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Tirthnkar_Mother_dream
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गुरुदेव स्तुति


अहो ! जगतगुरु, देव, सुनियो अरज हमारी । 
तुम हो दीनदयालु, मैं दुखिया संसारी ॥

इस भव वन के मॉहि, काल अनादि गमयो । 
भ्रमत चहँगति माँहि, सुख नहीं दुख बहु पयो ।

कर्म महारिपु जोर, एक न काम करै जी । 
मन मान्य दुख देहि, काहूसों नाहिं डरै जी ॥

कबहूँ इतर निगोद, कबहँ, नर्क दिखावे । 
सुरनरपशुगति माहिं, बहुविधि नाच नचावे ॥

प्रभ! इनको परसंग, भव भव माहिं बुरो जी । 
जे दुख देखे देव ! तुमसों नाहिं दुरो जी ॥

एक जनम की बात, कहिना सकों सुनि स्वामी। 
तुम अनन्त पर्याय, जानत अन्तरयामी ॥

मै तो एक अनाथ, ये मिलि दुष्ट घनेरे । 
कियो बहुत बेहाल, सुनियो साहिब मेरे ॥

ज्ञान महानिधि लूटि, रंक निबल करि डारयो । 
इन ही तुम मुझ माेंहिं, दिये दुख भारी ।

इनको नैक विगार, मै कछु नाहिं कियो जी । 
बिन कारण जगबन्धु ! बहुविधि बैर लियो जी ॥

अब आयो तुम पास सुनि कर सुजस तिहारो । 
नीति निपुन महाराज कीजे न्याय हमारो ॥

दुष्टन देहु निकार, साधुनको रख लीजे । 
विनवै भूधरदास हे प्रभु ! ढील न कीजे ॥