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आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी (मूल ग्रन्थ :- समयसार , प्रवचनसार , अष्टपाहुड़ , वारसाणुवेक्खा , पंचास्तिकाय आदि )

Acharya Kundkund

Acharya Kundkund Bhagwan Veer is auspicious, as also the preceptor Gautam, Acharya Kundkund is auspicious and so is Jain religion. The great spiritual saint Kundkundacharyadeo occupies the highest place in the tradition of the Jain acharyas. He is remembered immediately after Bhagwan Mahaveer and the preceptor Gautam as an auspicious blessing. Every Jain recites the couplet with the three adorables, everyday reverentially before starting the study of religious texts. Jain monks feel honoured in being included in the tradition of Kundkundacharya. Jain community is as unacquainted with the life of Kundkundacharyadeo, as it is acquainted with his name and glory. Always resting in the depth of the soul and away from worldly fame, Kundkund has nowhere written anything about himself. Merely his name has been mentioned in Dwadshanupreksha. Likewise, he has described himself in Bodh Pahud as the disciple of scriptural sentient Bhadrabahu, who had the knowledge of Twelve Anga Scriptures and who had spread the message of the Fourteen Purvas.
Though writers afterwards have referred to him with faith and reverence, which throws light on his greatness, yet no particular knowledge about his life is obtained. From the information available, his time is the beginning of the Vikram Samvat. In the Tika-Prashashti of Shat Prabhrit, Shrut Sagar Suri has called him the omniscient of this dark age. He had many great fortunes. He went to Bhagwan Seemandhar Nath is Videh Kshetra and offered his homage to him. Devasenacharya in V. S. 990 in his Darshansar, has referred to about this as below :- "If Padma Nandi Nath (Kundkundacharyadeo) had not distributed the divine sentience obtained from Seemandhar Bhagwan amongst the Sadhus, how could they realise the real path of liberation ?" His real name is Padma Nandi and is known as Kundkundacharya being a resident of Kundkundpur. Following works of Kundkundacharyadeo are available:- Samaysar, Pravachansar, Panchastikaya, Niyamsar, Asta Pahud, Dwadshanu-preksha and Dash Bhakti. Rayansar and Moolachar are also said to be his works. It is said that he wrote eighty-four pahuds. It is also said that he wrote a commentary named Parikarma on the first three parts of Shat-khandagam, which is not available. Samaysar is the great unique treatise of Jain spiritualism. Pravachansar and Panchastikaya have detailed description of the Jain principles. The above three are also known as Natak Trayi, Prabhrit Trayi and Kundkund Trayi. Acharya Amritchandra has written elaborate commentaries on the three in the Sanskrit language. Commentaries of Acharya Jaisen in Sanskrit are also available. Brief Introduction Birth: 475 (Veer Nirvan sanvat) Birth Place: Kodkundpur, Karnataka Mothers Name: Shrimati Father’s Name: Karmandhu Acharya Pada: 519(Vir Nirvan sanvat), Age 44 Samadhi: Age 95

श्री कुन्दकुन्दाचार्य श्रुतधर आचार्य की परम्परा में कुन्दकुन्दाचार्य की स्थान महत्वपूर्ण है। इनकी गणना ऎसे युगसंस्थापक आचार्यों के रूप में की गयी है, जिनके नाम से उत्तरवरर्त्ती परम्परा कुन्दकुन्द-आम्नाय के नाम से प्रसिद्ध हुई है। किसी भी कार्य के प्रारम्भ में मंगलरूप में इनका स्तवन किया जाता है। मंगलस्तवन का प्रसिद्ध पद्य निम्न प्रकार है- मंगलं भगवान वीरो मंगलं गौतमो गणी । मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो जैनधर्मोस्तु मंगलं ॥ जिस प्रकार भगवान महावीर, गौतम गणधर और जैनधर्म मंगलरूप हैं, उसी प्रकार कुन्दकुन्द आचार्य भी। इन जैसा प्रतिभाशाली आचार्य और द्रव्यानुयोग के क्षेत्र में प्रायः दूसरा आचार्य दिखलाई नहीं पड़ता। जिस प्रकार भगवान महावीर, गौतम गणधर और जैनधर्म मंगलरूप हैं, उसी प्रकार कुन्दकुन्द आचार्य भी। इन जैसा प्रतिभाशाली आचार्य और द्रव्यानुयोग के क्षेत्र में प्रायः दूसरा आचार्य दिखलाई नहीं पड़ता। कुन्दकुन्द के जीवन-परिचय के सम्बन्ध में विद्वानों ने सर्वसम्मति से जो स्वीकार किया है, उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि ये दक्षिण भारत के निवासी थे। इनके पिता का नाम कर्मण्डु और माता का नाम श्रीमति था इनका जन्म ’कौण्डकुन्दपुर’ नामक स्थान में हुआ था। इस गाँव का नाम कुरुमरई भी कहा गया है। यह स्थान पेदथानाडु नामक जिले में है। कहा जाता है कि कर्मण्डुदम्पति को बहुत दिनों तक कोई सन्तान नहीं हुई। अनन्तर एक तपस्वी ऋषि को दान देने के प्रभाव से पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई, इस बालक का नाम आगे चलकर ग्राम के नाम पर कुन्दकुन्द प्रसिद्ध हुआ। बाल्यावस्था से ही कुन्दकुन्द प्रतिभाशाली थे। इनकी विलक्षण स्मरणशक्ति और कुशाग्रबुद्धि के कारण ग्रन्थाध्ययन में इनका अधिक समय व्यतीत नहीं हुआ। युवावस्था में इन्होंने दीक्षा ग्रहणकर आचार्यपद प्राप्त किया। कुन्दकुन्द का वास्तविक नाम क्या था, यह अभी तक विवादग्रस्त है। द्वादश अनुप्रेक्षा की अन्तिम गाथा में उसके रचयिता का नाम कुन्दकुन्द दिया हुआ है। जयसेनाचार्य ने समयसार की टीका में पद्मनन्दि का जयकार किया है। इन्द्रनन्दि ने अपने श्रुतावतार में कौण्डकुन्दपुर के पद्मनन्दि का निर्देश किया है। श्रवणबेलगोल के शिलालेख नं. ४० तथा ४२, ४३, ४७ और ५० वें अभिलेख में भी उक्त कथन की पुनरावृत्ति है।
स्पष्ट है कि इनका पद्मनन्दि नाम था। पर वे जन्मस्थान के नाम पर कुन्दकुन्द नाम से अधिक प्रसिद्ध हुए।
कुन्दकुन्द के षट्‌प्राभृतों के टीकाकार श्रुतसागर ने प्रत्येक प्राभृत के अन्त में जो पुष्पिका अंकित की है उसमें इनके पद्मनन्दि, कुन्दकुन्द, वक्रग्रीव, एलाचार्य और गृद्धपिच्छ ये नाम दिए हैं। इनकी परम्परा इस प्रकार है - भद्रबाहु के गुरु माघनन्दि, माघनन्दि के जिनचन्द्र और जिनचन्द्र के शिष्य कुन्दकुन्दाचार्य हुए। इनके पांच नाम थे - पद्‌मनन्दी, कुन्दाचार्य, वक्रग्रीवाचार्य, एलाचार्य एवं गृद्धपिच्छाचार्य। इनको जमीन से चार अंगुल ऊपर आकाश में चलने की ऋद्धि प्राप्त थी। उमास्वामी इनके शिष्य थे। भारतीय श्रमणपरम्परा में कुन्दकुन्दाचार्य का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन्होंने आध्यात्मिक योगशक्ति का विकास कर अध्यात्मविद्या की उस अवच्छिन्न धारा को जन्म दिया था जिसकी निष्ठा एवं अनुभूति आत्मानन्द की जनक थी। ये बड़े तपस्वी थे। क्षमाशील और जैनागम के रहस्य के विशिष्ट ज्ञाता थे। उनकी आत्म-साधना कठोर होते हुए भी दुखनिवृत्ति रूप सुखमार्ग की निदर्शक थी। वे अहंकार ममकार रूप कल्याण भावना से रहित तो थे ही, साथ ही उनका व्यक्तित्व असाधारण था। वास्तव में कुन्दकुन्दाचार्य श्रमण मुनियों में अग्रणी थे। यही कारण है कि - ’मंगलं भगवान वीरो’ इत्यादि पद्यों में निहित ’मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो’ वाक्य के द्वारा मंगल कार्यों में आपका प्रतिदिन स्मरण किया जाता है।
प्रथम श्रुतस्कन्धरूप आगम की रचना धरसेनाचार्य के शिष्य पुष्पदन्त और भूतबलि द्वारा हो रही थी। द्वितीय श्रुतस्कन्धरूप परमागम का क्षेत्र खाली था। मुक्तिमार्ग का मूल तो परमागम ही है अतः उसका व्यस्थित होना आवश्यक था तथा वही कार्य आपने पूर्ण किया। दिगम्बर आम्नाय के इन महान्‌ आचार्य के विषय में विद्वानों ने सर्वाधिक खोज की है कौण्डकुण्डपुर गाँव के नाम से पद्‌मनन्दि कुन्दकुन्द नाम से विख्यात हुए। पी.बी. देसाई कृत जैनिज्म के अनुसार यह स्थान गुण्टकुल रेलवे स्टेशन से चार मील दक्षिण की ओर कोकोणडल नामक गाँ प्रतीत होता है। यहाँ से अनेकों शिलालेख प्राप्त हुए हैं। इन्द्रनन्दि श्रुतावतार के अनुसार मुनि पद्‌मनन्दि ने कौण्ड़कुण्ड्पुर जाकर परिकर्म नामक टीका लिखी थी।
अटल नियम पालक- मुनिपुंगव कुन्दकुन्द जैन श्रमणपरम्परा के आवश्यक मूलगुण और उत्तर गुणों का पालन करते थे और अनशनादि बारह प्रकार के अन्तर्बाह्य तपों का अनुष्ठान करते हुए तपस्वियों में प्रधान महर्षि थे। उन्होंने प्रवचनसार में जैन श्रमणों के मूलगुण इस प्रकार बतलाए हैं- पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँच इन्द्रियों का निरोध, केशलोंच, षट्‌आवश्यक क्रियाएँ- आचेलक्य (नग्नता), अस्नान, क्षितिशयन, अदन्तधावन, स्थिति भोजन और एक भुक्ति (एकासन) जैन श्रमणों के अट्‌ठाईस मूलगुण जिनेन्द्र भगवान ने कहे हैं। जो साधु उनके आचरण में प्रमादी होता है वह छेदोपस्थापक कहलाता है।
रचनाएँ – आचार्य कुन्दकुन्द की निम्न कृतियां उपलब्ध हैं। पंचास्तिकाय संग्रह, समयसार, प्राभृत, प्रवचनसार और नियमसार, अष्टपाहुड़। कुछ विद्वान्‌ बारस अणुवेक्खा भत्तिसंगहो, रयणसार, कुरल काव्य और मूलाचार को भी आपकी कृतियाँ मानते हैं। आचार्य कुन्दकुन्द की कृतियों का संक्षिप्त परिचय निम्न प्रकार है -
१. समयसार - आचार्य कुन्दकुन्द का समयसार ग्रन्थ आत्मतत्त्व विवेचन का अनुपम ग्रन्थ है। मूल प्राकृत में इसका नाम ’समयपाहुड’ है, जिसे संस्कृत में समयप्राभृत कहते हैं। समयसार में सम्यग्दर्शन का विशद और विशिष्ट विवेचन है। सम्पूर्ण ग्रन्थ में शुद्धनय और अशुद्धनय की दृष्टि से कथन किया गया है
२. प्रवचनसार - प्रवचनसार ग्रन्थ में सम्यक्चारित्र के प्रतिपादन की प्रमुखता है। इस ग्रन्थ के ज्ञानाधिकार, ज्ञेयाधिकार और चारित्राधिकार में क्रमशः ज्ञान, ज्ञेय एवं चारित्र का वर्णन किया गय है।
३. पंचास्तिकाय - सम्यग्ज्ञान की कथन की दृष्टि से पंचास्तिकाय ग्रन्थ का मह्त्त्व है। इस ग्रन्थ में द्रव्य, नव पदार्थ एवं मोक्षमार्ग चूलिका ये तीन अधिकार हैं।
४. नियमसार - आचार्य कुन्दकुन्द द्वारा रचित नियमसार अपूर्व आध्यात्मिक ग्रन्थ है। इसमें प्रमुखरूप से शुद्धनय की दृष्टि से जीव, अजीव, शुद्धभाव, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान, आलोचना, प्रायश्चित्त, समाधि, भक्ति, आवश्यक, शुद्धोपयोग आदि का विवेचन किया गया है। ५. अष्टपाहुड़ - जैन मूलसंघ की परम्परानुसार अष्टपाहुड़ दिगम्बर जैन मुनियों के आचार का प्रतिपादन करने वाला महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। दर्शन, चारित्र, सूत्र, बोध, भाव, मोक्ष, लिंग और शील ये अष्टपाहुड़ हैं। इनका संक्षिप्त विवेचन अधोलिखित है - दंसणपाहुड़ - इसमें सम्यग्दर्शन का एकरूप और महत्त्व ३६ गाथाओं द्वारा बतलाया गया है। दूसरी गाथा में बताया गया है धर्म का मूल सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट व्यक्ति को निर्वाण नहीं हो सकता। चरित्तपाहुड़ - इसमें ४४ गाथाओं द्वारा चारित्र का प्रतिपादन किया गया है। चारित्र के दो भेद हैं - सम्यक्त्वाचरण और संयमाचरण। सुत्तपाहुड़ - इसमें २७ गाथाएं हैं जिसमें सूत्र की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो अरहन्त के द्वारा अर्थरूप से भाषित और गणधर द्वारा कथित हो उसे सूत्र कहते हैं। बोधपाहुड़ -बोधपाहुड़ में ६२ गाथाओं द्वारा आयतन, चैत्यगृह, जिनप्रतिमा दर्शन, जिनबिम्ब, जिनमुद्रा आत्मा, ग्य़ान, देव, तीर्थ, अर्हन्त और प्रवज्या का स्वरूप बतलाया है। अन्तिम गाथाओं में कुन्दकुन्द ने अपने को भद्रबाहु का शिष्य प्रकट किया है। भावपाहुड़ - इसमें १६३ गाथाओं द्वारा भाव की महत्ता बताते हुए भाव को ही गुण दोषों का कारण बतलाया है और लिखा है कि भाव की विशुद्धि के लिए ही परिग्रह का त्याग किया जाता है। इसमें कर्म की अनेक मह्त्त्वपूर्ण बातों का विवेचन आया है। मोक्खपाहुड़ - मोक्खपाहुड़ की गाथा संख्या १०६ है जिसमें आत्मद्रव्य का महत्त्व बतलाते हुए आत्मा के तीन भेदों को परमात्मा, अन्तरात्मा और बहिरात्मा की चर्चा करते हुए बहिरात्मा को छोड़कर अन्तरात्मा के उपाय से परमात्मा के ध्यान की बात कही गई है। लिंगपाहुड़ - इसमें १ से २२ गाथाओं का वर्णन है। तथा द्रव्यलिंग व भावलिंग का वर्णन किया गया है। शीलपाहुड़ - इसमें ४० गाथाएँ हैं जिसके द्वारा शील का महत्त्व बतलाया गया है और लिखा है कि शील का ज्ञान के साथ कोई विरोध नहीं है। परन्तु शील के बिना विषय-वासना से ज्ञान नष्ट हो जाता है। जो ज्ञान को पाकर भी विषयों में रत रहते हैं वे चतुर्गतियों में भटकते हैं और जो ज्ञान को पाकर विषयों से विरक्त रहते हैं, वे भवभ्रमण को काट डालते हैं।
६. वारसाणुवेक्खा (द्वादशानुप्रेक्षा) - इसमें ९१ गाथाओं द्वारा वैराग्योत्पादक द्वादश अनुप्रेक्षाओं का बहुत ही सुन्दर वर्णन हुआ है। वस्तु स्वरूप के बार-बार चिन्तन का नाम अनुप्रेक्षा है उनमें नामों का क्रम इस प्रकार है - अध्रुव, अशरण, एकत्व, अन्यत्व, संसार, लोक, अशुचित्व, आस्रव, संवर, निर्जरा, धर्म और बोधि। तत्त्वार्थ सूत्रकार ने अनुप्रेक्षाओं के क्रम में कुछ परिवर्तन किया है।
७. भक्तिसंग्रह - प्राकृत भाषा की कुछ भक्तियां भी कुन्दकुन्दाचार्य की कृति मानी जाती हैं। भक्तियों के टीकाकार प्रभाचन्द्राचार्य ने लिखा है - संस्कृ की सब भक्तियां पूज्यपाद की बनाई हुई और प्राकृत की सब भक्तियां कुन्दकुन्दचार्य कृत हैं। दोनों भक्तियों पर प्रभाचन्द्राचार्य की टीकाएं हैं।
कुन्दकुन्दाचार्य की आठ भक्तियां हैं। जिसके नाम इस प्रकार हैं। १.सिद्ध भक्ति २. श्रुत भक्ति ३. चरित्र भक्ति ४. योगि (अनगार) भक्ति ५. आचार्य भक्ति ६. निर्वाण भक्ति ७. पंचगुरु (परमेष्ठी) भक्ति ८. थोस्मामि थुदि (तीर्थंकर भक्ति)। सिद्ध भक्ति - इसमें १२ गाथाओं के द्वारा गुण, भेद, सुख, स्थान, आकृति, सिद्धि के मार्ग तथा क्रम का उल्लेख करते हुए अति भक्ति से उनकी वन्दना की गई है।
श्रुतभक्ति - एकादश गाथात्मक इस भक्ति में जैन्श्रुत के आचारांगादि द्वादशांगों का भेद-प्रभेद सहित उल्लेख करके उन्हें नमस्कार किया गया है। साथ ही, १४ पूर्वों में से प्रत्येक की वस्तु संख्या और प्रत्येक वस्तु के पाहुड़ों (प्राभृतों) की संख्या भी दी है। चारित्रभक्ति - चातित्रभक्ति-दश अनुष्टुप्‌, पद्यों में श्री वर्धमान प्रणीत, सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यातनाम के पांच चारित्रओं, अहिंसादि २८ मूलगुणों, दशधर्मों, त्रिगुप्तियों, सकल्शीलों, परिषह्जय और उत्तरगुणों का उल्लेख करके उन्की सिद्धि और सिद्धिफल (मुक्ति सुख) की कामना की है।
जोइभक्ति योगी (अनगार) भक्ति - यह भक्ति पाठ २३ गाथात्मक है इसमें जैन साधुओं के आदर्श जीवन और उनकी चर्चा का सुन्दर अंकन किया गया है। उन योगियों की अनेक अवस्थाओं ऋद्धियों, सिद्धियों और गुणों का उल्लेख करते हुए उन्हें भक्तिभाव से नमस्कार किया गया है।
आचार्य भक्ति - इसमें दस गाथाओं द्वारा आचार्य परमेष्ठी के विशेष गुणों का उल्लेख करते हुए उन्हें नमस्कार किया है।
निर्वाण भक्ति - २७ गाथात्मक इस भक्ति में निर्वाण को प्राप्त हुए तीर्थंकरों तथा दूसरे पूतात्म पुरुषों के नामों का उन स्थानों के नाम सहित तथा वन्दना की गई है जहाँ से उन्होंने निर्वाण पद की प्राप्ति की है। इस भक्ति पाठ में कितनी ही ऎतिहासिक और पौराणिक बातों एवं अनुभूतियों की जानकारी मिलती है।
पंचगुरु (परमेष्ठी) भक्ति - इसमें छह पद्यों में अर्हत्‌, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु ऎसे पांच परमेष्ठियों का स्तोत्र और उनका फल दिया है। और पंचपरमेष्ठी के नाम देकर उन्हें नमस्कार करके उनसे भव-भव में सुख की प्रार्थना की गई है। तीर्थंकर भक्ति - थोस्सामि थुदि (तीर्थंकर भक्ति) यह थोस्सामि पद से प्रारम्भ होने वाली अष्टगाथात्मक स्तुति है जिसे तित्थ्यर भक्ति कहते हैं। इसमें वृषभादि वर्द्धमान पर्यन्त चतुर्विंशति तीर्थंकरों की उनके नामोल्लेखपूर्वक वन्दना की गई है। मूलसंघ और कुन्दकुन्दान्वय - भगवान महावीर के समय में जैन साधु सम्प्रदाय निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय के नाम से प्रसिद्ध था। इसी कारण बौद्ध त्रिपिटकों में महावीर को निगंठ नात्तपुत्र लिखा मिलता है। अशोक के शिलालेखों में भी ’निगंठ’ शब्द से निर्देश किया गया है। कुन्दकुन्दाचार्य मूलसंघ के आदिप्रवर्तक माने जाते हैं। कुन्दकुन्दान्वय का सम्बन्ध भी इन्हीं से कहा गया है। वस्तुतः कौण्डकुण्डपुर से निकले मुनिवंश को कुन्दकुन्दान्वय कहा गया है। कुन्दकुन्द का समय - नन्दिसंघ की पट्टवली में लिखा है कि कुन्दकुन्द वि.सं. ४९ में आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए। ४४ वर्ष की अवस्था में उन्हें आचार्य पद मिला। ५१ वर्ष १० महीने तक वे उस पद पर प्रतिष्ठित रहे। उनकी कुल आयु ९५ वर्ष १० महीने १५ दिन की थी। Source: Jain Darshan Sar, Written by Acharya Dharama Bhushan Maharaj Ji. Reference: http://www.jinvaani.org/shri-kundkund-acharya.html

