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Tirthnkar_Mother_dream
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Kaamdev/Narad/Rudra
Baldev :- He is elder brother of a Vasudev and has extreme attachment with his younger brother. A Baldev’s mother sees four great dreams. He has the strength of a million octopeds.
Four thousand gods are in his attendance. His weapons, including mace and plough are blessed by a thousand gods each. Because of their mutual affection Baldev and Vasudev rule jointly. After the death of the Vasudev, Baldev becomes and ascetic and indulges n spiritual practices. Some of them are liberated and others are reincarnated in dimensions of gods.
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Vasudev A Vasudev in his earlier births sheds some specific karmas and determines to acquire this status. His soul then incarnates either in the heaven or the hell and then is born as Vasudev. At the time of his conception his mother sees seven great dreams. His complexion is dark. He has the strength equivalent to 2 million octopeds and he conquers three continents by killing the Prativasudev. He has 16000 kingdoms and kings under his subjugation and 8000 gods in his attendance. He has 16000 queens and seven gems.
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Prativasudev- They also determine their status in their earlier births and are monarchs of three continents. Their powers are slightly lower than that of the Vasudevs. They are necessarily killed by the Vasudevs and go to hell.
The maximum and minimum numbers of Baldev, Vasudev and Prativasudev are 108 and 20. It is believed that as Tirthankar does not meet another Tirthankar, a Chakravarti and a Vasudev also do not meet another Chakravarti and Vasudev respectively. Also a Vasudev does not meet a Chakravarti.
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कामदेव /नारद / रूद्र

चौबीस कामदेव :- कामदेव का उल्लेख भी १६९ महापुरुषों में मिलता है । प्रत्येक काल ले दुष्मा - सुषमा काल में चौबीस कामदेव होते है । ये सभी अनुपम रूप और लावण्य के धनि होते है और तद्भव मोक्षगामी होते है ।
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ग्यारह रूद्र :- प्रत्येक कालचक्र में ग्यारह रूद्र उत्पन्न होते है । ये सभी अधर्मपूर्ण व्यवहार में सल्गन होकर रौद्र कर्म किया करते है । इसलिए ये रूद्र कहलाते है । सभी रूद्र कुमारावश्ता में जिन दीक्षा धारणकर कठोर ताप करते है । तपस्या के फलस्वरूप इन्हें ११ अंगो का ज्ञान हो जाता है परन्तु दशमे विद्यानुवाद - पूर्व का अध्ययन करते समय विषयो के अधीन होकर पथ भ्रष्ट हो जाते है। संयम और सम्यक्त्व के पतित हो जाने के कारण सभी रूद्र नरकगामी होते है ।इनकी मुक्ति कुछ ही भवों में हो जाती है । रुद्रो और नारदो की उत्पत्ति हुंडा अवसर्पनी काल में ही होती है ।
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नो नारद :- नारद , नारायण और प्रतिनारायण के काल में उत्पन्न होते है । ये अत्यंत कोतुहली और कलहप्रिय होते है । नारायण और प्रतिनारायण को लड़ाने ,इ इनकी मुख्या भूमिका होती है । सभी नारद ब्रह्मचारी होते है । इन्हें राजर्षि का सम्मान प्राप्त होता है। सरे राजा , महाराजा नारदो का विशेष सम्मान करते है । ये समस्त राजभवन में बेरोकटोक आते जाते है । सभी नारद निकट भव्य होते है । कलह प्रियता के कारण नरक जाते है ।
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