Sutak-Paatak Vichaar

सूतक-पातक विचार

संसारी जीव संयोग और वियोग के तानो वानों से कर्म जाल बुनता है यही जाल उसके पतन का हेतु बनता है।संयोग से हर्षातिरेक में रागोत्पादक,वाही वियोग में विषादातिरेक में विकारी परिणामो को उदेव्लित करता है।अतिरेक ,अविवेक और प्रमाद की और ले जाता है जो कि हिंसा का कारण बन जाता है ।इस प्रकार जन्म और मरण दोनों स्थितियों में हर्ष और विषाद होना स्वाभाविक है इसकी तीव्रता तथा काल रागादिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
सूतक की अवस्था में श्रावक आहारदानादि कार्य का निषेध किया है ,अर्थात अशुद्ध माना गया है।
शास्त्रों में नवमी शताब्दी में जिनसेनाचार्य द्वारा रचित महापुराण में ,तत्पश्चात आचार्य नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती दशमी तथा आचार्य जयसेन ग्यारहवीं शताब्दी में रचित ग्रंथों में सूतक के समय निषेध रूप में वर्णित किया गया है।
शास्त्रीय प्रमाण के बाद देखना है की सूतक कितने प्राकर से हमारे ऊपर प्रभाव डालता है।सूतक का दोष कब तक और कितने समय तक रहता है।सूतक का तात्पर्य है अशोच या अशुद्धि ।सूतक से शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की अशुद्धियाँ होती है ।शरीर सूतक द्रव्य और क्षेत्र से तथा मन राग-द्वेषादी विकारी परिणाम से अशुद्ध होता है ।इस काल में शुभ कार्य करना वर्जित है।
क्योंकि एक व्यक्ति कि अशुद्धि से कई व्यक्ति और सम्पूर्ण वातावरण भी प्रभावित हो सकता है।जैसे एक बूंद नींबू के रस से पुरे दूध को परिवर्तन हो जाता है।
सूतक के निम्न भेद है ।
१. आर्तज - मरण सम्बन्धी
२.सौतिक - प्रसूति सम्बन्धी
३. आर्तव - ऋतुकाल सम्बन्धी
४.तत्सन्सर्गज - सूतक से अशुद्ध व्यक्ति का संसर्ग
अ. आर्तज - मरण सम्बन्धी : घरमे निवास करने वाले प्राणियों (कुटुम्बी ,सेवक और पालतू जानवर )के मरण से हुई अशुद्धि को आर्तज सूतक कहते है।इसके तीन भेद है।
अ) सामान्य मरण : -आयु पूर्ण करके मरण को प्राप्त होना ।
ब.) अपम्रत्यु अथवा दुर्भाग्य-प्राकृतिक आपदा,बाढ़,अग्नि ,भूकंप ,उल्कापात ,बिजली आदि से ,सर्पदंश ,सिंह ,युद्ध एवं दुर्घटना के कारण मरण को अपम्रत्यु मरण कहते है।
स)आत्मघात मरण:- सती होना,क्रोध केवश कुएँ में गिरना ,नदी-तालाब में डूबकर मरना ,छत से गिरना ,विष खाना ,फांसी लगाना ,आग लगाना,गर्भपात करवाना आत्म घात मरण ही है।इन्ही कारणों से अन्य के प्राणों का हनन करना भी आत्म घात मरण ही है।
२.सौतिक - प्रसूति सम्बन्धी :-घर में निवास करने वाले प्राणियों कि प्रसूति होने से हुई अशुद्धि को सौतिक सूतक कहते है।इसके तीन भेद है -
अ) स्राव सम्बन्धी :- गर्भ धारण से तीन-चार माह तक के गर्भ गिरने को स्राव कहते है।
ब.)पात सम्बन्धी : गर्भ धारण से पांच -छ: मास तक के गर्भ गिरने को गर्भ पात कहते है।
स)प्रसूति सम्बन्धी :- गर्भ धारण से सातवे से दशवे मास में माताके उदार से शिशु के बहार आने को प्रसूति या जन्म कहते है।
३. आर्तव - ऋतुकाल सम्बन्धी :सामान्यत: बारह वर्ष से पचास वर्ष तक स्त्रियों में प्रत्येक माह में रक्त स्राव से होने वाली अशुद्धि को आर्तव कहते है।इसे रजो दर्शन ,रजो धर्म ,मासिक धर्म भी कहते है।इस अवस्था में स्त्री को राजस्वला कहलाती है। इसके २ भेद है
अ) प्रकृत स्राव :- नियमित रूप से नियमित तिथियों में होने वाला रक्तस्राव जो तीन दिन तक होता है ,प्रकृत स्राव कहलाता है।
ब) स्त्रियों को रोगादिक विकार से नियमित काल के पहले रक्त स्राव होना या नियमित काल के बाद रक्त स्राव होना।योवन अवस्था में भी नियमित काल के पहले रक्त स्राव हो सकता है.इस प्रकार अन्य कारणों से असमय होने वाला रक्त स्राव विकृत स्राव कहलाता है।
४.तत्सन्सर्गज - सूतक से अशुद्ध व्यक्ति का संसर्ग :सूतक से अशुद्ध व्यक्तियों के संसर्ग (स्पर्श ,उठना,बैठना,भोजन करना ,शयन करना आदि )से होने वाली अशुद्धि तत्सन्सर्गज सूतक कहलाती है।इसके तीन भेद है -
अ) मृत व्यक्ति के स्पर्श से :शमशान भूमि में अर्थी ले जाने से ,साथमे जाने से ,श्मशान भूमि में जाने वाले व्यक्ति के स्पर्श से एवं मरण सूतक से अशुद्ध व्यक्तियों के संसर्ग से होने वाली अशुद्धि ।
ब) प्रसूता स्त्री और बालक का स्पर्श ,प्रसूता स्त्री द्वारा उपयोग कि गयी वस्तु का स्पर्श प्रसूति सूतक से अशुद्ध व्यक्तियों का संसर्ग करने से होने वाली अशुद्धि ।
स)रज स्वला स्त्री का स्पर्श या उसके द्वारा उपयोग की गयी वस्तु को स्पर्श करने से होने वाली अशुद्धि।
इस प्रकार इतने कारणों से सूतक अशुद्धि होती है,परन्तु अशुद्धि का काल कितना होगा इसके बारे में विभिन्न शास्त्रों ,आचार्यों ,विद्वानों एवं लोक परंपरा के अनुसार मत-मतान्तर है जो क्षेत्र की परम्परानुसार मानना चाहिए।
सूतक वृद्धि एवं हानि से युक्त होता है,यह जन्म सम्बन्धी दस दिन तथा मरण सम्बन्धी बारह दिन का होता है।प्रसूति स्थान की शुद्धि सूतक काल के बाद एक मास में होती है जबकि गोत्रीजन सूतक काल की बाद मात्र स्नान मात्र से शुद्धि हो जाती है।कुटुम्बीजनों की सूतक से शुद्धि १२ दिन बाद होती है।इसके बाद वह भगवान् का अभिषेक ,पूजन तथा पात्रदान कर सकते है।
प्रसूता स्त्री ४५ दिन में शुद्ध मानी गयी है,रजस्वला तीन दिन बाद शुद्ध होती है परन्तु धार्मिक कार्य हेतु पांचवे दिन ही शुद्ध मानी जाती है,पर पुरुष के साथ व्यभिचार रत स्त्री जीवन पर्यन्त शुद्ध नहीं मानी जाती है।
यह अशुद्धि काल की सामान्य स्थिति है परन्तु सूतक किस किस को लगेगा कितनी पीढ़ी तक लगेगा ,कितने दिन तक लगेगा ।इसके बारे में परम्परानुसार ग्रंथों में जो उल्लेख मिलता है उनमे कुछ भेद है ,जिसका पालन लोकरीति अनुसार करना चाहिए ।

