ उसके रूप को एकटक देख रही थीं। तभी एक अंजनगिरि नाम का हाथी वहाँ उन्मत्त हो उधर आ गया। महावत जोर-जोर से चिल्ला रहा था-भागो! भागो! उस समय बहुत ही स्त्रियाँ व बालक हरिषेण के निकट आ गये और कहने लगे-बचाओ! बचाओ! हरिषेण कुछ ही क्षणों में उस हाथी को वश में करके उस पर चढ़ गया। महल की छत से यह सब देखकर राजा सिंधु ने हरिषेण को बुलाकर सम्मानित करके अपनी सौ पुत्रियों के साथ उसका विवाह कर दिया।
इधर दूसरी एक घटना होती है कि एक विद्याधर की कन्या वेगवती रात्रि में सोते हुए हरिषेण को उठाकर ले गई अर्थात् हरिषेण का अपहरण कर लिया और पुन: उसने बताया कि- हे भद्र! मैं सूर्योदय के राजा शक्रधनु की पुत्री जयचन्द्रा की सखी हूँ। वह कन्या आपके चित्रपट को देखकर आपमें आसक्त है, अत: मैंने आपका अपहरण किया है। वहाँ सूर्योदय नगर में पहॅुँचकर हरिषेण ने देखा कि राजा शक्रधनु सामने आते हैं। परस्पर में कुशलक्षेम, वार्ता के अनंतर अपनी कन्या का विवाह करने की तैयारी करते हैं। इधर विद्याधर गंगाधर और महीधर कुपित होकर युद्ध के लिए सामने आ गए। इसलिए कि हम विद्याधरों को छोड़कर इस कन्या का विवाह एक भूमिगोचरी के साथ वैसे संभव है ? उसी क्षण हरिषेण श्वसुर शक्रधनु राजा से रथ आदि लेकर युद्धक्षेत्र में आ गए और अपनी कुशलता से विद्याधरों को पराजित कर दिया।
उसी समय उस हरिषेण के पुण्योदय से चक्ररत्न प्रगट हो गया और ये दशवें चक्रवर्ती के रूप में प्रसिद्ध हो गए। इनके और भी रत्न प्रगट हो गए थे। निर्विघ्न विवाह सम्पन्न होने के बाद चक्रवर्ती हरिषेण विशाल लंबी-चौड़ी सेना-बारह योजन तक पैâली हुई सेना को लेकर शत्रुओं को वश में करते हुए तापसी के आश्रम में पहुँचे। उन तापसियों ने हरिषेण को चक्रवर्ती देखकर सामने पहुँच फल आदि अघ्र्य से सम्मानित किया। तभी शतमन्यु के पुत्र जनमेजय और माता नागवती ने अपनी कन्या मदनावती का हरिषेण के साथ विवाह सम्पन्न कर दिया।
अनंतर चक्रवर्ती हरिषेण बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजाओं के साथ अपने कांपिल्यनगर में आए, माता वप्रादेवी के चरणों में नमस्कार किया पुन: माता का आशीर्वाद प्राप्तकर सूर्य के समान तेजस्वी ऐसे बड़े-बड़े रथों में भगवन्तों की प्रतिमा विराजमान करके कांपिल्यनगर में ‘रथोत्सव कराकर अतिशायी धर्म की प्रभावना करके माता के मनोरथों को सफल किया। पृथ्वी, पर्वत, नदियों के समागम स्थान, नगर तथा गाँव-गाँव में चक्रवर्ती हरिषेण ने नाना रंग के ऊँचे-ऊँचे जिनमंदिर बनवाए थे। बहुत काल तक चक्रवर्ती ने छहखण्ड का शासन करके अंत में राज्यभार छोड़कर जैनेश्वरी दीक्षा लेकर तपश्चरण करके तीन लोक का शिखर प्राप्त कर लिया है-सभी कर्मों का नाशकर मोक्ष प्राप्त किया है। ऐसे हरिषेण चक्रवर्ती सिद्धालय में अनंतानंत काल तक रहेंगे, उन्हें मेरा कोटि-कोटि नमस्कार होवे।
किसी समय राजा दशानन-रावण अपने दादा सुमाली के साथ विमान में बैठकर आकाशमार्ग से जा रहा था। अकस्मात् नीचे देखकर सुमाली से पूछता है- हे पूज्य! इधर इस पर्वत के शिखर पर सरोवर तो नहीं हैं, पर कमलों का समूह लहलहा रहा है, सो इस महा आश्चर्य को आप देखें। हे स्वामिन्! यहाँ पृथ्वीतल पर पड़े ये रंगबिरंगे बड़े-बड़े मेघ निश्चल होकर वैसे खड़े हैं ? तब सुमाली ने ‘नम: सिद्धेभ्य:’१ उच्चारण करके कहा-
हे वत्स! न तो ये कमल हैं और न ये मेघ ही हैं, किन्तु सपेद पताकाएँ जिन पर छाया कर रही हैं तथा जिनमें हजारों प्रकार के तोरण बने हुए हैं, ऐसे-ऐसे ये जिनमंदिर पर्वत के शिखरों पर सुशोभित हो रहे हैं। ये सब मंदिर महापुरुष हरिषेण चक्रवर्ती के द्वारा बनवाए हुए हैं। हे वत्स! तुम इन्हें नमस्कार करो और क्षणभर में अपने मन को पवित्र करो।
ऐसा सुंदर कथन पद्मपुराण में आया हुआ है। उसी गं्रथ से यह हरिषेण चक्रवर्ती का जीवन परिचय लिखा गया है। ये हरिषेण चक्रवर्ती श्री मुनिसुव्रत भगवान के तीर्थकाल में हुए हैं।

