Deepawali Mahaparv Mahaveer Nirvanotshav

दीपावली महापर्व - भगवान महावीर निर्वाण दिवस :


त्यौहार संस्कृति और सभ्यता के प्रतीक है तथा उनका सम्बन्ध भी प्राचीन महत्त्पूर्ण घटनाओ से जुडा हुआ है| दीपावली हमारे देश का प्रसिद्ध त्यौहार है| सभी लोग इसे प्रेम और उत्साह से मनाते है| इससे कई धर्मो की कथाये जुडी है| कहा जाता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम चन्द्र जी द्वारा दशहरे के दिन रावण का वध करके इस दिन अयोध्या पधारे थे, पर विद्वानों का मत है कि इसका कोई शास्त्रीय आधार नहीं है| इसी दिन श्री कृष्ण जी ने नरकासुर का वध किया था| सत्रहवी शताब्दी में सिखों के छठे गुरु श्री हरगोबिन्द सिंह जी मुग़ल बादशाह की कैद से छुटे थे| इसी दिन उन्नस्वी शताब्दी में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने तथा स्वामी रामकृष्ण परम हंस ने शरीर त्याग किया था| इस प्रकार सभी धर्मो में अपनी-अपनी मान्यतानुसार इस तिथि का महत्तव है|
मगर इस पर्व का सीधा और सच्चा सम्बन्ध जैन धर्म के 24वे तीर्थंकर भगवन महावीर स्वामी जी से है| कार्तिक कृष्ण अमावस्या की सुप्रभात की शुभ बेला में भगवन महावीर स्वामी ने चारो अघतिया कर्मों को भी नष्ट करके निर्वाण प्राप्त किया था| भगवान के निर्वाण कल्याणक की इन्द्रादि ने आकर बड़े धूम धाम से पूजा की थी| सम्राट श्रेणिक आदि नरेन्द्रो ने भी अपनी प्रजा के साथ महान निर्वाणोत्सव मनाया था| तभी से यह पर्व मनाया जाता है| जैन धर्म किसी जाति, वर्ण, संप्रदाय या पंथ विशेष का नाम नहीं है क्योंकि जैन धर्म का प्रतिपादन करने वाले सभी 24 तीर्थंकर क्षत्रिय थे और उनके अधिकांश शिष्य ब्राह्मण थे| जैन धर्म उस वस्तु स्वरुप का प्रतिपादन करता है जो अनादिकाल से है और अनंतकाल तक रहेगा| जैन धर्म प्राणी मात्र का धर्म है| तीर्थंकर महावीर ने मानव जीवन की प्रत्येक क्रिया को अहिंसा के माप दंड द्वारा मापा है| एक जन्म की साधना से कोई तीर्थंकर नहीं बन सकता, यह तो अनेक भवो की साधना का फल है| इस पद को पाना कोई साधारण बात नहीं, इसके लिए आत्मा का पूर्ण विकास और परम विशुद्धि आवश्यक है| भगवान महावीर का सन्देश केवल विश्वव्यापी ही नहीं, अपितु सार्वजानिक और सर्वकालिक भी है| उनके सन्देश को हम यदि संक्षेप में कहे तो विचारो में अनेकांत, वाणी में स्यादवाद, आचरण में अहिंसा और व्यवहार में अपरिग्रह के रूप में व्यक्त कर सकते है|
इस पुनीत भारत वसुंधरा पर अबसे 2600 वर्ष पहले बिहार के कुण्डलपुर ग्राम में माता त्रिशला (प्रियकरिणी) की कुक्षी से भगवान महावीर ने जन्म लिया था| घर में रहते हुए भी वर्धमान स्वामी अत्यंत निर्लिप्त रहते थे| कभी-कभी वे भोजन करते, चलते फिरते हुए भी वे अन्तास्त्तव में निमग्न हुए प्रतीत होते थे| जब वे सामायिक में होते थे तो उनकी निश्छल शांत मुद्रा देखते ही बनती थी| अपने जीवन में उन्होंने अहिंसा, विश्वमैत्री और आत्मोद्धार का उत्कृष्ट आदर्श उपस्थित किया था| वह आजन्म ब्रह्मचारी रहे, 30 वर्ष की भरी जवानी में उन्होंने दीक्षा ली| 12 वर्ष की कठोर साधना के उपरांत दुर्धर तपकर 42 वर्ष की आयु में आत्मा के प्रबल शत्रु चार घातिया कर्मो का नाश कर लोका लोक प्रकाशक केवल ज्ञान प्राप्त कर लिया और भव्य जीवो को दिव्य-ध्वनी द्वारा आत्मा के उद्धार का मार्ग बताया| 72 वर्ष की आयु के अंत में कार्तिक कृष्ण अमावस्या को प्रात: काल मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त किया|