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आचार्य उमास्वामी (मूल ग्रन्थ :- तत्त्वार्थसूत्र)

Umā Svāmi is held in high estimation by the two main sections of the Jainas. Each section gives a different account of the life of the author of his great work. Umasvami wrote most sacred literature on jainism mainly Tattvārthādhigama Sūtra and Tattvārthā Sūtra. A Sloka found in Tattvārthā Sūtra at the end confirms that Umasvami was the author of the above books.
According to the Digambara tradition his name is Umā Svāmi and he is the most famous disciple of the revered saint Sri Kundakundācrya. He is known as Gridhapichchha in consequence of his preceptor being so designated. This is borne out by a verse found in one of the manuscripts of Tattvārthādhigama Sūtra He renounced the world at the age of 19, led the life of an ascetic for 25 years and subsequently became the head of the ascetics and discharged his duties in that capacity for about 40 years.
According to Śvetāmbaras sect the name of the name of Umā Svāmi was Umāsvāti. Umāsvāti was born in the City of Nyagrodhikā. The name of his father was Svāti, while that of his mother Umā. From this it appears that his name is a combination of the names of his parents, a fact inversely reflected in the case of Śri Bappabhattisuri, the author of Chaturvimsatikā, who was so named after his father’s and mother’s name Bappa and Bhatti. The Gotra or the lineage of his father and consequently of the author was Kaubhishani, while that of his mother, Vātsi.
As very little is known even about the exact period of his life, it is but natural that one cannot precisely say when he entered the order of the saints by cutting asunder the ties that bound him to world. It is, however, suggested in the colophon given at the end Bhāshya that he composed great work dealing with almost every doctrine or dogma of the Jainas either explicitly expressed or implied in the city of Kusumapura (modern Patna in Bihar and Orissa), after he had renounced the world. He was a pupil of Śri Ghohanandi who was the grand disciple (Praśishya) of Śivaśrī the Vāchakamukhya.
Umāsvāti too, has this appellation of Vāchaka added to his name. Even Mādhavāchārya the author of Sarvadarś-ana-sangraha, who calls him Umāsvāti Vāchakāchārya, corroborates this.
Umāsvāti has composed 32 Sambandha-Kārikās or the connective verses as an introduction to the Sūtras he composed. Over and above this he has elucidated these Sūtras by composing the Bhāshya or the gloss therein. Furthermore, he is the author of Praśamarati, Śrāvakaprajnapti etc., the number of these work known as Prakaranas being 500
Different stories are told about the composition of Tattvārthādhigama Sūtra : One of these is given as follows in the introduction to its commentary composed in Karnātakiya language :-
There lived in Kathiawar a pious Jaina layman named Dvaipāyana. As he was proficient in the Jaina sacred literature, he desired to compile a great work, but his attempt was not being crowned with success owing to some worldly troubles. Therefore he took a vow not to take his meals until he had composed at least one Sūtra. He did not wait to practice his vow; so on that very day he composed the first Sūtra, selecting salvation as the subject of his work. In order that he might not forget it he transcribed it on a side of a pillar in his house.
Next day he happened to go out on some business. In his absence a saint visited his house that was warmly received and entertained by his wife. By chance his eyes fell upon this Sūtra. He pondered over it and left the place after adding the word Samyag before it.
When Dvaipāyana returned home he saw the aphorism so proverbially corrected and consequently questioned his wife, who suggested that the saint must have done this. He ran at once to find out the saint who had obliged him making such an invaluable and fundamental correction. On the outskirts of the city he came across an order of monks in the midst of whom he found the head of the order seated in the peaceful posture befitting him. He guessed that must be the very saint he had run after and so he fell at his feet and requested him to complete the work undertaken by him as it was far above his ordinary ability. The saint was moved by the compassion and entreaty, so he finished the work. This saint was no other than our revered author Umāsvāmi and the book completed Tattvārthādhigama Sūtra, it being an expansion of the various aspects, details and developments of the foremost, fundamental and all embracing Sūtra of Jainism.

