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Kshamavani Parv क्षमावाणी पर्व :

हमारे जीवन के गृहस्थ मार्ग में, ऐसे कई क्षण आते हैं जब हम भगवान महावीर के उपदेश “अहिंसा परमो धर्म” को भूल जाते हैं। हमने जरूर अपनी वाणी या अपनी करनी से किसी को कष्ट दिया होगा। क्षमा में आत्मा का सदगुण निहित है। जब आत्मा अपने वास्तविक स्वभाव से दोषपूर्ण स्वभाव की ओर जाती है, ऐसी आत्मा आसक्त (रागी) या द्वेषी इत्यादि कहलाती है क्योंकि आत्मा स्वभावगत सामान्य और क्षमाशील होती है। सही कहा गया है - गलती करने वाला इंसान होता है, क्षमा करने वाला देव-तुल्य होता है। संसार सुख दुःख का बिछौना है तथा इस नश्वर शारीर को प्राप्त प्रत्येक जीव योनी में विचरती आत्माएं इस चक्र से अछूती नहीं रहती| मानव देह में बुद्धि का आधिपत्य है तभी तो वेह अन्य जीवों पर शासन करता है| इसी श्रृंखला चक्र में वेह बुद्धि-बल-अभिमान युक्त होकर अन्य जीवों के साथ दुर्व्यवहार करते हुए अपनी ही मानव योनी पर अत्याचार करने से नहीं चूकता| किसी भी शक्ति को सर्जन का संहार में लगाया जा सकता है| केवल कुछ क्षण के लिए सोच लिया जाए तो निःसंदेह हम क्रूरता हिंसा भय के घनघोर चक्र से स्वतः मुक्त होकर अपने बल व शक्ति को प्रेम-सौहार्द का अनुपम व अक्षय संबल दे सकते है ओर वैमनस्य व घृणा का घनघोर घटा चक्र लुप्त होने में देर न लगेगी तथा आपके सद्व्यवहार व शालीनता के गुणों से सुसज्जित होकर क्षमा भावना आपके हृदय, मन, बुद्धि व शरीर पर आरूढ़ होकर समाज में बढ़ रहे दुर्गुणों का स्वतः शमन करती हुई विनय ओर शालीनता के मार्ग निर्विवाद रूप से अग्रसित होगी| मानव हो तो क्षमा का अंगीकार करो तथा धधकते वैमनस्य का लोप करो|