उसी दिन शाम को भगवान के प्रथम गणधर श्री गौतम स्वामी को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था| तब देवो ने आकर केवल ज्ञान रूपी लक्ष्मी की पूजा की थी| गणनाम ईशा = गणेश:, गणधरा ये दोनों पर्यायवाची नाम गौतम स्वामी के ही है| तब से इन दोनों आत्माओ महावीर स्वामी और गौतम स्वामी की स्मृति में यह दीपावली पर्व समस्त भारत वर्ष में मनाया जाता है| भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के उपलक्ष्य में लोग प्रात:काल स्तुति पाठ पढ़ते है| मन्दिर जी में जाकर निर्वाण पूजा, निर्वाण कांड महावीराष्टक पढ़कर निर्वाण लाडू चढाते है| अपने घरो को खूब सजाते है, परस्पर मित्रो और सम्बन्धियों में मिठाई बांटते है| संध्या के समय पूज्य गौतम स्वामी के केवल ज्ञान कल्याणक की ख़ुशी में जलती दीपो की पंक्तियों से घर के अन्दर और बाहर रौशनी करते है| भजन आरती करके भगवान के गुणों का गान करते है|
सच्ची लक्ष्मी तो आत्मा के गुणों का पूर्ण विकास केवल ज्ञान हो जाना तथा मोक्ष प्राप्ति ही है| हमें उस दिन महावीर स्वामी , गौतम स्वामी और केवल ज्ञान रूपी लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए| इन गुणों की पूजा करने से रुपया पैसा आदि सांसारिक लक्ष्मी प्राप्त होना तो साधारण सी बात है|
जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है| इस धर्म के अनुसार धार्मिक पर्वो की तो बात ही क्या, लौकिक कार्यो में भी हिंसा को कोई स्थान नहीं है| लोग तो आतिशबाजी छुडाकर दिवाली मनाते है, मगर इस कार्य में असंख्यात जीवो की हिंसा होना स्वाभाविक ही है| अत: इस दिन महावीर भगवान के निर्वाण कल्याणक के पावन अवसर पर आतिशबाजी छुडाना पूर्णतया बंद होना चाहिए|
अहिंसा परमोधर्म: यतोधर्म: सतोजय: !
कुछ लोग इस पवित्र दिन जुआ खेलते है , यह मिथ्यात्व पोषक कुप्रथा तथा अधार्मिक प्रवृति है| हमें शास्त्रानुसार सम्यक दर्शन को पुष्ट करने वाली क्रियाओ द्वारा दीपावली मनानी चाहिए| इस उपर्युक्त उद्देश्य को बहुत लोग जानकार भी रुपयों-पैसो की पूजा करते है यह उनकी नितांत भूल है| उन्हें यह वास्तविक रहस्य को समझ लेना चाहिए कि धन का लाभ तो लाभ अन्तराय कर्म के क्षयोप्श्य से होता है और लाभंतराय कर्म का क्षयोपषम शुभ क्रियाओ से ही हो सकता है| रुपया पैसो की पूजा से नहीं| दीपावली हमारा राष्ट्रीय पर्व है सभी का त्यौहार है, अत: हमें इस पर्व को बड़ी श्रद्धा और भक्ति से मनाना चाहिए|
दीपावली पर्व कैसे मनाये :-
प्रात: काल स्नानादि करके पवित्र वस्त्र पहनकर जिनेन्द्र देव के मंदिर जी में परीवार के साथ पहुंचकर, जिनेन्द्र देव की पूजा वंदना करनी चाहिए| भगवान महावीर स्वामी की पूजन करके, निर्वाण कांड पढने के बाद महावीर स्वामी के मोक्ष कल्याणक का अर्घ बोलकर निर्वाण लाडू अर्घ सहित चढाना चाहिए|