मूलसंघ की पट्टावली में कुन्दकुन्दाचार्य के बाद उमास्वामी (ति) चालीस वर्ष ८ दिन तक नन्दिसंघ के पट्ट पर रहे। श्रवण्बेलगोल के ६५ वें शिलालेख में लिखा है - जिनचन्द्र स्वामी जगत प्रसिद्ध अन्वय में पद्मनन्दी प्रथम इस नाम को धारण करने वाले हुए। उन्हें अनेक ऋद्धि प्राप्त हुई थी उन्हीं कुन्दकुन्द के अन्वय में उमास्वामी मुनिराज हुए, जो गृद्धपिच्छाचार्य नाम से प्रसिद्ध थे उस समय गृद्धपिच्छाचार्य के समान समस्त पदार्थों को जानने वाला कोई दूसरा विद्वान नहीं था।
श्रवणबेलगोल के २५८ वें शिलालेख में भी यही बात कही गई है उनके वंशरूपी प्रसिद्ध खान से अनेक मुनिरूप रत्नों की माला प्रकट हुई उसी मुनि रत्नमाला के बीच में मणि के समान कुन्दकुन्द के नाम से प्रसिद्ध ओजस्वी आचार्य हुए उन्हीं के पवित्र वंश में समस्त पदार्थों के ज्ञाता उमास्वामी मुनि हुए, जिन्होंने जिनागम को सूत्ररूप में ग्रथित किया यह प्राणियों की रक्षा में अत्यन्त सावधान थे। अतएव उन्होंने मयूरपिच्छ के गिर जाने पर गृद्धपिच्छों को धारण किया था। उसी समय से विद्वान लोग उन्हें गृद्धपिच्छाचार्य कहने लगे और गृद्धपिच्छाचार्य उनका उपनाम रूढ़ हो गया। वीरसेनाचार्य ने अपनी धवला टीका में तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता को गृद्धपिच्छाचार्य लिखा है। आचार्य विद्यानन्द ने भी अपने श्लोकवार्तिक में उनका उल्लेख किया है।
आचार्य पूज्यपाद ने सर्वार्थसिद्धि के प्रारम्भ में जो वर्णन किया है वह अत्यन्त मार्मिक है। वे मुनिराज सभा के मध्य में विराजमान थे। जो बिना वचन बोले अपने शरीर से ही मानो मूर्तिधारी मोक्षमार्ग का निरूपण कर रहे थे। युक्ति और आगम में कुशल थे परीषहों का निरूपण करना ही जिनका एक कार्य था तथा उत्तमोत्तम आर्यपुरुषों जिनकी सेवा करते थे। ऎसे दिगम्बराचार्य गृद्धपिच्छाचार्य थे।
मैसूर प्रान्त के नगर्ताल्लुद के ४६वें शिलालेख में लिखा है - मैं तत्वार्थसूत्र के कर्ता, गुणों के मन्दिर एवं श्रुतकेवली के तुल्य श्रीउमास्वामी मुनिराज को नमस्कार करता हूँ। तत्त्वार्थसूत्र की मूलप्रति के अन्त में प्राप्त होने वाले निम्न पद्य में तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता, गृद्धपिच्छोपलक्षित उमास्वामी या मुनिराज की वन्दना की गई है। इस तरह उमास्वाति आचार्य, उमास्वामी और गृद्धपिच्छाचार्य नाम से भी लोक में प्रसिद्ध रहे हैं। महाकवि पम्प (९४) ई. ने अपने आदिपुराण में उमास्वाति को आर्यनुतगृद्धपिच्छाचार्य लिखा है। इसी तरह चामुण्डराय (वि.सं. १०३५) ने अपने त्रिषष्ठिलक्षणपुराण तत्त्वार्थसूत्र कर्ता को गृद्धपिच्छाचार्य लिखा है। आचार्य वादिराज ने अपने पार्श्वनाथचरित में आचार्य गृद्धपिच्छ का उल्लेख किया है।
मैं उन गृद्धपिच्छ को नमस्कार करता हँ, जो महान्‌ गुणों के आगार हैं, जो निर्वाण को उड़कर पहुँचने की इच्छा रखने वाले भव्यों के लिए पंखों का काम देते हैं। अन्य अनेक उत्तरवर्ती आचार्यों ने भी तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता का गृद्धपिच्छाचार्य के रूप में उल्लेख किया है।
श्रवणबेलगोल के १०५ वें शिलालेख में लिखा है कि - आचार्य उमास्वामी ख्याति प्राप्त विद्वान थे। यतियों के अधिपति उमास्वामी ने तत्त्वार्थसूत्र प्रकट किया है, जो मोक्षमार्ग में उद्यत हुए प्रजाजनों के लिए उत्कृष्ट पाथेय का काम देता है। जिनका दूसरा नाम गृद्धपिच्छ है। उनके एक शिष्य बालक पिच्छ थे, जिनके सूक्ति रत्न मुक्त्यंगना के मोहन करने के लिए आभूषणों का काम देते हैं।
इन सब उल्लेखों से स्पष्ट है कि उनका गृद्धपिच्छाचार्य नाम बहुत प्रसिद्ध थाआ वे जिनागम के पारगामी विद्वान थे। इसी से तत्वार्थसूत्र के टीकाकार समन्तभद्र, पूज्यपाद, अकलंक और विद्यानन्द आदि मुनियों ने बड़े ही श्रद्धापूर्ण शब्दों में इनका उल्लेख किया। गृद्धपिच्छाचार्य की प्रमुख रचना का नाम ‘तत्त्वार्थसूत्र’ है। प्रस्तुत ग्रन्थ दस अध्यायों में विभाजित है। इसमें जीवादि सप्ततत्त्वों का विवेचन किया गया है। जैन साहित्य में यह संस्कृत भाषा का एक मौलिक आद्य सूत्रग्रन्थ है। इसके पहले संस्कृत भाषा में जैन साहित्य की रचना हुई इसका कोई आधार नहीं मिलता। यह एक लघुकाय सूत्रग्रन्थ होते हुए भी उसमें प्रमेयों का बडी सुन्दरता से दथन किया गया है। रचना प्रौढ़ और गम्भीर है इसमें जैन वाङ्‌मय का रहस्य अन्तर्निहित है। इस कारण यह ग्रन्थ दोनों जैन परम्परा में समान रूप से मान्य है। दार्शनिक जगत में तो यह ग्रन्थ प्रसिद्ध हुआ ही है, किन्तु आध्यात्मिक जगत में इसका समादर कम नहीं है। हिन्दुओं में जिस तरह गीता का, मुसलमानों में कुरान का और ईसाईयों में बाइबिल का महत्त्व है वही महत्त्व जैनपरम्परा में तत्त्वार्थसूत्र को प्राप्त है। ग्रन्थ के दस अध्यायों में से प्रथम के चार अध्यायों में जीव तत्त्व का, पांचवें अध्याय में अजीव तत्त्व का, छठवें और सातवें अध्याय में आस्रव तत्त्व का, आठवें अध्याय में बन्ध तत्त्व का नवमें अध्याय में संवर और निर्जरा का और दशवें अध्याय में मोक्ष तत्त्व का वर्णन किया गया है।
तत्त्वार्थसूत्र का निम्न मंगल पद्य सूत्रकार की कृति है। इसका निर्देश आचार्य विद्यानन्द ने किया है।

मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम्‌।
ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्‌गुणलब्धये॥

इस मंगल पद्य में वही विषयवर्णित है जो तत्त्वार्थसूत्र के दस अध्यायों में चर्चित है - मोक्ष मार्ग का नेतृत्व, विश्वतत्त्व का ज्ञान और कर्म के विनाश का उल्लेख।

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गौतमस्वामी ( 12 वर्ष ) , सुधर्मास्वामी (12 वर्ष), जम्बूस्वामी ( 36 वर्ष)


गौतमस्वामी ( 12 वर्ष )
जन्म स्थान गोर्वर् ग्राम
जन्म समय ई. पूर्व ६०७
माता पिता पृथ्वी देवी - वसुभूति
विशेष महावीर स्वामी के प्रथम गणधर बने
आयु ९२ वर्ष (५० वर्ष की उम्र में गणधर बने , ३० वर्ष तक गणधर रहे , १२ वर्ष केवलज्ञानी )
मोक्ष प्राप्ति स्थान गुणावा ( उत्तर पुराण के अनुसार विपुलाचल पर्वत )
सुधर्मास्वामी (12 वर्ष)
जन्म स्थान कोल्लक ग्राम
जन्म समय ई. पूर्व ६०३
माता पिता रुक्मणी देवी- राजा सुप्रतिष्ठ
विशेष महावीर स्वामी के चौथे गणधर बने
आयु १०० वर्ष ( 58 वर्ष की उम्र में गणधर बने , ३० वर्ष तक गणधर रहे , १२ वर्ष केवलज्ञानी )
मोक्ष प्राप्ति स्थान विपुलाचल पर्वत



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आचार्य समन्तभद्र स्वामी (मूल ग्रन्थ :- रत्नकरण्डकश्रावकाचार्य , स्वयंभूस्तोत्र)

Nothing is known about his family life. He was initiated into the order of Digamber Jain saints at an early age. Then he passed through hard penances and obtained a very deep knowledge of God and Soul.
Tarkik Chakrachudamani Acharya Samant Bhadra was a great acharya of the second Vikram Century. He is famous as the first writer of adoration verse. He has written many stotras full of deep logic. Dewagam Stotra is incomparable and is also called Apta Mimansa, wherein a thoughtful discussion on Apta (the real God) has been reported. Acharya Samant Bhadra wrote a commentary named 'Gandh Hasti Mahabhasya' on the Tatvartha Sutra (Moksha Shastra) of Umaswami. This Dewagam Stotra is the benedictory verse of Gandh Hasti Mahabhasya, in the context of the same of Tatvartha Sutra.
The latter Acharyas have remembered him with great respect. He is known as the first writer of verses of adoration. He has imparted strength to lyric poetry. His verses of adoration are full of great logic.
He wrote Apta Mimansa. Tattvanushasan, Yuktanushasn Swaymbhu Stotra,, Jinstuti Shatak, Ratnakarand Shrawkachar Prakrit Vyakaran, Praman Padartha, Karma Prabhrit Tika an Gandh Hasti Mahabhasya (not available).
Many serious and spacious commentaries in Sanskrit have been written on this stotra, amongst which, the Ashta Shati of Acharya Aklankdeo with eight hundred verses and the Ashta Shahastri of Acharya Vidyanand with eight thousand verses are very famous. This stotra has one hundred and fourteen verses.

आचार्य समंतभद्र - महान दार्शनिक और सिद्धांतों के मर्मज्ञ - रत्नकरण्डकश्रावकाचार्य के कर्ता ! आप समन्तातभद्र थे - बाहर भीतर सब ओर से भद्र रूप थे रत्नकरण्डकश्रावकाचार्य ग्रन्थ के कर्ता आचार्य श्री समन्तभद्रस्वामी हैं। प्रतिभाशाली आचार्यों, समर्थ विद्वानों एवं पूज्य महात्माओं में आपका स्थान बहुत ऊँचा है। आप समन्तातभद्र थे - बाहर भीतर सब ओर से भद्र रूप थे आप बहुत बड़े योगी, त्यागी, तपस्वी एवं तत्त्वज्ञानी थे। आप जैन धर्म एवं सिद्धांतों के मर्मज्ञ होने के साथ हे साथ तर्क, व्याकरण, छन्द, अलंकार और काव्यकोषादि ग्रन्थों में पूरी तरह निष्णात थे। आपको ‘स्वामी’ पद से विशेष तौर पर विभूषित किया गया है। जीवनकाल - आपने किस समय इस धरा को सुशोभित किया इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। कोई विद्वान आपको ईसा की तीसरी शताब्दी के बाद का बताते हैं तो कोई ईसा की सातवीम-आठवीं शताब्दी का बताते हैं। इस सम्बन्ध में सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ स्वर्गीय पंडित जुगलकिशोरजी मुख्तार ने अपने विस्तृत लेखों में अनेक प्रमाण देकर यह स्पष्ट किया है कि स्वामी समन्तभद्र तत्त्वार्थ सूत्र के दर्ता आचार्य उमास्वामी के पश्चात्‌ एवं पूज्यपाद स्वामी के पूर्व हुए हैं। अतः आप असन्दिग्ध रूप से विक्रम की दूसरी-तीसरी शताब्दी के महान्‌ विद्वान्‌ थे। अभी आपके सम्बन्ध में यही विचार सर्वमान्य माना जा रहा है। संसार की मोहममता से दूर रहने वाले अधिकांश जैनाचार्यों के माता-पिता तथा जन्मस्थान आदि का कुछ भी प्रमाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं है। समन्तभद्र स्वामी भी इसके अपवाद नहीं है। श्रवणबेलगोला के विद्वान्‌ श्री दौर्बलिजिनदास शास्त्री के शास्त्र भंडार में सुरक्षित आप्तमीमांसा की एक प्राचीन ताड़पत्रीय प्रति के निम्नांकित पुष्पिकावाक्य ‘इति श्री फणिमंडलालंकार स्योरगपुराधिपसूनोः श्रीस्वामी समन्तभद्रमुनेः कृतौ आप्तमीमांसायाम्‌’ से स्पष्ट है कि समन्तभद्र फणिमंड्लान्तर्गत उरगपुर के राजा के पुत्र थे। इसके आधार पर उरगपुर आपकी जन्मभूमि अथवा बाल क्रीड़ा भूमि होती है। यह उरग्पुर ही वर्तमान का ‘उरैयूर’ जान पड़ता है। उरगपुर चोल राजाओं की प्रचीन राजधानी रही है। पुरानी त्रिचनापल्ली भी इसी को कहते हैं। आपका प्रारम्भिक नाम शान्तिवर्मा था। दीक्षा के पहले आपकी शिक्षा या तो उरैयूर हुई अथवा कांची य मदुरै में हुई जान पड़्ती है क्योंकि ये तीनों ही स्थान उस समय दक्षिण भारत में विद्य के मुख्य केन्द्र थे। इन सब स्थानों में उस समय जैनियॊं के अच्छे-अच्छे मठ भी मौजूद थे। आपकी दीक्षा का स्थान कांची या उसके आसपास कोई गांव होना चाहिए। आप कांची के दिगम्बर साधु थे। "कांच्यां नग्नाटकोऽहं"। पितृकुल की तरह समन्तभद्रस्वामी के गुरुकुल का भी कोई स्पष्ट लेख नहीं मिलता है, और न ही आपके दीक्षा गुरु के नाम का ही पता चल पाया है। आप मूल्संघ के प्रधान आचार्य थे। श्रवणबेलगोल के कुछ शिलालेखों से इतना पता चलता है कि आप श्री भद्रबाहु श्रुतकेवली, उनके शिष्य चन्द्रगुप्तमुनि के वंशज पद्मनन्दि अपर नाम कोन्डकुन्द मुनिराज उनके वंशज उमास्वाति की वंशपरम्परा में हुए थे। (शिलालेख नं. ४०) बड़े ही उत्साह के साथ मुनिधर्म का पालन करते हुए वे जब ‘मणुवकहल्ली’ ग्राम में धर्म ध्यान सहित मुनि जीवन व्यतीत कर रहे थे, उस समय असाता वेदनीय कर्म के प्रबल उदय से आपको ‘भस्मक’ नाम का रोग हो गया था। मुनिचर्या में इस रोग का शमन होना असंभव जानकर आप अपने गुरु के पास पहँचे और उनसे रोग का हाल कहा तथा सल्लेखना का समय नहीं आया है और आप द्वारा वीरशासन कार्य के उद्धार की आशा है। अतः जहाँ पर जिस वेष में रहकर रोगशमन के योग्य तृप्ति भोजन प्राप्त हो वहाँ जाकर उसी वेष को धारण कर लो। रोग उपशान्त होने पर फिर से जैनदीक्षा धारण करके सब कार्यों को सम्भाल लेना। गुरु की आज्ञा लेकर आपने दिगम्बर वेष का त्याग किया। आप वहाँ से चलकर काँची पहुँचे और वहाँ के राजा के पास जाकर शिवभोग की विशाल अन्न राशि को शिवपिण्ड को खिला सकने की बात कही। पाषाण निर्मित शिवजी की पिण्डी साक्षात्‌ भोग ग्रहण करे इससे बढ़कर राजा को और क्या चाहिए था। वहाँ के मन्दिर के व्यवस्थापक ने आपको मन्दिर जी में रहने की स्वीकृति दे दी। मन्दिर के दिवाड़ बन्द करके वे स्वयं विशाल अन्नराशि को खाने लगे और लोगों को बता देते थे कि शिवजी ने भोग को ग्रहण कर लिया है। शिव भोग से उनकी व्याधि धीरे-धीरे ठीक होने लगी और भोजन बचने लगा। अन्त में गुप्तचरों से पता लगा कि ये शिवभक्त नहीं है। इससे राजा बहुत क्रोधित हुआ और उसने इन्हें यथार्थता बताने को कहा। उस समय समन्तभद्र ने निम्न श्लोक में अपना परिचय दिया - कांची में मलिन वेषधारी दिगम्बर रहा, लाम्बुस नगर में भस्म रमाकर शरीर को श्वेत किया, पुण्डोण्ड्र में जाकर बौद्ध भिक्षु बना, दशपुर नगर में मिष्ट भोजन करने वाला सन्यासी बना, वाराणसी में श्वेत वस्त्रधारी तपस्वी बना। राजन्‌ आपके सामने दिगम्बर जैनवादी खड़ा है, जिसकी शक्ति हो मुझसे शास्त्रार्थ कर ले। राजा ने शिवमूर्ति को नमस्कार करने का आग्रह किया। समन्तभद्र कवि थे। उन्होंने चौबीस तीर्थंकरों का स्तवन शुरु किया। जब वे आठवें तीर्थंकर चन्द्रप्रभु का स्तवन कर रहे थे, तब चन्द्रप्रभु भगवान की मूर्ति प्रकट हो गई। स्तवन पूर्ण हुआ। यह स्तवन स्वयंभूस्तोत्र के नाम से प्रसिद्ध है। यह कथा ब्रह्म नेमिदत्त कथाकोष के आधार पर है।

