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12 Chakravarti Details
Chakravartis (Click here for more detail) are emperors who rule over a part of the world (Bharata- and having six parts). Their life is embellished with similar features like those of the Tirthankaras.
Chakravartis are emperors who rule over a part of the world (Bharata- and having six parts). Their life is embellished with similar features like those of the Tirthankaras. Every ChakarvartI obtains his high rank on account of good actions done in earlier existences and on account of a Nidana, i.e. a wish which is passionately cherished in an earlier life. He is born in the royal family of Iksvaku, grows in pomp and glory and is ex­perienced in all arts and sciences. Having beauty and power, being brave and clever, he is embellished with 36 insignias of mind and body. After vanquishing all the opponents in battle, he conquers the world; served and praised by gods and genii, he is anointed emperor.
He rules for a long period and powerfully, enjoying all the pleasures with his many wives and treasures which the earth can offer. The end of the life of Chakravartls is very different. Whereas some renounce the world or even become Tirthankaras (like the 16th, 17th and 18th Chakravartis of this world-period) and get redemption, others come to the heaven of gods after their death, and some others fall into hell on account of their bad actions.
Chakravartis owe their success not only to their capa­bility and power and the support they get from their supermundane beings, but also, above all, to the won­derful “gems” (Ratnas) and precious “treasures” (Nidhi) which are in their possession.
The nine “treasures” (Nidhis) with which a Chakravarti is blessed, are, according to one view, collection of books in which there is literature on 9 different branches of science, according to another, contair!ers or treasure-houses in which there are things whose appli­cation is taught in those books. Names and contents of the 9 Nidhis are:
1. Naisarpa: houses,
2. Panduka: ricc and corns,
3. Pingalaka: ornament,
4. Sarvaratna.ka; 14 gems,
5. Mahapadma: clothing,
6. Kala: determinatjon of time for astrological predictions,
7. Mahakala: mines of metals and precious stones,
8. Manavaka: weapons warcraft,
9. Sankha: poetry, dramaturgy, music.

Names of Choudah Ratan are: 1)Gaj (Elephant)
2)Ashav (Horse)
3)Grahpati
4)Sthapati
5)Senapati
6)Pattrani
7)Purohit
8)Chatra
9)Asi
10)Dand
11)Chakra
12)Kaakini
13)Chintamani
14)Charm
चक्रवर्ती
भरत से लेकर ब्रह्मदत्त (यहाँ क्लिक करे )तक ये १२ चक्रवर्ती हुए ।
इसमें से भरत चक्रवर्ती आदिनाथ तीर्थंकर के समय,सगर चक्रवर्ती अजित नाथ तीर्थंकर के समय ,मघवा और सनतकुमार क्रमश: धर्मनाथ तीर्थंकर और शांतिनाथ तीर्थंकर के अंतराल में हुए । शांतिनाथ ,कुंथुनाथ और अरहनाथ ये तीन तीर्थंकर चक्रवर्ती भी हुए। सुभोम चक्रवर्ती अरहनाथ और मल्लिनाथ् भगवान् के अंतराल में ,पद्म चक्रवर्ती मल्लिनाथ और मुनिसुव्रतनाथ तीर्थंकर के अंतराल में ,हरिसेन मुनिसुव्रत नाथ और नमिनाथ तीर्थंकर के अंतराल में ,जयसेन चक्रवर्ती नमिनाथ तीर्थंकर और नेमिनाथ तीर्थंकर के अंतराल में तथा ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती नेमिनाथ तीर्थंकर और पार्श्वनाथ तीर्थंकर के अंतराल में हुए ।
पूर्व जन्म में किये गए तप के बल से भरत आदि की आयुधशाला में भुवन को विस्मित करने वाला "चक्र रत्न " उत्पन्न होता है तब अति हर्ष को प्राप्त चक्रवर्ती जिनेन्द्र भगवान् की पूजा करके विजय के निमित्त पूर्व दिशा में प्रयान करते है । क्रम से दक्षिण भरत के २ खंडो को सिद्ध करके पुन: उत्तर भरत में सम्पूर्ण भूमिगोचरी और विद्याधरो को वश में कर लेते है ।
फिर ये चक्रवर्ती वृषभ गिरी पर्वत पर अपना नाम लिखने के लिए जाते है परन्तु वहा तिलमात्र भी जगह ना होने के कारण अभिमान से रहित होकर चिन्तायुक्त खड़े हो जाते है । तब मंत्रियो और देवो के अनुरोध से किसी चक्रवर्ती का नाम अपने दंड रत्न से नष्ट करके अपना नाम लिख देते है। इस प्रकार चक्रवर्ती सम्पूर्ण ६ खंड को जीतकर अपने नगर में प्रवेश करते है ।
चक्रवर्तियों का वैभव : प्रत्येक चक्रवर्ती उत्तम संहनन ,उत्तम संस्थान से युक्त सुवर्ण वर्ण वाले होते है । उनकी छ्यानवे हजार (96000) रानीयाँ होती है । इनमे से बत्तीस हजार आर्य खंड से ,बत्तीस हजार विद्याधर कन्याये और बत्तीस हजार मलेच्छ खंड की कन्याये होती है ।प्रत्येक चक्रवर्ती के ३२००० गणबद्ध राजा ,१००००००० थालियाँ ,८४००००० भद्र हाथी ,८४००००० रथ .१८००००००० घोड़े ,८४००००००० उत्तम वीर,८८००० मलेच्छ राजा,अनेको करोडो विद्याधर,३२०० मुकुट्बद्ध राजा, ३२००० नाट्य शाला,३२००० संगीतशालाये और ४८००००००० पदातिगन होते है ।
सभी चक्रवर्तियों में से प्रत्येक के पास ९६००००००० ग्राम (गाँव),७५०० नगर,१६००० खेट ,२४००० कर्वट,४००० पत्तन,९९००० द्रोणमुख,१४००० संवाहन,५६ अंतर्दीप,७०० कुक्षि निवास,२८००० दुर्ग होते है। एवं चौदह रत्न,नवनिधि और दशांग भोग होते है ।
चौदह रत्न : गज ,अश्व ,गृहपति ,स्थपति ,सेनापति,पट्टरानी और पुरोहित ये साथ जीव रत्न है । छत्र,असि,दण्ड,चक्र,काकिणी, चिंतामणि और चर्म ये सात रत्न निर्जीव है।
नवनिधि :काल ,महाकाल ,पांडू,मानव,शंख,पद्म ,नैसर्प,पिंगल और नाना रत्न ये नवनिधियाँ श्रीपुर में उत्पन्न हुआ करती है ।इन नवनिधियों में से प्रत्येक क्रम से ऋतू के योग्य द्रव्य ,धान्य,आयुध, वादित्र ,वस्त्र ,हर्म्य , आभरण और रत्न समूहों को दिया करती है ।
दशांग भोग :दिव्यपुर ,रत्न ,निधि ,सैन्य ,भाजन,शय्या ,आसन,भोजन ,वाहन और नाट्य ये चक्रवर्तियों के दशांग भोग कहे जाते है |
भरत चक्रवर्ती प्रथम चक्रवर्ती थे और आदिनाथ भगवान् के पुत्र थे । इन्हें दीक्षा लेने के बाद ४८ मिनिट मे केवलज्ञान हो गया था । हुंडा अवसर्पिणी काल के प्रभाव से इनके भाई व् कामदेव बाहुबली से इनका मान भंग हुआ था ।
Source: Jain Bharti (Aariyka Gyanmatimataji)