कुटुम्बी जन या आसन्न (३ पीढ़ी तक के )बंधुओं को मरण एवं प्रसूति का सूतक कमश: १२ दिन एवं १० दिन का होताहै।अनासन्न कुटुम्बी जन (चोथी से दशवी पीढ़ी )तक यह सूतक चार्ट में दर्शाए अनुसार १-१ दिन कम होता जाता है और दशवीं पीढ़ी मात्र स्नान से शुद्ध हो जाती है।
अब हम सूतक की स्थिति पर विचार करे ।जब प्राणी का मरण हो होता है तब वह भय एवं पीड़ा से आतंकित होता है,जिससे वह आर्त रौद्र परिणामो के कारण खोटी लेश्या मय हो जाता है अति पीड़ा के इन क्षणों में शरीर की स्थिति अति उत्तेजित होती है,जिस से मस्तिष्क ,ह्रदय ,नाडी तंत्र प्रभावित होता है,इस प्रक्रिया में विकारी तत्व प्रभावित होने के साथ पसीना एवं मल मूत्र भी निष्काषित हो जाता है।इस प्रक्रिया में कई विकारी तत्व रॊग के कीटाणु भी शरीर से उत्सर्जित होते है।आभा मंडल विकृत होने के साथ वयोप्लाज्मा भी विकृत हो जाता है।प्राणांत के बाद व्यक्ति के मरण स्थान पर बायोप्लाज्मा विद्युत् चुम्बकीय ऊर्जा के रूप में विद्यमान रहता है जिसका अपघटन तीन दिन में होता है।इसलिए तीन दिन की विशेष अशुद्धि मानी गयी है।मृत देह में अंतर्मुह्रत में असंख्य जीव उत्पन्न हो जाते है जिनका घात शव जलने से होता है ।अत:यह विशेष हिंसा का कारण माना गया है।इसलिए सूतक देहांत से बाद १२ दिन तक माना गया है। यही स्थिति प्रसूति के समय माता की होती है,प्रसव के समय उनकी मानसिक स्थिति विकृत हो जाती है,आर्त रोद्र परिणामो से खोटी लेश्या हो जाती है।प्रसव के समय शारीरिक उत्तेजना से विकारी पदार्थ पसीने के साथ उत्सर्जित होते है,विकृत आभा मंडल की विद्युत् चुम्बकीय ऊर्जा अपघटित होने में तीन दिन लगते है।अत: सोर का कार्यकाल तीन दिन का माना गया है।आयुर्वेद के अनुसार प्रसव के समय झिल्ली तथा नाल के कुछ अवयव गर्भाशय में अशुद्धि के रूप में रह जाते है ।जो दोषमुक्त रक्त स्राव के साथ तीन दिन तक बाहर निकलते रहते है।इसके बाद गर्भाशय के स्राव का वर्ण कुछ पीलापन लिए होता है जो गर्भाशय के दोष के रूप में दस दिन तक रिसता है।इस दोष को रज स्वला के स्राव के सामान ही अशुद्ध मानते है,जिस प्रकार रज स्वला चोथे दिन शुद्ध हो जाती है उसी प्रकार प्रसूता ग्यारहवें दिन शुद्ध होती है। इसके बाद गर्भाशय को पूर्व स्थिति में आने ने छ : सप्ताह का समय लगता है।इसलिए प्रसूता की प्रसूता अवस्था आयुर्वेद के साथ साथ एलोपैथी भी छ: सप्ताह मानता है ।