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आचार्य वट्टकेर स्वामी (मूल ग्रन्थ :- मूलाचार )

आचार्य शौरसेनी प्राकृत के प्राचीन आचार्यों में मूलाचार के रचयिता बट्टकेर का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रारम्भ में आचार्य कुन्दकुन्द का ग्रन्थ ही मूलाचार मान लिया गया था क्योंकि बट्टकेर को उनका उपनाम अनुमानित किया गया था किंतु अब विद्वानों ने गहन अध्ययन के बाद यह स्पष्ट कर दिय है कि बट्टकेर स्वतंत्र आचार्य हुए हैं। बट्टकेर का समय आचार्य कुन्दकुन्द के समकालीन स्वीकार किया जाता है। अतः बट्टकेर प्रथम शताब्दी के प्राकृत आचार्य थें इनका ग्रन्थ मूलाचार मुनियों के आचार का प्रमुख ग्रन्थ है। इसमें कुल 1252 गाथाएं हैं। भाषा और शैली की दृष्टि से शौरसेनी प्राकृत की यह प्राचीन रचना है। श्रमणाचार का ग्रन्थ होने के कारण इसमें अनेक गाथाएं दिगम्बर और श्वेताम्बर परम्परा के साहित्य में प्रचलित मिलती हैं। जैन आचार दर्शन के लिए मूलाचार एक आधारभूत ग्रन्थ हैं।

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आचार्य देवसेन स्वामी (मूल ग्रन्थ :- लघु-नयचक्र , बृहन्नयचक्र )

देवसेन प्राकृत भाषा में 'स्याद्वाद' और 'नय' का प्ररूपण करने वाले दूसरे जैन आचार्य थे। इनका समय दसवीं शताब्दी माना जाता है। देवसेन नय मनीषी के रूप में प्रसिद्ध हैं। इन्होंने नयचक्र' की रचना की थी। संभव है, इसी का उल्लेख आचार्य विद्यानन्द ने अपने 'तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक'[1] में किया हो और इससे ही नयों को विशेष जानने की सूचना की हो।

रचनाएँ

देवसेन की दो रचनाएँ उपलब्ध हैं-
लघु-नयचक्र - इसमें 87 गाथाओं द्वारा द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक, इन दो तथा उनके नैगमादि नौ नयों को उनके भेदोपभेद के उदाहरणों सहित समझाया है।
बृहन्नयचक्र - इसमें 423 गाथाएँ हैं और उसमें नयों व निक्षेपों का स्वरूप विस्तार से समझाया गया है।
इस रचना के अंत की 6, 7 गाथाओं में लेखक ने एक महत्त्वपूर्ण बात यह कही है कि आदितः उन्होंने 'दव्व-सहाव-पयास'[2] नाम से इस ग्रन्थ की रचना दोहा में की थी, किन्तु उनके एक शुभंकर नाम के मित्र ने कहा कि यह विषय इस छंद में शोभा नहीं देता। इसे गाथाबद्ध होना चाहिए। इसीलिए उनके माहल्ल धवल नाम के एक शिष्य ने उसे गाथा रूप में परिवर्तित कर डाला। स्याद्वाद और नयवाद का स्वरूप उनके पारिभाषिक रूप में व्यवस्था से समझने के लिये देवसेन की ये रचनायें बहुत उपयोगी हैं। इनकी न्यायविषयक एक अन्य रचना 'आलाप-पद्धति' है। इसकी रचना संस्कृत गद्य में हुई है। जैन न्याय में सरलता से प्रवेश पाने के लिये यह छोटा-सा ग्रन्थ बहुत सहायक है।

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आचार्य देवनन्दि पूज्यपाद स्वामी (मूल ग्रन्थ :- सर्वार्थसिद्धि )

महान आचार्य पूज्यपाद को देवनन्दि भी कहा जाता है। आचार्य पूज्यपाद स्वामी जैन दर्शन, तर्कशास्त्र, चिकित्सा और साहित्य की एक बहुत ही प्रख्यात विद्वान थे। पूज्यपाद (जिसका पैर आराध्य है एक) वन देवताओं द्वारा उनके चरणो की पूजा की गई थी | उनके सिखने के महान गुण के कारन उन्हें " जिनेन्द्र बुद्धि " कहा जाता है । पूज्य पाद स्वामी एक महान चिकित्सक भी थे । कहा जाता है की उनके द्वारा एक लेप तैयार किया गया था जिसे पैरों में लगाने से धरती के ऊपर आकाश में चला जाता था | आचार्य देवनन्दि-पूज्यपाद विक्रम सम्वत की छठीं और ईसा की पाँचवीं शती के बहुश्रुत विद्वान हैं। ये तार्किक, वैयाकरण, कवि और स्तुतिकार हैं। तत्त्वार्थसूत्र पर लिखी गयी विशद व्याख्या सर्वार्थसिद्धि में इनकी दार्शनिकता और तार्किकता अनेक स्थलों पर उपलब्ध होती है। इनका एक न्याय-ग्रन्थ 'सार-संग्रह' रहा है, जिसका उल्लेख आचार्य वीरसेन ने किया है और उनमें दिये गये नयलक्षण को धवला-टीका में उद्धृत किया है। जैनेन्द्रव्याकरण, समाधिशतक, इष्टोपदेश, निर्वाणभक्ति आदि अनेक रचनाएँ भी इन्होंने लिखी हैं।।

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आचार्य अकलंकदेव स्वामी (मूल ग्रन्थ :- देवागम-विवृति (अष्टशती) ,तत्त्वार्थवार्तिक व उसका भाष्य )

आचार्य अकलंकदेव जैन दर्शन में एक युग निर्माता के रूप में जाने जाते हैं। शिलालेखों एवं ग्रन्थों में प्राप्त उल्लेखों के आधार पर वे आठवीं शती (ई. 720-780) के आचार्य माने जाते हैं। ये जैन न्याय के प्रतिष्ठाता कहे जाते हैं। अनेकांत, स्याद्वाद आदि सिद्धान्तों पर जब तीक्ष्णता से बौद्ध और वैदिक विद्वानों द्वारा दोहरा प्रहार किया जा रहा था तब सूक्ष्मप्रज्ञ अकलंकदेव ने उन प्रहारों को अपने वाद-विद्याकवच से निरस्त करके अनेकांत, स्याद्वाद, सप्तभंगी आदि सिद्धान्तों को सुरक्षित किया था तथा प्रतिपक्षियों को सबल जवाब दिया था। इन्होंने सैकड़ों शास्त्रार्थ किये और जैनन्याय पर बड़े जटिल एवं दुरूह ग्रन्थों की रचना की है। उनके वे न्यायग्रन्थ निम्न हैं-
न्याय-विनिश्चय
सिद्धि-विनिश्चय
प्रमाण-संग्रह
लघीयस्त्रय
देवागम-विवृति (अष्टशती)
तत्त्वार्थवार्तिक व उसका भाष्य आदि।

परिचय

अकलंक के पिता का नाम पुरुषोत्तम था, जो मान्यखेट नगरी के राजा शुभतुंग के मंत्री थे। वे दो भाई थे-अकलंक और निष्कलंक। दोनों ही बहुत बड़े विद्याभ्यासी थे। उनके मन में बौद्धों के द्वारा जैन मत के विरुद्ध उठाये गये आक्षेपों को निर्मूल साबित करने की जिज्ञासा प्रबल रूप से जाग पड़ी थी और उसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु दोनों भाइयों ने बौद्ध मठ में गुप्त रूप से रहकर बौद्ध शास्त्रों का अध्ययन किया। परन्तु एक दिन भेद खुल जाने के काररण उन दोनों के समक्ष मौत आ खड़ी हुई। किसी तरह अकलंक की जान तो बच गई, लेकिन निष्कलंक को प्राणदण्ड से मुक्ति न मिल सकी। अकलंक जैन न्याय के संस्थापक कहे जाते हैं। इसका यह अर्थ नहीं समझना चाहिए कि जैन न्याय जैसी काई चीज़ थी ही नहीं। समन्तभद्र, सिद्धसेन आदि आचार्यों ने जैन दर्शन का प्रतिपादन करते समय जैन न्याय को छोड़ नहीं दिया था। किन्तु जैन न्याय में जो सुव्यवस्था और सुदृढ़ता देखी जाती है, उसका श्रेय अकलंक को ही है। अकलंक के पहले के आचार्यों ने जो भूमिका तैयार की थी, उसके आधार पर उन्होंने जैन न्याय का एक भव्य प्रासाद खड़ा किया। इसी से कभी-कभी जैन न्याय को 'अकलंक न्याय' भी कहा जाता है।

रचनाएँ

अकलंक ने उमास्वाति के 'तत्वार्थसूत्र' तथा समन्तभद्र की 'आप्तमीमांसा' पर क्रमश: 'तत्वर्थराजवार्तिक' तथा 'अष्टशती' नामक टीका लिखी है। 'तत्वार्थराजवार्तिक' में जैन धर्म एवं दर्शन के विभिन्न पक्षों के विवेचन मिलते हैं तथा 'अष्टशती' में पिशेष रूप से अनेकान्तवाद का प्रतिपादन हुआ है। जैन न्याय को सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए अकलंक ने 'लघीयस्त्रय, 'न्यायविनिश्चय', 'सिद्धिविनिश्चय' तथा 'प्रमाण संग्रह' की रचना की। लघीयस्त्रय में तीन करण हैं- प्रमाण प्रवेश, नय प्रवेश तथा प्रवचन प्रवेश। पहले ये तीन स्वतंत्र ग्रन्थों के रूप में थे, किन्तु बाद में इन्हें एक ही ग्रन्थ लघीस्त्रय के रूप में संकलित कर दिया गया। ऐसा माना जाता है कि जैन न्याय का यह पहला ग्रन्थ है, जिसमें प्रमाण, नेय और निक्षेप का तार्किक प्रणाली से निरूपण हुआ है। इतना ही नहीं बल्कि क्षणिकवाद का खंडन भी इसमें किया गया है। न्यायविनिश्चय में तीन प्रस्ताव हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान और प्रवचन। इनकी तुलना सिद्धसेन विरचित 'न्यायवतार' के प्रत्यक्ष, अनुमान और श्रुत तथा बौद्धन्यायाचार्य धर्मकीर्ति द्वारा प्रतिपादित प्रत्यक्ष, स्वार्थनुमान एवं परार्थानुमान से की जाती है। 'सिद्धिविनिश्चय' में बारह प्रस्ताव हैं- इनमें प्रमाण, नय, निक्षेप आदि विश्लेषित हैं। 'प्रमाण संग्रह' में कुल 88 कारिकाएं हैं, जो 9 प्रस्तावों में बंटी हुई हैं। इनमें प्रत्यक्ष, अनुमान, हेतु और हेत्वाभास, वाद, प्रवचन, सप्तभंगी, नय, प्रमाण, निक्षेप आदि की प्रतिष्ठा बड़ी ही तार्किक कुशलता के साथ हुई है।
प्रमाण सिद्धान्त