Jaisen Chakravarti's Detail
जयसेन चक्रवर्ती की विस्तृत जानकारी
जिस स्वर्ग से आये थे ब्रह्मस्वर्ग (प.पु./२०/१२४-१९३) २ महाशुक्र(म.पु./पूर्ववत्)
Birthplace Kaampilya / Koushambi
जन्मस्थान काम्पिल्य(प.पु./२०/१२५-१९३) कौशाम्बी(म.पु./पूर्ववत्)
Parents Mother:-Queen Prabhakari Father :- King Vijay
माता-पिता माता - प्रभाकरी पिता - विजय
Height 15 Bow
ऊंचाई १५ धनुष
Age/आयु तीन हजार वर्ष
कुमार काल ३०० वर्ष
मंडलीक काल ३०० वर्ष
विजयकाल १०० वर्ष
राज्य काल १९०० वर्ष
संयम काल 400 Years/४०० वर्ष
कौन से तीर्थ काल में हुए भगवान नमिनाथ
प्राप्त गति मोक्ष / जयन्त
भगवान नमिनाथ के तीर्थ में जयसेन नाम के ग्यारहवें चक्रवर्ती हुए हैं। इसी जम्बूद्वीप के उत्तर में ऐरावत क्षेत्र में श्रीपुर नगर के राजा ‘वसुंधर’ राज्य संचालन कर रहे थे। किसी समय रानी पद्मावती के मरण से दु:खी हुए मनोहर नाम के वन में वरचर्य (वरधर्म) नाम के केवली भगवान की गंधकुटी में पहुँचे। धर्मोपदेश सुनकर विरक्तमना हुए अपने पुत्र विनयंधर को राज्यभार सौंपकर अनेक राजाओं के साथ दीक्षाग्रहण कर ली। अंत में समाधिपूर्वक मरण करके महाशुक्र स्वर्ग में देव हो गए। वहाँ पर सोलह सागर की आयु को व्यतीत कर वहाँ से च्युत होकर कौशाम्बी नगरी के इक्ष्वाकुवंशीय राजा विजय की महारानी प्रभाकरी के पुत्र हुए।
इनका नाम ‘जयसेन’ रखा, इनकी आयु तीन हजार वर्ष की थी, साठ हाथ शरीर की ऊँचाई थी, स्वर्णिम शरीर की कांति थी। ये चौदह रत्न और नवनिधियों के स्वामी ग्यारहवें चक्रवर्ती हुए हैं।
किसी समय राजमहल की छत पर अपनी रानियों के साथ बैठे थे। उसी समय आकाश से गिरते हुए ‘उल्का’ को देखा। तत्क्षण ही वैराग्य भावना का चिंतवन करके अपने बड़े पुत्र को राज्य देना चाहा, किन्तु उसके मना करने पर छोटे पुत्र को राज्य देकर ‘वरदत्त’ नाम के केवली भगवान के पादमूल में अनेक राजाओं के साथ संयम धारण कर लिया। तपस्या के प्रभाव से श्रुत, बुद्धि, तप, विक्रिया, औषधि और चारणऋद्धि से विभूषित हो गए। अंत में सम्मेदशिखर के चरण नामक ऊँचे शिखर पर प्रायोपगमन सन्यास धारण कर आत्मा की आराधना करते हुए शरीर छोड़कर ‘जयंत’ नाम के अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र हो गये१। आगे ये नियम से मोक्ष प्राप्त करेंगे।

Bramhdatt Chakravarti's Detail
ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती की विस्तृत जानकारी
जिस स्वर्ग से आये थे
Birthplace Kaampilya
जन्मस्थान काम्पिल्य(प.पु./२०/१२५-१९३)
Parents Mother:-Queen Chudadevi Father :- King Brhmdatt
माता-पिता माता - चूला / चूड़ादेवी पिता - ब्रह्मरथ / ब्रह्मा
Height 07 Bow
ऊंचाई ७ धनुष
Age/आयु ७०० वर्ष
कुमार काल २८ वर्ष
मंडलीक काल 56 Years/५६ वर्ष
विजयकाल १६ वर्ष
राज्य काल ६०० वर्ष
संयम काल 0 वर्ष
कौन से तीर्थ काल में हुए भगवान नमिनाथ
प्राप्त गति सातवे नरक
भगवान नेमिनाथ तीर्थंकर और पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के अंतराल में ये बारहवें चक्रवर्ती ब्रह्मदत्त हुए हैं। ये ब्रह्मराजा की महारानी चूड़ादेवी के पुत्र थे। इनके शरीर की ऊँचाई ७ धनुष एवं सात सौ वर्ष की आयु थी। इसमें इनका कुमारकाल २८ वर्ष, महामण्डलेश्वर काल ५६ वर्ष, दिग्विजयकाल १६ वर्ष, चक्रवर्ती राज्यकाल ६०० वर्ष रहा है। ये चक्रवर्तियों में अंतिम चक्रवर्ती हुए हैं। इन्होंने भी चक्ररत्न प्राप्तकर १४ रत्न एवं नवनिधियों के स्वामी होकर छह खण्ड पृथ्वी को जीतकर एकछत्र शासन किया है। पुन: राज्य में ही दुध्र्यान से मरकर सातवें नरक गए हैं। जैनशासन में यह नियम है कि जो राज्यवैभव को भोगते हुए दुध्र्यान-आर्त अथवा रौद्रध्यान से मरते हैं, वे नरक चले जाते हैं और जो राज्य त्यागकर दीक्षा लेकर संयम धारण कर लेते हैं, वे ही स्वर्ग अथवा मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं।