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Tirthnkar_Mother_dream
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दर्शन स्तुति


प्रभु पतित-पावन मैं अपावन, चरण आयो सरन जी ।
यो विरद आप निहार स्वामी, मेट जामन मरन जी ॥ ॥ 

तुम ना पिछान्याआन मान्या, देव विविध प्रकार जी । 
या बुध्दिसेतीनिजनजान्यों , भ्रमगिन्योहितकार जी ॥

भव-विकट-वन में करम बैरी, ज्ञान-धन मेरो हरयो ।
तब इष्ट भूल्योभ्रष्ट होय, अनिष्ट - गति धरतो फिरयो ॥ 

धन घड़ी यों धन दिवस यों ही, धन जनम मेरो भयो । 
अब भाग मेरो उदय आयो, दरश प्रभु जी को लख लयो ॥

छवि वीतरागी नगन मुद्रा, दृष्टि नासापै धरैं ॥
वसु प्रातिहार्य अनंत गुण युत, कोटि रवि छवि को हरैं ॥

मिट गयो तिमिर मिथ्यात्व मेरो, उदय रवि आतम भयो ।
मो उर हरष ऐसो भयो, मनु रंक चिंतामणी लयो ॥

मैं हाथ जोड़ नवाय मस्तकख् बीनउं तुव चरण जी ।
सर्वोत्कृष्ट त्रिलोकपतिजिन, सुनहु तारनतरनजी॥ 

जाचूं नहीं सुरवास पुनि, नरराज परिजन साथ जी ।
'बुध' जाचहूँतुमभक्ति भवभव, दीजियेशिवनाथ जी ॥