जैन न्याय में प्रमाण को परिभाषित करते हुए सर्वप्रथम समन्तभद्र ने कहा है कि यह ज्ञान प्रमाण हो सकता है, जो स्व और पर का अवभासक हो। सिद्धसेन दिवाकर ने समन्तभद्र के द्वारा की गई परिभाषा का समर्थन तो किया है, किन्तु उसमें एक विशेषण बढ़ा दिया है। उनके अनुसार प्रमाण वही ज्ञान हो सकता है, जो स्व और पर का अवभासी होने के साथ ही 'बाधविवर्जित' भी हो। अकलंक ने प्रमाण प्रतिष्ठा करते हुए निम्नलिखित सिद्धान्त प्रस्तुत किया है- प्रमाण को अविसंवादी होना चाहिए। संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय से युक्त ज्ञान को विसंवादी कहते हैं। अत: प्रमाण वह ज्ञान है, जिसमें संशय, विपर्यय एवं अनध्यवसाय न हो। परन्तु कोई भी ज्ञान न पूर्ण रूप में प्रमाण हो पाता है और न अप्रमाण ही। अविसंवाद के आधिक्य के कारण कोई ज्ञान प्रमाण हो जाता है और विसंवाद के आधिक्य के कारण अप्रमाण। इतना ही नहीं अपितु प्रमाण को 'व्यवसायात्मक' भी होना चाहिए। प्रमाण व्यवसायात्मक तभी होता है, जब वह सविकल्पक होता है। अत: निर्विकल्पक, कल्पनाप्रौढ़ एवं अव्यपदेश्य ज्ञान प्रमाण की कोटि में नहीं रखे जा सकते हैं। इस सिद्धान्त के आधार पर बौद्धदर्शन के निर्विकल्पक प्रत्यक्ष तथा न्याय दर्शन के अव्यपदेश्य अर्थात अविकल्पक प्रत्यक्ष के सिद्धान्तों का खंडन होता है। प्रमाण के लक्षण को बताते हुए जहाँ पर समन्तभद्र ने 'स्व', 'पर' और 'अपभासक' शब्दों को रखा है, वहीं पर अकलंक ने क्रमश: 'आत्मा', अर्थ' और 'ग्राहक' शब्दों का प्रयोग किया है। प्रमाण के विषय का निरूपण करते हुए अकलंक ने कहा है कि द्रव्य पर्याय तथा सामान्य विशेष ही नहीं, बल्कि आत्मार्थ यानी 'स्व' और 'अर्थ' भी प्रमाण के विषय होते हैं। अकलंक के अनुसार प्रमाण के दो प्रधान भेद हैं- प्रत्यक्ष और परोक्ष। प्रत्यक्ष पुन: दो भागों में विभाजित होता है- मुख्य एवं सांव्यावहारिक। मुख्य प्रत्यक्ष के अंतर्गत तीन प्रकार के ज्ञान होते हैं- अवधि, मन:पर्यय और केवल। सांव्यावहारिक प्रत्यक्ष के रूप में मति-ज्ञान आता है। परोक्ष ज्ञान के पांच भेद हैं- स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क अनुमान और आगम। प्रत्यक्ष की कोटि में वे ज्ञान आते हैं जो 'विशद' हैं। वैशद्य को परिभाषित करते हुए अकलंक ने कहा है जो अनुमान से अधिक (नियत देश, काल तथा आकार के रूप में) विशेषों की प्रतिभासना करता है, उसे विशद ज्ञान कहते हैं। प्रत्यक्ष ज्ञान की अस्पष्टता पर बल देने के लिए अकलंक ने 'साकार' और 'अञ्जासा' पदों का व्यवहार किया है।
ज्ञान की प्राप्ति

आगमों में आत्मा से प्राप्त होने वाले ज्ञान को प्रत्यक्ष कहा गया है क्योंकि उनमें 'अक्ष' का अर्थ आत्मा लिया गया है। शेष सभी ज्ञान परोक्ष की कोटि से रखे गए हैं। मन और इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले ज्ञानों को भी परोक्ष ज्ञान ही कहा गया है। किन्तु जैनेतर परम्पराओं तथा सामान्य व्यवहार में मन और इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान को प्रत्यक्ष ज्ञान कहा गया है। अकलंक ने मन और इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान को सांव्यावहारिक प्रत्यक्ष कहा है। यद्यपि परमार्थिक या या आध्यात्मिक दृष्टि से यह ज्ञान परोक्ष की कोटि में ही आते हैं, तथापि लोक व्यवहार तथा इतर दर्शनों में इन्हें प्रत्यक्ष माना जाता है। साथ ही वैशद्य भी आंशिक रूप से इनमें पाया जाता है। इसलिए इन्हें प्रत्यक्ष कह सकते हैं। परन्तु इनके लिए प्रत्यक्ष नाम ही उचित होगा। आत्मा से प्राप्त प्रत्यक्ष को मुख्य प्रत्यक्ष कहते हैं। इसके तीन भेद हैं- अवधि, मन:पर्यय और केवल।
अवधि-ज्ञान
जो ज्ञान अवधिज्ञानावरण तथा वीर्यान्तराय के क्षयोपशम से उत्पन्न होता है, उसे अवधिज्ञान कहते हैं। इसका विषय केवल रूपी द्रव्य होता है। द्रव्य, क्षेत्र, काल तथा भाव के दृष्टिकोण से इसकी मार्यादाएं होती हैं। इसलिए इन्हें अवधि-ज्ञान कहते हैं। जो ज्ञान दूसरे के मन की बातों की जानकारी कराता है, उसे मन:पर्यय ज्ञान कहते हैं। अवधि ज्ञान का अनन्तर्वाभाग इसका क्षत्र है।
केवल-ज्ञान
केवल-ज्ञान सर्वज्ञता की स्थिति है। इसमें सभी द्रव्यों और पर्यायों को जानने की क्षमता प्राप्त हो जाती है। जब कभी ज्ञानावरण नष्ट हो जाते हैं, तब केवल-ज्ञान की उत्पत्ति होती है। यह पूर्णरूपेण निर्मल या विशद होता है। अन्य सभी ज्ञान इसी में विलीन हो जाते हैं। यह आत्मा की स्वाभाविक स्थिति होती है। आवरणों के हट जाने पर आत्मा सभी क्षेयों को जान लेता है। तत्वार्थसूत्र में मति और श्रुत को परोक्ष ज्ञान कहा गया है। किन्तु अकलंक ने कहा है कि मति, स्मृति, संज्ञा, चिन्ता, अभिनिबोध शब्द रूप में आने से पूर्व मतिज्ञान की कोटि में रखे जाते हैं, परन्तु शब्द रूप में अभिव्यक्त होने पर श्रुतज्ञान हो जाते हैं। मति ज्ञान में आशिंक से वैशद्य होता है, अत: उसे प्रत्यक्ष ज्ञान समझा जा सकता है। लेकिन श्रुत ज्ञान अविशद होता है। इसलिए उसे परोक्ष कहते हैं।
मन:पर्यय
पूर्वानुभव के संस्कार की पुनरावृत्ति स्मृति कही जाती है। इसे 'गृहीतग्राही' कहकर अन्य दर्शनों में प्रमाण की कोटि में नहीं रखा गया है। यह उतनी ही चीजों को प्रस्तुत करती है जितनी पूर्वानुभव में आई हुई होती है। अत: यह पूर्वानुभव की सीमा के अन्दर होती है। अकलंक ने स्मृति को परोक्ष माना है, क्योंकि इसमें अविसंवाद देखा जाता है। यदि इसमें अविसंवाद न माना जाये तो अनुमान, शब्द व्यवहार आदि सभी निरर्थक हो जायेंगे। चूंकि स्मृति परतंत्र होता है, इसलिए इसे परोक्ष प्रमाण कहा जा सकता है, किन्तु अप्रमाण नहीं कहा जा सकता। वर्तमान को देखकर उसके अतीत को ध्यान में लाना, फिर दोनों के मिलने के परिणामस्वरूप ज्ञान की प्राप्ति करना प्रत्यभिज्ञान कहलाता है। इसे बौद्ध न्याय में प्रमाण नहीं माना गया है। नैयायिक इसे मानस विकल्प कहते हैं तथा मीमांसकों की दृष्टि में यह इन्द्रिय प्रत्यक्ष है। अकलंक ने इसे स्वतंत्र प्रमाण घोषित किया है।
अकलंक और अन्य दार्शनिक

अन्य दार्शनिकों ने तर्क को न तो प्रमाण की कोटि में रखा है और न ही अप्रमाण की कोटि में। किन्तु अकलंक ने कहा है कि तर्क को प्रमाण मानना ही होगा, क्योंकि यह व्याप्तिग्राही है। यदि इसे प्रमाण न माना जायेगा तो व्याप्ति का क्या होगा। इतना ही नहीं बल्कि अपने सम्बन्ध में तर्क अविसंवादी भी होता है। 'न्याय-विनिश्चय' में अकलंक ने कहा है कि साधन से साध्य के विषय में ज्ञान प्राप्त करना अनुमान है। लिंग और व्याप्ति के पीछे (अनु) होने वाला ज्ञान अनुमान कहा जाता है। उनके अनुसार अविनाभाव ही अनुमान का लक्षण है। अनुमान के कई अवयव माने गये हैं, किन्तु अकलंक ने केवल प्रतिज्ञा और हेतु को ही पर्याप्त माना है। उन्होंने कार्य स्वभाव और अनुपलब्धि के अलावा कारण हेतु, पूर्वचर हेतु, उत्तर हेतु और सहचर हेतु को पृथक मानने का समर्थन किया है। चूंकि अनुमान का एक ही लक्षण (अविनाभाव) माना गया है, इसलिए उसके अभाव में एक ही हेत्वाभास माना जाना चाहिए। परन्तु अविनाभाव का अभाव विभिन्न प्रकारों से होता है। इसलिए हेत्वाभास के चार प्रकार माने जा सकते हैं- विरुद्ध, असिद्ध, सन्दिग्ध तथा अकिंचित्कर। नैयायिकों ने छलादि का प्रयोग सही माना है, परन्तु अकलंक के अनुसार छल का प्रयोग उचित नहीं, क्योंकि छलादि से उत्पन्न जल्प, वितण्डा आदि के अस्तित्व में वे विश्वास नहीं करते। वे मिथ्या उत्तर को जात्युत्तर मानते हैं। साथ ही यह भी कहते हैं कि मिथ्या उत्तरों की गिनती नहीं हो सकती, क्योंकि ये अनन्त हैं। सप्तभंगी के प्रतिपादन में प्रमाणसप्तभंगी तथा नयसप्तभंगी के लिए क्रमश: सकलादेश और विकलादेश की योजना अकलंक के द्वारा ही बनाई गई है। नयनिरूपण तथा अनेकान्त-विवेचन भी उनके ग्रन्थों में व्यवस्थित ढंग से हुआ है। इस प्रकार अकलंक ने जैन न्याय को एक व्यवस्थित रूप प्रदान किया है, जिसके कारण हम उन्हें उसी कोटि में प्रतिष्ठित करते हैं, जिसमें धर्मकीर्ति, कुमारिल, प्रभाकर आदि आते हैं। विद्यानन्द ने सम्भवत: इसी कारण 'सिद्धेर्वात्राकलंकस्य महतो न्यायवेदिन:[1] वचनों द्वारा अकलंक को 'महान्यायवेत्ता' जस्टिक-न्यायधीश कहा है।

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आचार्य श्री वादिराज (मूल ग्रन्थ :- पा‌र्श्वनाथ चरित्र, यशोधर चरित्र, एकीभाव स्तोत्र, न्याय-विनिश्यिय विवरण, प्रमाण निर्णय )

एकीभाव संस्कृत स्तोत्र के रचियता आचार्य श्री वादिराज हैं| आपकी गणना महान् आचार्यों में की जाती है| आप महान वाद-विजेता और कवि थे|
आपकी पा‌र्श्वनाथ चरित्र, यशोधर चरित्र, एकीभाव स्तोत्र, न्याय-विनिश्यिय विवरण, प्रमाण निर्णय ये पांच कृतियाँ प्रसिद्ध हैं|
न्यायविनिश्चयविवरण अकलंकदेव के न्यायविनिश्चय की विशाल और महत्त्वपूर्ण टीका है।
प्रमाणनिर्णय इनका मौलिक तर्कग्रन्थ है। वादिराज, जो नाम से भी वादियों के विजेता जान पड़ते हैं, अपने समय के महान तार्किक ही नहीं, वैयाकरण, काव्यकार और अर्हद्भक्त भी थे।
आपका समय विक्रम की 11 वीं शताब्दी माना जाता है| ये न्याय, व्याकरण, काव्य आदि साहित्य की अनेक विद्याओं के पारंगत थे और 'स्याद्वादविद्यापति' कहे जाते थे। ये अपनी इस उपाधि से इतने अभिन्न थे कि इन्होंने स्वयं और उत्तरवर्ती ग्रन्थकारों ने इनका इसी उपाधि से उल्लेख किया है। इन्होंने अपने पार्श्वनाथचरित में उसकी समाप्ति का समय ई. 1025 दिया है। अत: इनका समय ई. 1025 है।
आपका चौलुक्य नरेश जयसिंह (प्रथम) की सभा में बडा़ सम्मान था| 'वादिराज' यह नाम नही वरन् पदवी है| प्रख्यात वादियों में आपकी गणना होने से आप वादिराज के नाम से प्रसिद्ध हुए| निस्पृही आचार्य श्री वादिराज ध्यान में लीन थे| कुछ द्वेषी व्यक्तियों ने उन्हें कुष्ट-ग्रस्त देखकर राजसभा में जैन मुनियों का उपहास किया जिसे जैनधर्म प्रेमी राजश्रेष्ठी सहन न कर सके और भावावेश में कह उठे कि हमारे मुनिराज की काया तो स्वर्ण जैसी सुन्दर होती है| राजा ने अगले दिन मुनिराज के दर्शन करने का विचार रखा| सेठ ने मुनिराज से सारा विवरण स्पष्ट कह कर धर्मरक्षा की प्रार्थना की| मुनिराज ने धर्मरक्षा और प्रभावना हेतु एकीभाव स्तोत्र की रचना की जिससे उनका शरीर वास्तव में स्वर्ण सदृश हो गया| राजा ने मुनिराज के दर्शन करके और उनके रुप को देखकर चुगल-खोरों को दण्ड दिया| परन्तु उत्तम क्षमाधारक मुनिराज ने राजा को सब बात समझा कर तथा सबका भ्रम दूर कर सबको क्षमा करा दिया| इस स्तोत्र का श्रद्धा एवं पूर्ण मनोयोग पूर्वक पाठ करने से समस्त व्याधियां दूर होती हैं तथा सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं|
'एकीभावस्तोत्र' के अन्त में बड़े अभिमान से कहते हैं कि जितने वैयाकरण हैं वे वादिराज के बाद हैं, जितने तार्किक हैं वे वादिराज के पीछे हैं तथा जितने काव्यकार हैं वे भी उनके पश्चाद्वर्ती हैं और तो क्या, भाक्तिक लोग भी भक्ति में उनकी बराबरी नहीं कर सकते। यथा-
वादिराजमनुशाब्दिकलोको वादिराजमनुतार्किकसिंह:।
वादिराजमनुकाव्यकृतस्ते वादिराजमनुभव्यसहाय:॥ -एकीभावस्तोत्र, श्लोक 26)

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आचार्य श्री विद्यानन्द (मूल ग्रन्थ :- तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक )

आचार्य विद्यानन्द उन सारस्वत मनीषियों में गणनीय हैं, जिन्होंने एक-से-एक विद्वत्तापूर्ण ग्रन्थों की रचना की हैं। इनका समय ई. 775-840 है। इन्होंने अपने समग्र ग्रन्थ प्राय: दर्शन और न्याय पर ही लिखे हैं, जो अद्वितीय और बड़े महत्त्व के हैं। ये दो तरह के हैं-
1. टीकात्मक, और 2. स्वतंत्र
टीकात्मक ग्रन्थ निम्न हैं- तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक (साभाष्य),
अष्टसहस्री (देवागमालंकार)
और युक्त्यनुशासनालंकार।
प्रथम टीका आचार्य गृद्धपिच्छ के तत्त्वार्थसूत्र पर पद्यवार्तिकों और उनके विशाल भाष्य के रूप में है।
द्वितीय टीका आचार्य समन्तभद्र के देवागम (आप्तमीमांसा) पर गद्य में लिखी गयी अष्टसहस्री है।
ये दोनों टीकाएँ अत्यन्त दुरूह, क्लिष्ट और प्रमेयबहुल हैं। साथ ही गंभीर और विस्तृत भी हैं।
तीसरी टीका स्वामी समन्तभद्र के ही दूसरे तर्कग्रन्थ युक्त्यनुशासन पर रची गयी है। यह मध्यम परिमाण की है और विशद है।
इनकी स्वतन्त्र कृतियाँ निम्न प्रकार हैं- विद्यानन्दमहोदय,
आप्त-परीक्षा,
प्रमाण-परीक्षा,
पत्र-परीक्षा,
सत्यशासन-परीक्षा और
श्री पुरपार्श्वनाथस्तोत्र।
इस तरह इनकी 9 कृतियाँ प्रसिद्ध हैं।
इनमें 'विद्यानन्द महोदय' को छोड़कर सभी उपलब्ध हैं। सत्यशासनपरीक्षा अपूर्ण है, जिससे वह विद्यानन्द की अन्तिम रचना प्रतीत होती है। विद्यानन्द और उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व आदि पर विस्तृत विमर्श इस लेख के लेखक द्वारा लिखित आप्तपरीक्षा की प्रस्तावना तथा 'जैन दर्शन और प्रमाणशास्त्र परिशीलन[1]' में किया गया है। वह दृष्टव्य है।

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आचार्य गुणधर: (मूल ग्रन्थ :-कसायपाहुड )

दिगम्बर परम्परा में जो शौरसेनी प्राकृत में लिखित ग्रन्थ प्राप्त होते हैं उनमें प्रथम श्रुत ग्रन्थ का प्रणयन करने वाले आचार्य गुणधर हैं। इन्द्रनन्दि के श्रुतावतार, नन्दिसंघ की शौरसेनी प्राकृत पट्टावलि और जयधवला टीका आदि में आचार्य गुणधर ओर उनकी पूर्व परम्परा का वर्णन मिलता है। विद्वानों ने गुणधराचार्य का समय विक्रम पूर्व शतब्दी स्वीकार किया हैं ये आचार्य धरसेन और कुन्दकुन्द के पूर्ववर्ती हैं। इनको अर्हद ्वली संघनायक के समकालीन माना जाता है। गुणधराचार्य दिगम्बर परम्परा के प्रथम सूत्रकार हैं। इन्होंने ‘कसायपाहुड’ नामक ग्रन्थ की रचना 180 शौरसेनी प्राकृत गाथाओं में की हैं, जो 16000 पदप्रमाण विषय को अपने में समेटे हुए हैं। ग्रन्थकार अपनी गाथाओं को सूत्रगाथा कहते हैं-

गाहासदे असीदे अत्थे पण्णरसधा विहत्तम्मि।
वोच्छामि सुत्तगाहा जयि गाहा जम्मि अत्थम्मि।।
-गा. 2
कसायपाहुड को पेज्जदोसपाहुड भी कहते हैं। कषाय राग-द्वेष का सम्मिलित नाम है। उनकी परिणति है। अतः कषायों में जो कर्मबंध होता है, उसकी प्रकृति, स्थिति, अनुभाग एवं प्रदेशबंध आदि विशेषताओं का विश्लेषण इस कसायपाहुड में किया गया है। संक्षेप में यह कर्मसिद्धांत का ग्रन्थ है, जिसने परवर्ती साहित्य को बहुत प्रभावित किया है। इस मूल ग्रन्थ पर 8वी शताब्दी में आचार्य वीरसेन ने ‘जयधवला’ नामक विशाल टीका लिखी है। इस पर चूर्णि आदि भी लिखी गयी है। आचार्य गुणधर स्वामी के जन्म स्थान , माता पिता एवं गुरु के विषय में कुछ भी जानकारी उपलब्ध नहीं है । ये आचार्य धरसेन स्वामी के पूर्व हुए या बाद में इस बारे में भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है । वेदना खंड के अवतार को प्रकट करते हुए धवला जी में लिखा है की लोहाचार्य जी के बाद आचारांग लुप्त हो गया । इस प्रकार भारत क्षेत्र में १२ अंगो के लुप्त हो जाने पर शेष आचार्य सब अंग पूर्वों के एकदेशभूत पेज्जदोसप्राभृत और महाकर्मप्रकृति प्राभृत आदि के धारक रह गए । 'पेज्जदोस' कषाय पाहुड़ का नामान्तर है । आचार्य गुणधर स्वामी कषाय प्राभृत के पारंगत रहे । यह धवलाकार के उक्त कथन से स्पष्ट है । पर वे महा कर्म प्रकृति के धारक आचार्य धरसेन स्वामी के पूर्व हुए या नहीं यह इससे स्पष्ट नहीं है । इतना होते हुए भी पंडित हीरा लाल जी शास्त्री जी ने आचार्य गुणधर स्वामी के आचार्य धरसेन स्वामी के २०० वर्ष पूर्व होने की कल्पना की है +

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आचार्य धरसेन स्वामी

इन्द्रनन्दि श्रुतावतार में अह्द्वलि माघनन्दि और धरसेन इन तीन आचार्यों की विद्वत्ता का परिचय दिया गया है। सम्भवतः इनमें गुरूशिष्य सम्बंध भी रहे हों। धवला टीका में आचार्य धरसेन का विशेष परिचय मिलता है। धरसेन दर्शन और सिद्धांत विषय के गंभीर विद्वान थे। वे आचार्य के साथ शिक्षक भी थे, मंत्रशास्त्र के ज्ञाता भी। उनके द्वारा रचित ‘योनिपाहुड’ नामक ग्रन्थ का उल्लेख मिलता है। आचार्य धरसेन को सभी अंग और पूर्वों का एक देश ज्ञाता माना जाता है। विद्वानों ने विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि आचार्य धरसेन वीर-निर्वाण सम्वत् 633 तक जीवित थे। उन्होंने वी.नि.सं. 630-31 मेंपुष्पदंत और भूतबलि को श्रुत की शिक्षा प्रदान की थी। अतः धरसेन का समय ई. सन् 73 मके लगभग स्वीकार किया जाता हैं अभिलेखीय प्रमाणों से भी धरसेन ई. सन् की प्रथम शताब्दी के विद्वान सिद्ध होते हैं। आचार्य धरसेन ने शौरसेनी प्राकृत के प्राचीन ग्रन्थ षट्खण्डागम के विषय का प्रतिपादन अपने शिष्यों पुप्पदंत और भूतिबलि को कराया था। धरसेनाचार्य को सौराष्ट्र देश के गिरिनगर की चन्द्रगुफा में रहने वाला संत कहा गया है। उनके पास आंध्र प्रदेश, वेण नदी के तट से दो आचार्य पढ़ने आये थे। उन्हें दक्षिण देश के आचार्यों ने भेजा था। इससे स्पष्ट है कि शौरसेनी प्राकृत में पठन-पाठन करने वाले आचार्य उस समय सर्वत्र व्याप्त थे।

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आचार्य पुष्पदंत , भूतबली स्वामी (मूल ग्रन्थ :- षट्खण्डागम)

Shrut Panchami is the day when the first Digambar Jain scriptures were written (roughly around 160 A.D.) in the small town of Ankleshwarin the state of Gujarat.Following the liberation (nirvana) of Bhagwan Mahavir on the day of Dipawali, his prime disciple Gautam Swami attained omniscience (kevalgnan) on that same day. There were three kevalgnanis within 62 years following the nirvana of Mahavir Bhagwan: Gautam Swami, Sudharma Swami and Jambu Swami. After Jambu Swami there was absence of omniscience (kevalgnan) in Bharat Kshetra. The link of what is omniscience and its root was not broken, however, the intensity of knowledge started to diminish. After Jambu Swami there were five shrut kevalis over the next 100 years – Vishnu, Nandimitra, Aprajit, Govardhan and Bhadrabahu, of which Bhadrabahu Swami was the last – they all possessed knowledge of the 12 ang including the 14 poorva (also called dwadashaang). The flow of knowledge was intact up to that point.
During the time of Bhadrabahu Swami there was a drought of twelve years and this knowledge started to diminish. In the lineage of Bhadrabahu Swami there were two great Acharyas – Dharsen Acharya and Gunbhadra Acharya (around 700 years after the nirvana of Mahavir Bhagwan). By this stage the level of knowledge had reduced to partial knowledge of one ang only. Dharsen Acharya lived in the caves of the Girnar mountain. Until his time, knowledge was passed orally, but he then noticed that due to the reduction in brain power, this oral knowledge was diminishing and was afraid it would be lost altogether so he called two monks from the South of India –Pushpadant and Bhootbali.
When they arrived he tested them by giving them two mantras, one which contained an extra word and the other one was a word short. Whilst both monks were carefully meditating upon these mantras, two devis (fairies) appeared before them – one with one eye and the other one with one tooth sticking out. Thus they immediately understood that these mantras were not pure. They added the missing word and removed the extra word from the two mantras, and as these became pure, two beautiful devis appeared before them. They then took these two mantras to Dharsen Acharya who upon reading them said “Jai Ho Shrut
The two monks then absorbed this knowledge and wrote the first scripture called the Shatkhand Agam (the foremost and oldest Digambar text). On completing this scripture in the town of Ankleshwar on the fifth day of the Jesht sud month (Shrut Panchami), the celestial beings (devas) performed a special puja. The scripture contains six volumes. Acharya Virsen wrote two commentary texts, known as Dhaval-tika on the first five volumes and Mahadhaval- tika on the sixth volume of this scripture, around 780 A.D. From this scripture, many more scriptures were written and thus started the flow of written knowledge. On the day of Shrut Panchami, all Jain scriptures continue to be venerated. Devta” (long live correct knowledge). As he was satisfied, Dharsen Acharya gave them the knowledge of the fifth mahakarma prakarti prabhrut adhikar of Agrayani poorva.

भगवान महावीर के निर्वाण से 683 वर्ष व्यतीत होने पर आचार्य धरसेन हुए| सभी अंगों ओर पूर्वों का एक देश का ज्ञान आचार्य परम्परा से धरसेनाचार्य को प्राप्त था| आचार्य धरसेन कठियावाड में स्थित गिरनार पर्वत की चान्द्र गुफा में रहते थे| जब वह बहुत वृद्ध हो गए ओर अपना जीवन अत्यल्प अवशिष्ट देखा, तब उन्हें यह चिन्ता हुई कि अवसर्पिणी काल के प्रभाव से श्रुतज्ञान का दिन पर दिन ह्रास होता जा रहा है| इस समय मुझे जो कुछ श्रुत प्राप्त है, उतना भी यदि मैं अपना श्रुत दुसरे को नहीं संभलवा सका, तो यह भी मेरे ही साथ समाप्त हो जाएगा| इस प्रकार की चिन्ता से ओर श्रुत-रक्षण के वात्सल्य से प्रेरित होकर उन्होंने उस समय दक्षिणापथ में हो रहे साधु सम्मेलन के पास एक पत्र भेज कर अपना अभिप्राय व्यक्त किया| सम्मेलन में सभागत प्रधान आचार्यं ने आचार्य धरसेन के पत्र को बहुत गम्भीरता से पढ़ा ओर श्रुत के ग्रहण और धारण में समर्थ, नाना प्रकार की उज्जवल, निर्मल विनय से विभूषित, शील-रूप माला के धारक, देश, कुल और जाती से शुद्ध, सकल कलाओं में पारंगत ऐसे दो साधुओं को धरसेनाचार्य के पास भेजा| जिस दिन वह दोनों साधु गिरिनगर पहुँचने वाले थे, उसकी पूर्व रात्री में आचार्य धरसेन ने स्वप्न में देखा कि धवल एवं विनम्र दो बैल आकर उनके चरणों में प्रणाम कर रहे है| स्वप्न देखने के साथ ही आचार्य श्री की निद्रा भंग हो गई और ‘श्रुत-देवता जयवंत रहे’ ऐसा कहते हुए उठ कर बैठ गए| उसी दिन दक्षिणापथ से भेजे गए वह दोनों साधु आचार्य धरसेन के पास पहुंचे और अति हर्षित हो उनकी चरण वन्दनादिक कृति कर्म करके और दो दिन विश्राम करके तीसरे दिन उन्होंने आचार्य श्री से अपने आने का प्रयोजन कहा| आचार्य श्री भी उनके वचन सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और ‘तुम्हारा कल्याण हो’ ऐसा आशीर्वाद दिया| नवागत साधुओं की परीक्षा :- आचार्य श्री के मन में विचार आया कि पहले इन दोनों नवागत साधुओं की परीक्षा करनी चाहिए कि यह श्रुत ग्रहण और धारण आदि के योग्य भी है अथवा नहीं? क्योंकि स्वच्छंद विहारी व्यक्तियों को विद्या पढाना संसार और भय का ही बढ़ाने वाला होता है| ऐसा विचार करके उन्होंने इन नवागत साधुओं की परीक्षा लेने का विचार किया| तदनुसार धरसेनाचार्य ने उन दोनों साधुओं को दो मंत्र-विद्याएँ साधन करने के लिए दीं| उनमें से एक मंत्र-विद्या हीन अक्षर वाली थी और दूसरी अधिक अक्षर वाली| दोनों को एक एक मंत्र विद्या देकर कहा कि इन्हें तुम लोग दो दिन के उपवास से सिद्ध करो| दोनों साधु गुरु से मंत्र-विद्या लेकर भगवान नेमिनाथ के निर्वाण होने की शिला पर बैठकर मंत्र की साधना करने लगे| मंत्र साधना करते हुए जब उनको यह विद्याएँ सिद्ध हुई, तो उन्होंने विद्या की अधिष्ठात्री देवताओं को देखा कि एक देवी के दांत बहार निकले हुए हैं और दूसरी कानी है| देवियों के ऐसे विकृत अंगों को देखकर उन दोनों साधुओं ने विचार किया कि देवताओं के तो विकृत अंग होते ही नहीं हैं, अतः अवश्य ही मंत्र में कहीं कुछ अशुद्धि है| इस प्रकार उन दोनों साधुओं ने विचार कर मंत्र सम्बन्धी व्याकरण में कुशल अपने अपने मंत्रों को शुद्ध किया और जिसके मंत्र में अधिक अक्षर था, उसे निकाल कर, तथा जिसके मंत्र में अक्षर कम था, उसे मिलाकर उन्होंने पुनः अपने-अपने मंत्रों को सिद्ध करना प्रारंभ किया| तब दोनों विद्या-देवता अपने स्वाभाविक सुन्दर रूप में प्रकट हुए और बोलीं - ‘स्वामिन आज्ञा दीजिये, हम क्या करें|’ तब उन दोनों साधुओं ने कहा - ‘आप लोगो से हमें कोई ऐहिक या पारलौकिक प्रयोजन नहीं है| हमने तो गुरु की आज्ञा से यह मंत्र-साधना की है|’ यह सुनकर वे देवियाँ अपने स्थान को चली गईं| भूतबली-पुष्पदन्त नामकरण :- मंत्र-साधना की सफलता से प्रसन्न होकर वे आचार्य धरसेन के पास पहुंचे और उनके पाद-वंदना करके विद्या-सिद्धि सम्बन्धी समस्त वृतांत निवेदन किया| आचार्य धरसेन अपने अभिप्राय की सिद्धि और समागत साधुओं की योग्यता को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और ‘बहुत अच्छा’ कहकर उन्होंने शुभ नक्षत्र और शुभ वार में ग्रन्थ का पढाना प्रारंभ किया| इस प्रकार क्रम से व्याख्यान करते हुए आचार्य धरसेन ने आषाढ़ शुक्ला एकादशी को पूर्वान्ह काल में ग्रन्थ समाप्त किया| विनय-पूर्वक इन दोनों साधुओं ने गुरु से ग्रन्थ का अध्ययन संपन्न किया है, यह जानकर भूत जाती के व्यन्तर देवों ने इन दोनों साधुओं में से एक की पुष्पावली से शंख, तूर्य आदि वादित्रों को बजाते हुए पूजा की| उसे देखकर आचार्य धरसेन ने उसका नाम ‘भूतबली’ रखा| तथा दूसरे साधु की अस्त-व्यस्त स्थित दन्त पंक्ति को उखाड़कर समीकृत करके उनकी भी भूतों ने बड़े समारोह से पूजा की| यह देखकर धरसेनाचार्य ने उनका नाम ‘पुष्पदन्त’ रखा| अपनी मृत्यु को अति सन्निकट जानकर, इन्हें मेरे वियोग से संक्लेश न हो यह सोचकर और वर्षा काल समीप देखकर धरसेनाचार्य ने उन्हें उसी दिन अपने स्थान को वापिस जाने का आदेश दिया| यद्यपि वह दोनों ही साधु गुरु के चरणों के सान्निध्य में कुछ अधिक समय तक रहना चाहते थे, तथापि ‘गुरु वचनों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए’ ऐसा विचार कर वे उसी दिन वहां से चल दिए और अंकलेश्वर (गुजरात) में आकर उन्होंने वर्षाकाल बिताया| वर्षाकाल व्यतीत कर पुष्पदन्त आचार्य तो अपने भान्जे जिनपालित के साथ वनवास देश को चल दिए और भूतबली भट्टारक भी द्रमिल देश को चले गए| महापर्व का उदय :- तदनंतर पुष्पदन्त आचार्य ने जिनपालित को दीक्षा देकर, गुणस्थानादि बीस-प्ररूपणा-गर्भित सत्प्ररूपंणा के सूत्रों की रचना की और जिनपालित को पढाकर उन्हें भूतबली आचार्य के पास भेजा| उन्होंने जिनपालित के पास बीस-प्ररूपणा-गर्भित सत्प्ररूपंणा के सूत्र देखे और उन्ही से यह जानकर की पुष्पदन्त आचार्य अल्पायु हैं, अतएव महाकर्म प्रकृति प्राभृत का विच्छेद न हो जाए, यह विचार कर भूतबली ने द्रव्य प्रमाणनुगम को आदि लेकर आगे के ग्रंथों की रचना की| जब ग्रन्थ रचना पुस्तकारुड़ हो चुकी तब जयेष्ट शुक्ला पंचमी के दिन भूतबली आचार्य ने चतुर्विध संघ के साथ बड़े समारोह से उस ग्रन्थ की पूजा की| तभी से यह तिथि श्रुत पंचमी के नाम से प्रसिद्ध हुई| और इस दिन आज तक जैन लोग बराबर श्रुत-पूजन करते हुए चले आ रहे है| इसके पश्चात् भूतबली ने अपने द्वारा रचे हुए इस पुस्तकारुड़ षट्खण्डरूप आगम को जिनपालित के हाथ आचार्य पुष्पदन्त के पास भेजा| वे इस षट्खंडागम को देखकर और अपने द्वारा प्रारंभ किये कार्य को भली भाँती संपन्न हुआ जानकर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने भी इस सिद्धांत ग्रन्थ की चतुर्विध संघ के साथ पूजा की|

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आचार्य माणिक्यनन्दि (मूल ग्रन्थ :- परीक्षामुख )

आचार्य माणिक्यनन्दि नन्दिसंघ के प्रमुख आचार्य थे। इनके गुरु रामनन्दि दादागुरु वृषभनन्दि और परदादागुरु पद्मनन्दि थे। इनके कई शिष्य हुए। प्रभाचन्द्र[1] ने न्याय शास्त्र इन्हीं से पढ़ा था तथा उनके 'परीक्षामुख' पर विशालकाय 'प्रमेयकमलमार्त्तण्ड' नाम की व्याख्या लिखी थी, जिसके अन्त में उन्होंने भी माणिक्यनन्दि को अपना गुरु बताया है।

जीवन परिचय


माणिक्यनन्दि की गणना जैन दर्शन के प्रमुख आचार्यों में होती है। वे धारा नगरी के रहने वाले थे। नन्दी संघ के आचार्य गणीरामनन्दी उनके गुरु थे। 'प्रमेय रत्नमाला' के अनुसार माणिक्यनन्दि आठवीं शती में हुए थे, किन्तु नयनन्दी विरचित 'सुदर्शनचरित' के अनुसार उनका समय ई. की ग्यारहवीं शती है। आधुनिक विद्वान डॉक्टर हीरा लाल जैन ने 'सिद्धिविनिश्च' टीका की प्रस्तावना में उनका समय ई. 993-1053 बताया है। डॉक्टर महेन्द्र कुमार जैन यह सम्भावना व्यक्त करते हैं कि माणिक्यनन्दि विद्यानन्द के समकालीन रहे होंगे और उनका समय ई. की 9वीं शती हो सकता है। 'जैन धर्म दर्शन' में डॉक्टर मोहन लाल मेहता लिखते हैं- दसवीं शताब्दी में माणिक्यनन्दी की एक ही अमरकृति 'परीक्षामुख' इस ग्रन्थ का अध्ययन करने से ऐसा स्पष्ट मालूम होता है कि उन्होंने अकलंक के ग्रन्थों का पूर्णरूपेण अध्ययन करके उनके सिद्धांतों को आत्मसात् कर डाला था, साथ ही भारतीय दर्शन की अन्य शाखाओं में भी अच्छा परिचय प्राप्त कर लिया था। उनके प्रकाण्ड पांडित्य एवं आध्यात्मिक विकास को देखते हुए 'न्यायदीपिका' में उन्हें भगवान कहा गया है।
आद्य विद्या-शिष्य नयनन्दि थे, जिन्होंने 'सुदंसणचरिउ' एवं 'सयलविहिविहान' इन अपभ्रंश रचनाओं से अपने को उनका आद्य विद्या-शिष्य तथा उन्हें 'पंडितचूड़ामणि' एवं 'महापंडित' कहा है। नयनन्दि[2] ने अपनी गुरु-शिष्य परम्परा उक्त दोनों ग्रन्थों की प्रशस्तियों में दी है। इनके तथा अन्य प्रमाणों के अनुसार माणिक्यनन्दि का समय ई. 1028 अर्थात 11वीं शताब्दी सिद्ध है।
माणिक्यनन्दि के ग्रन्थ

माणिक्यनन्दि का 'परीक्षामुख' सूत्रबद्ध ग्रन्थ न्यायविद्या का प्रवेश द्वार है। ख़ास कर अकलंकदेव के जटिल न्याय-ग्रन्थों में प्रवेश करने के लिए यह निश्चय ही द्वार है। तात्पर्य यह कि अकलंकदेव ने जो अपने कारिकात्मक न्यायविनिश्चयादि न्याय ग्रन्थों में दुरूह रूप में जैन न्याय को निबद्ध किया है, उसे गद्य-सूत्रबद्ध करने का श्रेय इन्हीं आचार्य माणिक्यनन्दि को है। इन्होंने जैन न्याय को इसमें बड़ी सरल एवं विषद भाषा में उसी प्रकार ग्रंथित किया है जिस प्रकार मालाकार माला में यथायोग्य स्थान पर प्रवाल, रत्न आदि को गूंथता है। इस पर प्रभाचन्द्र ने 'प्रमेयकमलमार्त्तण्ड', लघुअनन्तवीर्य ने 'प्रमेयरत्नमाला', अजितसेन ने 'न्यायमणिदीपिका', चारुकीर्ति नाम के एक या दो विद्वानों ने 'अर्थप्रकाशिका' और 'प्रमेयरत्नालंकार' नाम की टीकाएँ लिखी हैं।
परीक्षामुख में समुद्देश्य

'परीक्षामुख' में छ: समुद्देश्य हैं। प्रथम समुद्देश्य में प्रमाण की प्रतिष्ठा हुई है और इस सम्बन्ध में मीमांसकों के मत पर विशेष रूप विचार किया गया है।
द्वितीय समुद्देश्य में प्रमाण सम्बन्धी चार्वाक एवं बौद्धमतों पर विचार-विमर्श प्रस्तुत करते हुए सांव्यावहारिक प्रत्यक्ष पर प्रकाश डाला गया है।
तृतीय समुद्देश्य में स्मृति आदि परोक्ष प्रमाण का प्रतिपादन करते हुए न्याय मत पर विचार किया गया है।
चतुर्थ समुद्देश्य में सामान्य विशेष सम्बन्धी सिद्धांत को स्पष्ट किया गया है।
पंचम समुद्देश्य में केवल तीन सूत्र हैं, जिनमें प्रमाण के फल का विवेचन हुआ है।
षष्ठ समुद्देश्य में आभासों एवं नयों के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए वादलक्षण और पत्रलक्षण के प्रस्तुत किया गया है।
परीक्षामुख पर प्रभानन्द ने 'प्रमेयकमलमार्तण्ड' नामक एक बृहत् टीका लिखी है, जिसमें 12 हज़ार श्लोक हैं। लघु अनन्तवीर्य ने इस पर 'प्रमेयरत्नमाला' नामक टीका की रचना की है। इस पर तीसरी टीका 'प्रमेयरत्नालंकार' है, जिसके रचयिता भट्टारक चारूकीर्ति हैं। 'प्रमेयकण्ठिका' जिसके रचयिता शांतिवर्णी हैं, को 'परीक्षामुख' की टीका तो नहीं मान सकते, परन्तु इससे सम्बन्धित या इस पर आधारित पुस्तक अवश्य कहेंगे, क्योंकि 'परीक्षामुख' के प्रथम सूत्र का ही यह विवेचन विश्लेषण करता है।
प्रमाण के लक्षण को बताते हुए माणिक्यनन्दी ने कहा है कि वह ज्ञान जो स्व का अर्थात् अपने आप का तथा अपूर्वार्थ का यानी जिसे किसी अन्य प्रमाण से नहीं जाना गया है, उस वस्तु का निश्चय करता है, उसे प्रमाण कहते हैं। किन्तु निर्विकल्पक प्रत्यक्ष निश्चयात्मक नहीं होता। अत: इसे प्रमाण की कोटि में नहीं रख सकते। इस विचार की पुष्टि के लिए प्रमाण को व्यवसायात्मक माना गया है। व्यवसायात्मक होने के लिए ज्ञान का सविकल्पक होना आवश्यक है। नैयायिकों के द्वारा सन्निकर्षादि को प्रमाण माना गया है। परन्तु माणिक्यनन्दी ऐसा नहीं मानते। वे प्रकर्ष को प्रमाण का लक्षण मानते हैं। संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय के व्यवच्छेदन के रूप में 'प्रकर्ष' शब्द आता है। इसके लिए अकलंक ने 'अविसंवादी' शब्द का प्रयोग किया है।
ज्ञान हित प्राप्ति में सहायक होता है और अहित का परिहार करता है। अज्ञान से हित की प्राप्ति नहीं हो सकती और न उससे अहित का परिहार ही हो सकता है, अत: वह कभी भी प्रमाण की कोटि में नहीं रखा जा सकता। 'स्वार्थपूर्वार्थ व्यवसायात्मक ज्ञानं प्रमाणम्' यह प्रमाण लक्षण है। यद्यपि 'अपूर्वार्थ' विशेषण कुमारिल के प्रमाण लक्षण में हम देखते हैं, तथापि वह अकलंक और विद्यानन्द द्वारा 'कथंचित् अपूर्वार्थ' के रूप में जैन परम्परा में भी प्रतिष्ठित हो चुका था। माणिक्यनन्दी ने भी उसे अपना लिया। माणिक्यनन्दी का यह प्रमाण लक्षण इतना लोकप्रिय हुआ कि उत्तरवर्ती अनेक जैन तार्किकों ने उसे ही कुछ आंशिक परिवर्तन के साथ अपने तर्क ग्रन्थों में मूर्धन्य स्थान दिया।
प्रमाण के प्रकार

प्रमाण के प्रकारों के विषय में भारतीय दर्शन में एकमत नहीं है। दो ही प्रकार के प्रमाण माने गए हैं- प्रत्यक्ष और परोक्ष। माणिक्यनन्दी भी प्रमाण के इन्हीं दो प्रकारों को मानते हैं। प्रत्यक्ष
प्रत्यक्ष को परिभाषित करते हुए माणिक्यनन्दी ने कहा है कि जो ज्ञान 'विशद' है, वही प्रत्यक्ष है। विशद का वे वही अर्थ लेते हैं, जो कि अकलंक ने लिया है। उनके अनुसार भी विशद शब्द का स्पष्टता और निर्मलता के लिए प्रयोग हुआ है। तात्पर्य यह है कि जो ज्ञान स्पष्ट है, निर्मल है उसे ही प्रत्यक्ष की संज्ञा मिल सकती है। पुन: वैशद्य की व्याख्या उन्होंने इस प्रकार की है- वह ज्ञान जो दूसरे ज्ञान के व्यवधान से रहित होता है तथा विशेषता के साथ प्रतिभासित होता है, विशद कहलाता है।
प्रत्यक्ष के प्रकार
प्रत्यक्ष के दो प्रकार हैं- मुख्य और सांव्यवहारिक। माणिक्यनन्दी ने पहले सांवयवहारिक प्रत्यक्ष की परिभाषा बताई है। वह ज्ञान जो इन्द्रिय और मन के माध्यम से प्राप्त होता है तथा एकदेशत: विशद होता है, सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहलाता है। नैयायिकों का कथन है कि यदि इन्द्रिय और अनिन्द्रिय को ज्ञान का कारण या उत्पादक माना जाता है तो क्यों नहीं अर्थ और आलोक को भी ज्ञान का कारण माना जाए, क्योंकि ज्ञान तथा आलोक के निमित्त से ज्ञान होता है। इसका समाधान करते हुए माणिक्यनन्दी ने कहा है कि अर्थ और आलोक सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष के कारण बनने के योग्य नहीं हैं, क्योंकि ये तो स्वयं ज्ञान के विषय हैं। जो ज्ञान का विषय है, वह ज्ञान का कारण या उत्पादक कैसे बन सकता है। जिसके सभी आवरण हट गए हैं तथा जो सामग्री की विशेषता से दूर हो गया है, ऐसे अतीन्द्रिय एवं पूर्ण विशद ज्ञान को मुख्य प्रत्यक्ष कहते हैं। जो ज्ञान इन्द्रियों से उत्पन्न होता है, तथा जिसका आवरण पूर्णरूपेण हटता नहीं, उस ज्ञान पर प्रतिबन्ध की संभावना रहती है। ऐसी स्थिति में उसकी विशदता संकुचित हो जाती है। फिर वह मुख्य प्रत्यक्ष की कोटि में नहीं आ सकता। मुख्य प्रत्यक्ष में अवधि ज्ञान, मन पर्ययज्ञान और केवल ज्ञान आते हैं तथा सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष में मतिज्ञान।
परोक्ष
जो प्रत्यक्ष से भिन्न होता है, उसे परोक्ष कहते हैं। ऐसा भी कहा जा सकता है कि जिसका निमित्त प्रत्यक्ष होता है, वह परोक्ष है। उसके पांच भेद होते हैं- स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क, अनुमान और आगम। धारण किये हुए संस्कार के प्रकट होने पर 'तत्' अर्थात् 'वह' के आकार में जो ज्ञान प्राप्त होता है, उसे स्मृति कहते हैं। 'यह वही है', इस ज्ञान में 'यह' वर्तमान से सम्बन्धित है और इस 'वही' का सम्बन्ध भूत से है। अत: इस ज्ञान का सम्बन्ध वर्तमान और भूत दोनों से ही है। ऐसे ज्ञान को प्रत्यभिज्ञान कहते हैं। नैयायिक आदि दार्शनिकों ने सादृश्य के लिए उपमान प्रमाण माना है। किन्तु माणिक्यनन्दी ने कहा है कि यदि सादृश्य या साधर्म्य के के लिए उपमान प्रमाण होगा तो वैधर्म्य के लिए कौन सा प्रमाण होगा। संज्ञी पदार्थों के प्रतिपादन के लिए कौन सा प्रमाण होगा और 'यह इससे अल्प है', 'यह इससे महान है', 'यह इससे दूर है' आदि और (इसके निषेधात्मक रूप, जैसे) 'यह इससे सत्य नहीं है', 'यह इससे महान नहीं है', 'यह इससे दूर नहीं है' आदि के लिए कौन कौन से प्रमाण होंगे। अतएव उपमान प्रमाण को अलग से नहीं माना जा सकता। उसे भी सादृश्य प्रत्यभिज्ञान में समाविष्ट समझना चाहिए।
माणिक्यनन्दी का कथन

'उपलम्भ' अर्थात् अन्वय और अनुपलम्भ अर्थात् व्यतिरेक से जो व्याप्तिज्ञान प्राप्त होता है, उसे 'ऊह' यानी तर्क प्रमाण कहते हैं, जैसे साध्य के होने पर साधन का होना और साध्य के न रहने पर साधन का न होना। अविनाभाव अर्थात् साध्य के बिना साधन का न होना, साधन का साध्य के होने पर ही होना, अभाव में बिल्कुल न होना, इस नियम को सर्वोपंसहार रूप से ग्रहण करना तर्क है। अविनाभाव का एक उदाहरण है: अग्नि होने पर धूम का होना और अग्नि के न होने पर धूम का भी न होना। नैयायिकों का मत है कि केवल प्रत्यक्ष से ही व्याप्ति ज्ञान सम्भव है, किन्तु माणिक्यनन्दी का कथन है कि अनुमान अथवा आगम प्रमाण से भी व्याप्ति ज्ञान सम्भव है। सूर्य की गति को हम नहीं देख पाते, क्योंकि सूर्य हमसे बहुत दूर है। फिर भी उसकी गति के सम्बन्ध में हम अनुमान करते हैं। अनुमान के सम्बन्ध में माणिक्यनन्दी का कथन है कि जब साधन से साध्य का ज्ञान प्राप्त होता है, तब उस ज्ञान को अनुमान कहते हैं। साध्य के साथ जिसका अविनाभाव सम्बन्ध निश्चित होता है और जो साध्य के अभाव में नहीं होता, उसे हेतु अर्थात् साधन कहते हैं। बौद्धों के अनुसार हेतु का यह लक्षण ठीक नहीं है। वे पक्षधर्मत्व, सपक्षधर्मत्व और विपक्षाद् व्यावृत्ति को हेतु का लक्षण मानते हैं, क्योंकि इन्हीं से क्रमश: असिद्ध, विरुद्ध और अनैकान्तिक दोषों का निवारण होता है। परन्तु माणिक्यनन्दी मानते हैं कि अविनाभाव के होने पर ही ये तीनों दोष दूर हो जाते हैं। अत: हेतु के लिए अविनाभावी होना आवश्यक है। आगम उस अर्थज्ञान को कहते हैं, जो आप्तवचन के निमित्त से होता है।
सामान्य या विशेष को प्रमाण माना जाए, उसके सम्बन्ध में विभिन्न मत पाये जाते हैं। सांख्य और वेदांत केवल सामान्य को प्रमाण मानते हैं। बौद्ध दर्शन में विशेष को प्रमाण माना गया है, न्याय वैशेषिक दोनों को ही स्वतंत्र रूप से प्रमाण मानते हैं, क्योंकि इन सब के अनुसार पदार्थों को ऐसे ही देखा जाता है। किन्तु माणिक्यनन्दी ने कहा है कि न केवल सामान्य को, न केवल विशेष को और न दोनों को ही स्वतंत्र रूप से प्रमाण माना जा सकता है, क्योंकि वस्तु का प्रतिभास ही ऐसा नहीं होता। वस्तु में सामान्य और विशेष दोनों एक साथ पाए जाते हैं। अत: सामान्य विशेषात्मक पदार्थ प्रमाण का विषय हो सकता है। सामान्य या विशेष को एकान्त रूप से अथवा स्वतंत्र रूप से दोनों को प्रमाण का विषय मानना विषयाभास है।
प्रमाण के चार फल होते हैं :
अज्ञान की निवृत्ति, हान, उपादान और उपेक्षा। ये फल प्रमाण से भिन्न और अभिन्न दोनों ही होते हैं। इन्हें दो वर्गों में रखते हैं- साक्षात्फल और पारंपर्यफल। किसी वस्तु के जानते ही तत्काल जो लाभ प्राप्त होता है, उसे साक्षात्फल कहते हैं, जैसे अज्ञान की निवृत्ति। वस्तु के जानने के बाद परम्परागत रूप से जो लाभ प्राप्त होता है, उसे पारम्पर्यफल कहते हैं। इस कोटि में हान, उपादान और उपेक्षा को रखते हैं। वस्तु को जानने के बाद उसे अहितकर समझकर त्याग देना हान है। हितकर समझकर ग्रहण करना उपादान है और जिससे हित और अहित की कोई भी सम्भावना न हो, उसे ऐसा समझ कर त्याग देना उपेक्षा कही जाती है।
प्रमाण के स्वरूप, संख्या, विषय और फल पर विचार करने के बाद माणिक्यनन्दी बड़े ऊँचे ही स्वर में उद्घोष करते हैं कि इनसे भिन्न जो कुछ भी हैं, वे तदाभास हैं। ये आभास चार प्रकार के होते हैं-
स्वरूपाभास- जो प्रमाण के सही स्वरूप के अभाव में ही आभासित होता है।
संख्याभास- प्रमाण की अयथार्थ संख्या का आभासित होना।
विषयाभास।
फलाभास- प्रमाण से उसके फल को बिल्कुल भिन्न अथवा अभिन्न समझना।
इस प्रकार एक ही ग्रन्थ की रचना करके माणिक्यनन्दी ने जैन न्याय में अपना प्रतिमान स्थापित कर दिया है।

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